युद्ध कौशल में ट्विटर का इस्तेमाल

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सोशल मीडिया पर जंग लड़ी जा रही हैं. मगर ज़्यादातर यूज़र्स को इसका अंदाज़ा नहीं कि राष्ट्र और चरमपंथी दोनों उनके मन-मस्तिष्क को कैसे निशाना बना रहे हैं.

शोधकर्ता थॉमस एल्कजर निसन कहते हैं, "आधुनिक युद्ध अब राज्यों और उनके बीच ज़मीन की लड़ाई तक सीमित नहीं हैं. अब यह पहचान, जनसंख्या पर नियंत्रण और राजनीतिक निर्णय की प्रक्रिया को लेकर अधिक है."

ट्विटर के 10 साल हो गए. युद्ध के दौरान इसके इस्तेमाल का समय आ गया है. समाचार संगठन ट्विटर पर समाचार देते हैं. ऐसे में लोग चाहते हैं कि वे अपने नज़रिए से चीजों को लोगों के सामने रखें.

जिहादी गुट इसका ख़ूब इस्तेमाल कर रहे हैं. चिंता जताई जा रही है कि रूस जैसे देश इसका इस्तेमाल अपना असर बढ़ाने में कर सकते हैं और किसी को पता भी नहीं चलेगा.

ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूट के 2014 के सर्वेक्षण के मुताबिक़, ख़ुद को इस्लामिक स्टेट कहने वाले चरमपंथी संगठन के समर्थकों की तादाद ट्विटर पर ज़्यादा नहीं है. ऐसे लोग वहां सिर्फ़ 46,000 हैं. फिर भी इस गुट ने लोगों का ध्यान खींचने में ट्विटर का बखूबी इस्तेमाल किया है.

वॉशिंगटन विश्वविद्यालय के शोधकर्ता जेएम बर्जर ने पता लगाया है कि यह गुट नए सदस्यों को कैसे खींचता है.

यह मुस्लिम बहुल नेटवर्क में संभावित समर्थकों की टोह लेता है. छोटे समुदायों के ज़रिए आसपास के लक्ष्य का पता लगाता है और फिर उन्हें गुट में शामिल होने को उकसाता है.

निसन कहते हैं, ''अमूमन यूज़र्स ट्वीट पर कोई लिंक देखते हैं, जो उन्हें किसी ब्लॉग, वीडियो या सोशल मीडिया पर ले जाता है और कई बार भर्ती करने वाले से बात भी करवाता है.''

वे आगे जोड़ते हैं, "चरमपंथी गुट तीन सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म का इस्तेमाल करते हैं. ट्विटर के अलावा वो फ़ेसबुक और यूट्यूब का भी फ़ायदा उठाते हैं. ट्विटर पर तेज़ी से मैसेज भेजे जा सकते हैं."

ट्विटर के 10 साल पूरे होने के ठीक पहले कंपनी के मुख्य कार्यकारी जैक डोर्सी ने इसकी पुष्टि की थी कि 140 कैरेक्टर की सीमा बरक़रार रखी जाएगी.

उन्होंने एक टेलीविज़न शो में कहा था, "यह हमारे लिए अच्छी सीमा है और मौक़े पर संक्षिप्त बात बनाए रखने के अनुकूल है."

इसके पहले कंपनी ने संकेत दिए थे कि वह इस सीमा को बढ़ाकर 10,000 कैरेक्टर या 2,000 शब्द करने पर विचार कर रही है, पर ट्विटर यूज़र्स ने ही इसका विरोध किया.

इस्लामिक स्टेट ट्विटर पर कुशलता से काम करता है. यह कई भाषाओं में बिल्कुल सही समय पर सही सूचना देता है और बिल्ली की तस्वीर से लेकर हत्या तक की डरावने तस्वीरें डालता है.

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Image caption वाईबो चीन का लोकप्रिय सोशल मीडिया साइट है

जब आईएस ने 2014 में मोसुल पर क़ब्ज़ा किया, इसने अपनी प्रचार सामग्री को अधिक लोगों तक पहुँचाने के लिए स्पैम किए हुए हैशटैग और व्हाट्सऐप का भी इस्तेमाल किया था.

बर्जर का अनुमान है कि आईएस के कम से कम 20 फ़ीसदी ट्वीट्स इस ऐप से ही बनाए गए थे.

अपने प्रचार के लिए ट्विटर का इस्तेमाल सिर्फ़ इस्लामिक स्टेट ही नहीं करता.

सोमालिया के चरमपंथी गुट अल शबाब ने 2013 में नैरोबी के वेस्टगेट मॉल पर जब हमला किया था, तो इसने पूरी वारदात को लाइव ट्वीट किया था.

एक एकाउंट बंद होने के बाद यह दूसरा एकाउंट आसानी से खोलता गया.

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पश्चिमी देशों और रूस के कई मीडिया संगठनों ने रूस के पहले के ट्रॉल्स और उनके कामकाज के तरीक़ों का अध्ययन किया और सोशल मीडिया पर संदेहास्पद व्यवहार की जानकारी दी.

इन क्रियाकलापों को रूस के सत्ता प्रतिष्ठान क्रेमलिन से सीधे जोड़ने का कोई सबूत नहीं है. ट्रॉल के काम करने के गोपनीय तरीक़ों की वजह से ट्विटर पर रूसी ट्रॉल के प्रभाव का अनुमान लगाना कठिन है.

सोशल मीडिया छात्र लॉरंस अलेक्ज़ेंडर का मानना है कि ट्विटर पर चलने वाले रूस समर्थक ट्रॉल्स और क्रेमलिन समर्थक ब्लॉग के बीच एक रिश्ता निश्चित तौर पर है.

उन्होंने एक मामले में पाया कि 2,900 ट्विटर एकाउंट्स से बोरिस नेम्तसोव के बारे में एक ही बात कही गई थी. नेम्तसोव की हत्या की गई थी.

इन एकाउंट्स ने कहा था कि उनकी हत्या यूक्रेन के लोगों ने इसलिए की क्योंकि उन्होंने "उनमें से किसी की एक गर्लफ़्रेंड को चुरा लिया था."

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ट्रॉल्स का असर रूस की सीमा से बाहर भी है. अमरीका में रूसी ट्रॉल्स पर शंका रही है कि उन्होंने 2014 में लुज़ियाना के रसायनिक कारखाने में हादसे की झूठी ख़बर फैलाई थी.

इसी तरह उसने अटलांटा में ईबोला महामारी फैलने की भी झूठी ख़बर दी थी.

क्राउडसोर्स कंपनी बेलिंगकैट के संस्थापक इलियट हिगिंस का कहना है कि वे इसके शिकार रहे हैं.

वे कहते हैं, "अपना निजी ब्लॉग शुरू करने के पहले मैंने गॉर्डियन लाइव पर ब्लॉग लिखना शुरू किया था. लोग ट्विटर पर मुझे फॉलो करते थे और मुझसे असहमत होते थे. आज पांच साल बाद भी मेरा ज़बरदस्त विरोध करते हैं."

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वे जोड़ते हैं, "दिलचस्प यह है कि एमएच-17 से जुड़े रूस समर्थक टॉल्स और सीरियाई समुदाय से जुड़े ट्रॉल्स थे. अब सीरिया में रूस के हस्तक्षेप के बाद वे दोनों एकजुट हो गए हैं. लोगों को एकजुट करना अच्छी बात है."

जर्मनी और बाल्टिक देश जहां रूसी अल्पसंख्यक हैं, वहां ऑनलाइन प्रचार सामग्री का सामना करने के लिए इकाइयां बनी हैं. यूरोपीय संघ और नैटो इस पर निगरानी रखते हैं.

कुल मिलाकर शिक्षा यह है- ट्विटर पर आप जो पढ़ते हैं, उसे लेकर चौकन्ना रहिए.

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