सीरियल किलर्स में लोगों की दीवानगी!

  • 8 अप्रैल 2016
इमेज कॉपीरइट Netflix

जब भी हम किसी सीरियल किलर का नाम सुनते हैं तो उसके बारे में जानने की दिलचस्पी पैदा हो जाती है. उसका रहन-सहन, उसकी सनक, उसका जुर्म करने का तरीक़ा, उसकी निजी ज़िंदगी. हर चीज़ के बारे में जानने की कोशिश करते हैं.

दुनिया में बहुत से ऐसे लोग हैं जिन्हें सीरियल किलर्स में दिलचस्पी है. ऐसे ही एक शख़्स हैं अमरीका के पेन्सिल्वेनिया सूबे के पेन्सबर्ग शहर के रहने वाले जॉन श्वेंक.

जॉन ने अपने घर को सीरियल किलर्स का म्यूज़ियम बना लिया है. उनके घर में सीरियल किलर्स की बनाई पेंटिंग्स हैं, खोपड़ियों के नमूने हैं. कोरी कल्पना वाले अजीबो-ग़रीब जानवरों के स्केच हैं और नंगी औरतों की पेंटिंग्स भी हैं.

जॉन श्वेंक के पास मौजूद इन चीज़ों में 'किलर क्लाउन' के नाम से मशहूर सीरियल किलर जॉन वेन गेसी का बनाया पोर्ट्रेट है.

इमेज कॉपीरइट GETTY

जॉन वेन गेसी ने सत्तर के दशक में शिकागो में यौन शोषण के बाद 33 लड़कों का क़त्ल किया था. इसी तरह 'नाइट स्टाकर' के नाम से मशहूर रिचर्ड रमीरेज़ की बनाई ड्रॉइंग भी श्वेंक के पास है. रमीरेज़ को 1984-85 में अमरीका के कैलीफ़ोर्निया में कई हत्याओं का ज़िम्मेदार माना जाता है.

इसी तरह जुर्म की दुनिया के बदनाम 'मैंसन' ख़ानदान के चार्ल्स मैंसन की बनाई कुछ तस्वीरें भी जॉन श्वेंक के पास हैं. मैंसन ने 1969 में हॉलीवुड अभिनेत्री शैरन टेट समेत छह लोगों की हत्या कर दी थी. क़त्ल के वक़्त अभिनेत्री शैरन गर्भवती थीं.

सिर्फ़ कलाकृतियां ही नहीं, जॉन श्वेंक के पास सीरियल किलर्स के लिखे हज़ारों ख़त भी हैं. इनमें से कई तो सीरियल किलर्स ने ख़ुद जॉन श्वेंक को जेल से लिखे, जब वो लोग अपनी मौत की सज़ा का इंतज़ार कर रहे थे. कइयों ने जॉन को अपने बाल भेजे. किसी ने जेल की ड्रेस भेजी. किसी ने जेल का आईडी कार्ड भेजा तो किसी ने नक़ली दांतों का सेट.

इमेज कॉपीरइट Steven F Scouller

इसी तरह की और भी अजीबो-ग़रीब चीज़ों का ख़ज़ाना है जॉन श्वेंक का घर. जॉन ने चिट्ठियों की मदद से इनमें से कई सीरियल किलर्स से दोस्ती कर ली थी. कुछ से मामला सिर्फ़ जान-पहचान तक पहुंच सका.

जॉन श्वेंक कहते हैं कि वो ये समझना चाहते हैं कि कोई आख़िर किस वजह से दूसरे इंसान का क़त्ल करता है, वो भी कई-कई लोगों का.

जॉन के मुताबिक़ तमाम सीरियल किलर्स में कुछ हक़ीकत में बेहद डरावने हैं. इनमें से कुछ ऐसे हैं, जो यौन अपराध करते करते सीरियल किलर बन गए.

जॉन की पत्नी स्टेसी भगवान से मनाती रहती हैं कि ऐसे सनकी अपराधी कभी भी जेल से न छूटें क्योंकि, इन क़ातिलों को उनके घर का पता मालूम है.

आख़िर क्या वजह है कि जॉन श्वेंक को सीरियल किलर्स के बारे में जानने और उनसे जुड़ी चीज़ें जमा करने का जुनून हो गया. इसके जवाब में श्वेंक, एक सीरियल किलर 'चार्ल्स मैंसन' के साथ हुई बातचीत की रिकॉर्डिंग सुनाते हैं.

इसमें पहले तो मैंसन, श्वेंक से पूछते हैं कि वो कहां से फ़ोन कर रहे हैं. जब जॉन बताते हैं कि वो अपने पेन्सिल्वेनिया के घर से बात कर रहे हैं, तब जाकर चार्ल्स मैंसन, पर्यावरण की दिक़्क़तों से लेकर वियतनाम युद्ध तक दुनिया के कई मसलों पर अटक-अटककर अपनी बात कहता है.

फिर वो हत्याओं के जुनून से पहले अपनी बड़े घरों में चोरी छुपे घुसने की आदत के बारे में बताता है. वो कहता है कि ऐसे बड़े घरों के मालिकों को उसने मार दिया था. फिर वो उन लोगों के नाम बताता है जिन पर उसका कर्ज़ था. वो ये भी बताता है कि वो इन कर्ज़दारों का क्या हश्र करने वाला है. फिर वो श्वेंक को बताता है कि जल्द ही नया विश्व युद्ध छिड़ने वाला है... और आख़िर में वो डॉन मैक्लीन का गाना 'अमरीकन पाई' गाने लगता है.

इन बातों को सुनकर चार्ल्स मैंसन की दिमाग़ी हालत का अंदाज़ा लगाना मुश्किल है. ये भी नहीं समझा जा सकता कि आख़िर वो कहना क्या चाहता है. श्वेंक की इन बातों में दिलचस्पी की वजह समझना भी मुश्किल है.

इमेज कॉपीरइट Curtsy Lily Kulkarni

घिनौने अपराधों में दिलचस्पी, सीरियल किलर्स के बारे में जानने की दिलचस्पी की वजह समझना बेहद मुश्किल है. लेकिन, समाज में ये बात आम है. लोग ऐसे अपराधियों के बारे में जानना चाहते हैं.

दुनिया के सबसे बदनाम सीरियल किलर जैक द रिपर आज अमर है. शायद इस वजह से भी कि वो कभी पकड़ा नहीं गया. फिर उस पर कई सीरियल और फ़िल्में बनीं. सैकड़ों उपन्यास लिखे गए. लंदन में उसके अपराध के ठिकानों के बाक़ायदा टूर आयोजित किए जाते हैं, ख़ास तौर से रात के वक़्त.

जैक द रिपर की ज़िंदगी और उसके अपराधों पर ट्रू डिटेक्टिव, डेक्सटर, द फ़ाल और द जिंक्स जैसे कई नाटक बने.

2014 में बाल्टीमोर की छात्रा हे मिन ली के क़त्ल पर बने 12 किस्तों के 'पॉडकास्ट' सीरियल को सात करोड़ से ज़्यादा बार डाउनलोड किया गया. जबकि इससे पहले किसी भी पॉडकास्ट को डाउनलोड करने का सबसे बड़ा रिकॉर्ड पचास लाख का ही था.

पिछले साल लंदन म्यूज़ियम में पुलिस के मालखानों में मौजूद छह सौ से ज़्यादा आपराधिक चीज़ों की नुमाइश लगी. इसे देखने के लिए टिकट लगाया गया था. इनकी इतनी डिमांड हो गई कि ये टिकट ब्लैक में बिके.

इमेज कॉपीरइट Getty

इसी तरह अमरीका की राजधानी वॉशिंगटन में एक निजी क्राइम म्यूज़ियम को लेकर लोगों की दीवानगी देखते बनती थी. इस म्यूज़ियम में सीरियल किलर गेसी की जोकर वाली ड्रेस थी. यहां पर वो तेल भी रखे थे जिनसे गेसी पेंटिंग्स बनाता था. इसी में 70 के दशक की फॉक्सवैगन बीटल कार भी थी. वो कार जिसमें सीरियल किलर टेड बंडी ने कैलीफोर्निया में कई महिलाओं का क़त्ल किया था.

मशहूर अमरीकी क्राइम लेखक हैरॉल्ड शेक्टर, इसे एक़ क़िस्म का जुनून मानते हैं. वो बताते हैं कि अमरीका में होने वाले सारी हत्याओं में से महज़ एक फ़ीसदी के लिए सीरियल किलर ज़िम्मेदार होते हैं. किसी भी वक़्त दो दर्जन से ज़्यादा सीरियल किलर एक्टिव भी नहीं होते.

मगर, हर दौर में सीरियल किलर्स को लेकर लोगों में अजीब सी दीवानगी देखी गई है. आख़िर हम ऐसे सनकी लोगों के बारे में क्यों जानना चाहते हैं? क्यों इनके बारे में तमाम तरह की कहानियां चल निकलती हैं?

इमेज कॉपीरइट AP

सीरियल किलर्स के बारे में ये जुनून बहुत पुराना है. इसका चलन उन्नीसवीं सदी में अख़बारों का सर्कुलेशन बढ़ने के बाद शुरू हुआ. इंग्लैंड में सरेआम फ़ांसी पर लटकाए गए आख़िरी लोगों में से एक विलियम कॉर्डर को लेकर, उन्नीसवीं सदी में लोगों में ग़ज़ब का जुनून देखा गया था. उसे 1828 में फांसी दी गई थी, जब उसने अपनी प्रेमिका को गोली मार दी थी.

कैम्ब्रिज़ यूनिवर्सिटी के इतिहासकार शेन मैक्करिस्टाइन कहते हैं कि कॉर्डर ने सिर्फ़ एक क़त्ल किया था. वो भी कोई अलग तरह का अपराध नहीं था. मगर फिर भी वो जैक द रिपर और चार्ल्स मैसन की तरह बदनाम हो गया था. उस पर नाटक भी बने और कठपुतलियों के शो भी होते थे.

हज़ारों लोगों ने ससेक्स में उस जगह को जाकर देखा, जहां कॉर्डर ने अपनी प्रेमिका का क़त्ल किया था. जब उसे फांसी दी गई तो उसे देखने के लिए सात हज़ार लोग मौजूद थे. बरसों तक उसके सिर और कान को नुमाइश के तौर पर लंदन की एक दुकान में रखा गया था.

नवंबर 1957 में अमरीका के विस्कांसिन में पुलिस को एक लाश मिली थी. ये लाश एक महिला की थी जो छोटा सा स्टोर चलाती थी. महिला की लाश एक अलग थलग हिस्से में मौजूद एक फ़ॉर्म हाउस के रसोईघर में पैरों से उल्टी लटकी हुई मिली थी.

इमेज कॉपीरइट SCIENCE PHOTO LIBRARY

इस घर से दूसरे हिस्सों में इंसानों की खोपड़ियां मिलीं. इनमें से कई का इस्तेमाल कटोरे के तौर पर हो रहा था. इस फ़ॉर्म हाउस में ही एक बेल्ट मिली, जिसमें स्तनों के टुकड़े लगे हुए थे. किसी औरत के होंठ लगी, आंखों पर बांधी जाने वाली एक पट्टी मिली. जूते के एक डिब्बे में बंद औरतों के अंगो के टुकड़े भी मिले. एक डब्बे में चार कटी हुई नाक मिलीं. लैंपशेड, कचरे की टोकरी और कई ब्रेसलेट भी वहां से मिले. वहां पर लाशों से अलग किए गए कई मास्क भी मिले थे.

बाद में फॉर्म हाउस के मालिक एड गीन ने दो लोगों के क़त्ल की बात मानी थी. उसने ये भी माना कि वो पास के क़ब्रिस्तान से अधेड़ उम्र की महिलाओं की लाशें खोदकर ले आता था. इनमें से कइयों के चेहरे उसकी मां से मिलते थे. एड गीन पर बाद में मशहूर निर्देशक अलफ्रेड हिचकॉक ने 'साइको' नाम से 1960 में एक फ़िल्म भी बनाई.

सिर्फ़ यही नहीं हॉलीवुड में एड गीन की ज़िंदगी और करतूतों पर ‘द टेक्सस चेनसॉ मसाकर’, ‘द साइलेंस ऑफ लैंब्स’ नाम से भी फ़िल्में बनीं.

एड गीन की सनक में लोगों की ऐसी दिलचस्पी थी कि रोज़ाना सैकड़ों लोग उसका फ़ॉर्म हाउस देखने पहुंचते थे. एक दिन अचानक उसका फॉर्महाउस जल गया. उसके बाद ज़मीन की नीलामी हुई तो उसमें बीस हज़ार लोग जमा हो गए.

आख़िर लोग सीरियल किलर्स में इतनी दिलचस्पी क्यों लेते हैं? शायद उनकी ज़िंदगी आम लोगों की ज़िंदगी से अलग और बड़ी दिखती है. जैसे कोई हॉरर फ़िल्म, या कार्टून फ़िल्म.

इमेज कॉपीरइट Alamy

ब्रिटेन में सीरियल किलर्स पर एक मैग्ज़ीन शुरू हुई है, इसका नाम है ‘रियल क्राइम’. इसके संपादक हैं जेम्स होर. जेम्स कहते हैं कि जैसे ही किसी को पता चलता है कि कहीं कुछ ख़राब बात हो रही है, तो लोगों की उसमें दिलचस्पी पैदा हो जाती है. जैसे बच्चों को परियों के क़िस्सों में ख़ूब मज़ा आता है, वैसे ही बड़े लोगों की ऐसी जुर्म की दास्तानों में ख़ूब दिलचस्पी होती है.

सीरियल किलर्स के जुर्म बहुत भयानक होते हैं. अमरीका के कुख्यात सीरियल किलर, ‘मिलुवाकी कैनिबल’ को ही लीजिए. इसका असल नाम जेफरी डामर था. वो लोगों को मारकर उनकी लाश से सेक्स करता था. उनके सिर काटकर रख लेता था. लोग ये समझते थे कि ‘ब्रुकलिन वैम्पायर’ के नाम से कुख्यात हुए अलबर्ट फ़िश, बच्चों से बहुत प्यार करता है. मगर वो तो बच्चों को टॉर्चर करता था. उनके शरीर के हिस्से काटता था, तब जाकर उन्हें मारता था.

इमेज कॉपीरइट AP

अमरीकी जांच एजेंसी एफ़बीआई ने 2005 में सीरियल किलर्स के बारे में एक रिसर्च कराई थी. इसके मुताबिक़, सीरियल किलर्स, ज़माने से अलग नहीं दिखते, वो आम इंसानों जैसे ही होते हैं. उनके परिवार होते हैं, नौकरी या कारोबार होता है. मगर, उनके दिमाग़ में लोगों को मारने वाला, ज़ुल्म ढाने वाला जो हैवान होता है, वो किसी को दिखाई नहीं देता. इसलिए लोग उन पर शक नहीं कर पाते.

तो सीरियल किलर्स आख़िर कौन होते हैं? अमरीकी जुर्म विशेषज्ञ हेलेन मॉरिसन ने इस बारे में एक क़िताब लिखी है, ‘माई लाइफ़ एमंग द सीरियल किलर्स’. मॉरिसन ने अस्सी सीरियल किलर्स का इंटरव्यू किया था. वो कहती हैं कि सब के सब एकदम सामान्य, लोगों को प्यार करने वाले, दोस्ताना बर्ताव करने वाले आम इंसानों जैसे लगे. वो लोगों को ख़ूब दिलकश लगते हैं, जैसे हॉलीवुड के हीरो कैरी ग्रांट या जॉर्ज क्लूनी.

सीरियल किलर्स की ये सबसे बड़ी ख़ूबी होती है कि स्मार्ट होते हैं. लोगों का ध्यान अपनी तरफ़ खींचने में कामयाब होते हैं. सीरियल किलर टेड बंडी को ही लीजिए. वो इतना हैंडसम था कि 36 महिलाओं को अपना दीवाना बनाया और फिर उनका क़त्ल कर डाला.

वह पड़ोस के किसी आम युवक की तरह ही दिखता था और यही सबसे ख़तरनाक बात है. अगर आपके पड़ोस का ये प्यारा लड़का सीरियल किलर है, तो कोई भी हत्यारा हो सकता है. उनके शिकार, उनके भीतर के हैवान से अनजान होते हैं.

ऐसे आम इंसान होने की वजह से ही लोगों को सीरियल किलर्स में दिलचस्पी हो जाती है. जैसे फ़िल्म निर्माता स्टीवेन स्कोलर ने तो एक हत्यारे से दोस्ती ही गांठ ली. इस क़ातिल का नाम निको क्लॉक्स था. ये सीरियल किलर नहीं था. क्लॉक्स ने सिर्फ़ एक क़त्ल किया था. मगर वो इंसानों की लाशें क़ब्रिस्तान से चुराकर खाता था.

डॉक्यूमेंट्री बनाने वाले स्कोलर कहते हैं उनमें और क्लॉक्स में काफ़ी समानताएं हैं. दोनों कमोबेश एक ही उम्र के हैं. दोनों की संगीत की पसंद भी एक सी है, वो मज़ाक़िया भी है. एक बार वो स्कोलर को एक क़ब्रिस्तान भी लेकर गया, जहां से वो लाशें चुराता था. बाद में दोनों डिनर पर भी गए. इससे स्कोलर को हत्यारों की मानसिकता समझने में मदद मिली.

इमेज कॉपीरइट AFP

बहुत से कलाकारों को जुर्म की दुनिया में दिलचस्पी हो जाती है. जैसे अमरीकी पेंटर जो कोलमैन. वो अपराधियों से जुड़ी चीज़ों की पेंटिंग और दूसरी कलाकृतियां बनाते हैं. कोलमैन की बनाई चीज़ों को हॉलीवुड के कई मशहूर कलाकार ख़रीदते हैं.

इतिहासकार, मैक्करिस्टाइन कहते हैं कि लोग सीरियल किलर्स या दूसरे अपराधियों की तरफ़ एक और वजह से झुकाव महसूस करते हैं. वो बिना मरे हुए मौत का एहसास कर पाते हैं. वो मौत के गवाह बन जाते हैं. पेंटर कोलमैन ये बात मानते हैं, वो कहते हैं कि किसी जुर्म से जुड़ी चीज़ें रखने से अपराध की दुनिया से जुड़ाव महसूस होता है.

जुर्म की दुनिया से जुड़ाव पर अमरीका की याल यूनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिक पॉल ब्लूम ने एक रिसर्च की है. इसके मुताबिक़, हम सब ये सोचते हैं कि किसी ख़ास क़ाबिलियत वाले इंसान के संपर्क में आने पर हममें भी वो ताक़त आ जाएगी.

सीरियल किलर्स के अंदर भी लोगों को ख़ास ताक़त दिखती है, इसीलिए वो उसकी तरफ़ खिंचे चले जाते हैं. इस उम्मीद में कि उसमें जो अलग तरह की क़ाबिलियत है, वो उन्हें भी महससू होगी. बहुत से लोग मरे हुए इंसानों के बाल, या दांत जैसी चीज़ें रख लेते हैं. इस तरह वो गुज़र जाने वाले के साथ जुड़ाव महसूस करते रहते हैं.

पेन्सबर्ग के जॉन श्वेंक के पास ऐसी कई चीज़ें हैं जो सीरियल किलर्स या उनके शिकार हुए लोगों से जुड़ी हैं. वैसे बहुत से लोगों को ऐसी चीज़ों से घिन भी आती है. मगर जिसे जुर्म की दुनिया में दिलचस्पी होगी, वो ऐसी चीज़ों की तरफ़ खिंचाव महसूस ज़रूर करेगा. जैसे जॉन श्वेंक, जो कोलमैन या फिर डॉक्यूमेंट्री निर्माता स्कॉउलर.

इंसानी अंगों के अलावा, सीरियल किलर्स या दूसरे अपराधियों से जुड़ी चीज़ें भी यही असर रखती हैं. अमरीका की इलिनॉय यूनिवर्सिटी में अपराध विज्ञान पढ़ाने वाले स्टीफ़ेन गियानेंजेलो ने सीरियल किलर वेन गेसी की बनाई पेंटिंग्स ख़रीदी थीं. इन्हें वो पढ़ाने के दौरान इस्तेमाल करते हैं. इनका छात्रों पर गहरा असर होता है. जिनका पढ़ाई में दिल नहीं लगता, वो भी बेहद दिलचस्पी से इन पेंटिंग्स को देखते हैं.

अपराधियों की ऐसी यादगार चीज़ों का आज अच्छा ख़ासा बाज़ार खड़ा हो गया है. जैसे किसी क़ातिल का इस्तेमाल किया हुआ चाकू. आज तो ऐसी चीज़ों की नीलामी के लिए कई वेबसाइट बन गई हैं. लोग, सीरियल किलर्स की क़ब्र की मिट्टी तक इन वेबसाइट से ख़रीद रहे हैं.

जुर्म के प्रति लोगों की दीवानगी देखते हुए, अमरीकी सीनेटर जॉन कोर्निन एक क़ानून बनाने की मांग कर रहे हैं. वो चाहते हैं कि क़त्ल का ये कारोबार बंद हो. 2007 से वो अमरीकी कांग्रेस से अपील कर रहे हैं कि ऐसा क़ानून बनाकर अपराध से जुड़े सामान बेचने पर रोक लगाई जाए.

ख़ुद अमरीकी सरकार ने 2011 में बदनाम अपराधी ‘उनाबॉम्बर’ की चीज़ें नीलाम की थीं. जैसे टाइपराइटर, उसके लेख, उसके बारे में पुलिस के पोस्टर वग़ैरह. नीलामी से अमरीकी सरकार को अच्छी ख़ासी कमाई हुई थी.

इमेज कॉपीरइट Getty

कई लोगों को सीरियल किलर्स के साथ साथ उस ठिकाने में भी दिलचस्पी हो जाती है जहां उसने जुर्म को अंजाम दिया. ऐसे अपराधियों के मकान या ठिकाने, लोगों के लिए तीर्थ स्थान जैसे हो जाते हैं. इन्हें देखने के लिए लोगों की भीड़ इकट्ठी होने लगती है.

अभी हाल ही में अमरीकी फोटोग्राफ़र स्टीफन चामर्स ने ऐसे ठिकानों को ठीक उल्टा करके पेश करने की कोशिश की. उन्होंने कुछ ऐसी जगहों को चुना जहां सीरियल किलर्स ने अपने शिकारों को मारकर छुपाया था. स्टीफेन ने इन जगहों की क़ुदरती ख़ूबसूरती को अपनी तस्वीरों के ज़रिए दिखाने की कोशिश की. ताकि लोग इन जगहों को जुर्म के काले ठिकानों की जगह क़ुदरती ख़ूबसूरती के लिए याद करें.

सीरियल किलर्स में हमारी दिलचस्पी की एक मनोवैज्ञानिक वजह और भी है. हमारे दिल में बहुत से बुरे ख़याल आते हैं. हम जब जुर्म करने वालों में दिलचस्पी लेने लगते हैं तो ऐसा महसूस होता है कि बिना वो काम असल में किए हमें वो जुर्म करने जैसी तसल्ली हासिल होती है. इसके बाद हमारे दिल-दिमाग़ से वो बुरे ख़याल निकल जाते हैं.

शायद यही वजह है कि लोग इस्लामिक स्टेट के लोगों के मारने के वीडियो देखते हैं. शायद यही वजह है कि हम सड़क हादसे की जगह से गुज़रते वक़्त अपनी गाड़ियां धीमी कर लेते हैं ताकि हादसे की एक झलक मिल जाए.

शायद हमें डरने का एहसास अच्छा लगता है. इसी वजह से हम जब कोई डर पाल लेते हैं तो उसके साथ ही रहना चाहते हैं. ख़तरा चाहे असली न हो. वो डर हमें अजब सी तसल्ली देने लगता है. सीरियल किलर्स में दिलचस्पी की शायद ये सबसे बड़ी वजह है.

(अंग्रेज़ी में मूल लेख यहां पढ़ें, जो बीबीसी फ्यूचर पर उपलब्ध है.)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)