बदलते शब्दों का संसार है 'इंटरनेट'

  • 7 अप्रैल 2016

तेज़ी से बढ़ती डिजिटल दुनिया में हम डिजिटल स्पेस या वेब या इंटरनेट के लिए तरह-तरह के लफ़्ज़ इस्तेमाल करते हैं.

नब्बे के दशक में साइबर शब्द का बहुत चलन था. साइबर दुनिया, साइबर अपराध...साइबर ये...साइबर वो...वग़ैरह.

1998 में 'साइबर' शब्द को लेकर न्यूयॉर्क टाइम्स ने भविष्यवाणी की थी कि ये शब्द बहुत जल्द चलन से बाहर हो जाएगा. एक तरीक़े से हुआ भी यही.

आज हम इंटरनेट या कंप्यूटर से जुड़ी बातों के लिए साइबर शब्द का इस्तेमाल कम करते हैं. मगर, ऐसा नहीं है कि इसका इस्तेमाल पूरी तरह ख़त्म हो गया है.

आज साइबर-अपराध या साइबर अटैक जैसे शब्द आज भी ख़ूब इस्तेमाल हो रहे हैं.

इंटरनेट की दुनिया में जो कुछ भी ग़लत हो रहा है उसके लिए साइबर शब्द का प्रयोग हो रहा है. कहने का मतलब ये की 'साइबर' का मतलब कुछ ग़लत या आपराधिक हो गया है.

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वैसे इंटरनेट के लिए हम तमाम तरह के शब्द इस्तेमाल कर रहे हैं, लेकिन जानकार कहते हैं कि आज हम इंटरनेट या वेब शब्द का खुलकर इस्तेमाल नहीं करते हैं.

आज इंटरनेट इस्तेमाल करने वाले, हर बात के लिए ऑनलाइन शब्द का इस्तेमाल करते हैं. मसलन, मैंने ऑनलाइन शॉपिंग की. या, मैंने ऑनलाइन चैटिंग की. या फिर, मैं फलां वक़्त पर ऑनलाइन था.

ज़ुबान की अमरीकी एक्सपर्ट नाओमी बैरन कहती हैं कि आज इंटरनेट या वेब इस्तेमाल करने वाले 'ऑनलाइन' शब्द का ज़्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं.

स्मार्टफ़ोन का चलन बढ़ने के साथ ही इंटरनेट के बारे में बोलने के शब्द भी बदल गए हैं.

नाओमी बैरन कहती हैं कि जब कोई किसी से रेस्टोरेंट के बारे में पूछता है, तो उसका साथी यही जवाब देता है कि वो अपना फ़ोन देखकर बताता है. जबकि फ़ोन में वो इंटरनेट चेक करके रेस्टोरेंट का पता लगाएगा. यानी इंटरनेट के लिए स्मार्टफ़ोन या मोबाइल बोला जा रहा है.

इंटरनेट पर कोई चीज़ खोजने में सबसे बड़ा मददगार गूगल है. मगर आज दूसरे सर्च इंजिन भी आ गए हैं. पहले लोग कहते थे कि गूगलिंग करके पता कर लेते हैं. मगर आज माइक्रोसॉफ्ट के सर्च इंजिन बिंग को इस्तेमाल करते हुए भी लोग कहते हैं कि, 'मैं गूगल से पूछता हूं'.

इसी तरह इंटरनेट के ज़रिए लोग संदेशे भेजते वक़्त अलग अलग लफ़्ज़ इस्तेमाल करते हैं. मसलन, कोई कहेगा कि, 'मैं तुम्हें फ़ेसबूक करूंगा'.

ट्विटर इस्तेमाल करने वाले कहते हैं, 'मैं डीएम करूंगा'. इसी तरह व्हाट्सएप करने वाले, उस मैसेंजर का नाम लेंगे. जबकि असल में तो सबके सब इंटरनेट के ज़रिए एक-दूसरे से जुड़ रहे होते हैं. यहां इंटरनेट शब्द को फ़ेसबुक, व्हाट्सएप या ट्विटर शब्दों ने हटा दिया है.

कनाडा की भाषा एक्सपर्ट ग्रेशेन मैक्कुलो कहती हैं कि इंटरनेट का ज़िक्र करते वक़्त औपचारिकता की बंदिशें अब टूट रही हैं. पहले ई-मेल लिखा जाता था, अब ईमेल लिखते हैं. यानी शब्दों को लिखने का पुराना तरीक़ा अब लोग नहीं इस्तेमाल कर रहे.

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नाओमी बैरन कहती हैं कि हम बोल-चाल में वो शब्द ज़्यादा इस्तेमाल करते हैं, जो कहने-सुनने और समझने में आसान हों. ज़्यादा तकनीकी शब्दों के इस्तेमाल से हम बचते हैं. इंटरनेट या वेब इस्तेमाल करने वाले ज़्यादातर लोग इसकी तकनीक से वाक़िफ़ नहीं होते हैं. सो, वो आसान लफ़्ज़ ईज़ाद कर लेते हैं, बोलचाल के लिए. ऐसे शब्द ही चलन में आ जाते हैं.

गूगल या एपल का पर्सनल असिस्टेंट सिरी भी हमसे उम्मीद करते हैं कि हम स्वाभाविक तरीक़े से बात करें. तकनीकी और घुमावदार बातें न करें. सीधे-सपाट लहजे में सवाल करें. इससे भी इंटरनेट को लेकर हमारी बोल-चाल का तरीक़ा बदल रहा है.

इंटरनेट के किसी भी माध्यम से बात करने वालों की ज़ुबान ही अलग हो गई है. यहां सरल, छोटे लफ़्ज़ों का इस्तेमाल ज़्यादा हो रहा है और भाषा को लेकर कोई नियम नहीं माना जाता. हिंदी-अंग्रेज़ी, उर्दू, जिस भी ज़ुबान में कोई बात आसानी से कही जा सकती है, वही इंटरनेट पर इस्तेमाल हो रही है.

नाओमी बैरन कहती हैं कि अक्सर हमारी कोशिश होती है कि हम दूसरों से अलग और बेहतर दिखें. इसीलिए ऑनलाइन बात करते वक़्त भी हम अलग तरह के शब्दों का इस्तेमाल करते हैं. यही ज़ुबान चलन में आ जाती है. ख़ास तौर से युवा वर्ग के बीच ऐसी बोल-चाल को ख़ूब पसंद किया जाता है.

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जानकार कहते हैं कि इंटरनेट ने ज़ुबान के बदलाव की रफ़्तार को तेज़ कर दिया है. जैसे ऑनलाइन ट्रेंड तेज़ी से बदल रहे हैं, वैसे ही इंटरनेट की भाषा में बदलाव की रफ़्तार भी तूफ़ानी हो गई है. ऑनलाइन या इंटरनेट के ज़्यादा इस्तेमाल से ये बदलाव बहुत तेज़ी से दूर तक फैल जाता है, ज़्यादा लोगों तक बात पहुंच जाती है.

वैसे ग्रेचेन मैक्कुलो कहती हैं कि अभी ये जानने में बीस साल लगेंगे कि हमारी बोल-चाल पर इंटरनेट का कितना और किस तरह का असर हुआ है.

पहले जहां आपस में बात करते समय लोग तकल्लुफ़ कम करते थे. मगर लिखने के दौरान फ़ॉर्मेलिटी ज़्यादा होती थी. वहीं आज का दौर ऐसा है कि ऑनलाइन लिखने में भी लोग तकल्लुफ़ कम करने लगे हैं और बिंदास होकर लिखते हैं.

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हम इंटरनेट के बारे में किस तरह बात करते हैं, ये तरीक़ा हमेशा बदलता रहा है. मगर, इंटरनेट का हमारी ज़बान पर, हमारे शब्दों पर कैसा असर पड़ा है, ये देखने वाली बात है. इसका सीधा ताल्लुक़, इस बात से है कि हमने किसी भी नई तकनीक को किस तरह अपनाया है, उसके मुरीद बने हैं. उसी हिसाब से उसको लेकर शब्द भी बदले हैं.

(अंग्रेज़ी में मूल लेख यहां पढ़ें, जो बीबीसी फ्यूचर पर उपलब्ध है.)

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