लाहौर हमले के बाद चरमपंथ पर सख़्त पाकिस्तान

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पाकिस्तान की सेना का कहना है कि रविवार को इस्टर के दिन लाहौर में हुए हमले के मामले में अब तक 200 से अधिक लोगों को हिरासत में लिया गया है.

इस हमले में कम से कम 72 लोग मारे गए थे.

सेना का कहना है कि इस कार्रवाई में गोला-बारूद भी बरामद किए गए हैं.

हिरासत में लिए गए लोगों की वास्तिविक संख्या तो अभी नहीं पता चली है लेकिन एक अनुमान के मुताबिक 200-300 संदिग्धों को अब तक हिरासत में लिया गया है.

इनकी पहचान भी सार्वजनिक नहीं की गई है. सेना के प्रवक्ता असीम बाजवा ने उन्हें 'संदिग्ध चरमपंथी और उनके मददगार' के रूप में संबोधित किया है.

यह कार्रवाई रविवार की रात में ही फ़ौज के बड़े अधिकारियों की एक बैठक के बाद शुरू हो गई थी. इस बैठक में पंजाब में चरमपंथियों के ठिकानों को नष्ट का फैसला किया गया.

पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता ने अपने तीन ट्वीट के जरिए चरमपंथी ठिकानों पर मारे गए पहले पांच छापों के बारे में बताया था.

सच यह है कि इन छापों में पुलिस की मौजूदगी को लेकर किसी भी तरह का जिक्र नहीं होने के कारण भौहें तन गई थी.

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अभी तक पंजाब में फ़ौजी या असैनिक एजेंसियों की ओर से दी गई खुफिया सूचनाओं के आधार पर छापे मारे जाते हैं.

इन छापों का नेतृत्व पुलिस करती है और पैरामिलिट्री बैक अप देती है.

कहां छापा मारना है, इसे लेकर प्रांतीय सरकार के पास विशेषाधिकार होता है लेकिन ज़ाहिर तौर पर रविवार की रात पुलिस और पैरामिलिट्री गैर-मौजूद रहे.

पंजाब प्रांत के सूचना मंत्री ने प्रेस कांफ्रेस में कहा कि सरकार के पास इस बात का विशेषाधिकार था कि 'कहां और कितनी ताकत के साथ हमला करना चाहिए' इसका निर्धारण वो करें.

इसका मतलब है कि वाकई में राजनीतिक नेतृत्व ने पंजाब में फ़ौज को बुलाने का फैसला लिया है. लेकिन इस वक्त कुछ लोग इस बात को लेकर सहमत है और एक यह धारणा बनी है कि फ़ौज ने सरकार के हाथ बांध रखे हैं.

पंजाब का दक्षिणी इलाका खासतौर पर भारत विरोधी चरमपंथी संगठनों लश्कर-ए-तैएबा और जैश-ए-मोहम्मद का गढ़ रहा है.

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यह इलाका आर्थिक रूप से काफी पिछड़ा हुआ है और परंपरागत तौर पर यह मजहबी संगठनों का प्रमुख केंद्र रहा है.

शुरू में सेना ने मध्य पंजाब के लाहौर और फैसलाबाद में चरमपंथी ठिकानों को निशाना बनाया. फिर उसके बाद दक्षिणी ज़िला मुल्तान में फ़ौजी कार्रवाई की गई.

पाकिस्तान के लगभग सभी अतिवादी समूह पंजाब में अपने मदरसे चलाते हैं. ये गुट इन मदरसों का इस्तेमाल अपने ऑफिस, संपर्क स्थल और आवास के रूप में करते हैं.

नवाज़ शरीफ का राजनीतिक करियर जनरल ज़िया-उल-हक़ के फ़ौजी हुकूमत में अपने परवान पर चढ़ा था. ज़िया की फ़ौजी हुकूमत के दौरान पाकिस्तान में क़ानून-व्यवस्था का इस्लामीकरण हुआ था.

नवाज़ शरीफ की पार्टी पीएमएल (एन) ने अफ़ग़ानिस्तान में 1990 के दशक में जिहाद को समर्थन दिया और पंजाब में बड़े पैमाने पर मजहबी वोट बैंक को पाने में कामयाबी हासिल की.

लेकिन पेशावर में स्कूल पर हुए हमले के बाद फ़ौजी कार्रवाई से उनकी राजनीति मध्यममार्ग से दक्षिणपंथ की ओर के बजाए मध्यममार्ग की ओर आ गई लगती है.

पाकिस्तान पर लंबे समय से चरमपंथी समूहों को फलने-फूलने देने का इल्जाम लगता रहा है. इसे विदेश नीति की कूटनीति के अलावा मजहबी नजरिए से भी देखा जाता है.

इसे कई लोग इस तौर पर भी देखते हैं कि चरमपंथी समूह और ये मजहबी नजरिया ही फ़ौज को धर्मनिरपेक्ष राजनीति से दूर रखने में मदद पहुंचाता है.

लेकिन अफ़ग़ानिस्तान में नेटो को हुआ नुकसान और पाकिस्तान में चीन के निवेश करने की योजनाओं ने लगता है कि इन हालातों को बदला है.

पाकिस्तान की फ़ौज ने उत्तरी वजीरिस्तान में फ़ौजी कार्रवाई शुरू की है जिसकी लंबे समय से जरूरत महसूस की जा रही थी.

यहां 1980 के दशक से चरमपंथी समूहों ने अपना ठिकाना बनाया हुआ था. पेशावर में हुए चरमपंथी हमले के बाद सरकार ने नेशनल ऐक्शन प्लान को भी मंजूरी दी जिसके तहत चरमपंथियों के ख़िलाफ़ अंधाधुंध कार्रवाई का वादा किया गया.

लेकिन सरकार ने पाकिस्तान की ज़मीन पर सक्रिय भारत और अफ़ग़ानिस्तान विरोधी समूहों के अस्तित्व को नज़रअंदाज करना अब भी जारी रखा है.

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