जहां एक इमारत में मौजूद हैं 18000 कंपनियां

सबसे कम वित्तीय पारदर्शिता वाले दुनिया के दस देशों में पनामा शामिल नहीं है.

पनामा की कंपनी मोसाक फोंसेका के दस्तावेज़ों की लीक होने से यह बात भी सामने आई है कि करों की चोरी करने वाले किस तरह से अपनी दौलत को छिपाते हैं और दुनिया का ध्यान टैक्स हेवंस यानी मध्य अमरीकी देशों की ओर कर देते हैं.

पनामा पेपर्स लीक से हुए पर्दाफ़ाश ने दुनियाभर के देशों को एक अंतरराष्ट्रीय पैनल बनाने के लिए प्रेरित किया है, जो उनकी वित्त व्यवस्था में पारदर्शिता लाने में मदद कर सके.

लेकिन वित्तीय गोपनीयता की जांच करने वाले अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने आगाह किया है कि पनामा उन दस शीर्ष देशों में भी शामिल नहीं है, जहां कम वित्तीय पारदर्शिता है.

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उनके मुताबिक़ अमीर यूरोपीय और उत्तरी अमरीका के लोग बहुत ही आसानी से अपने घर के बहुत ही क़रीब अपनी दौलत को छिपा सकते हैं. इससे यह भी अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि आख़िर क्यों अमरीका के महज़ कुछ ही लोग पनामा घोटाले में फंसे हैं.

पनामा पेपर्स लीक मामले की प्रमुख कंपनी मोसाक फोंसेका के सहायक संस्थापक रमोन फोंसेका के मुताबिक़ उनके देश और उनकी कंपनी पर ध्यान केंद्रित करना ग़लत है.

उन्होंने न्यूयॉर्क टाइम्स से कहा, "मैं आपको यक़ीन दिला सकता हूं कि न्यूयॉर्क, मियामी और लंदन में, पनामा से ज़्यादा गंदी दौलत है."

क्या रमोन फोंसेका कही कह रहे हैं? अंतरराष्ट्रीय कर और वित्तीय नियमों का विश्लेषण करने वाले स्वतंत्र संगठन 'द टैक्स जस्टिस नेटवर्क' ने एक सूची तैयार की है.

इसमें वित्तीय नियमों और लेन-देन की राशि के आधार पर देशों की रैंकिंग की गई है. इस सूची में पनामा का स्थान ऊपर के दस देशों में भी शामिल नहीं है.

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इसमें पहले नंबर पर स्विटज़रलैंड है, उसके बाद हाँगकाँग, अमरीका, सिंगापुर, द केमैन आइलैंड्स, लक्ज़मबर्ग, लेबनान, जर्मनी, बहरीन, और संयुक्त अरब अमीरात का स्थान है.

'द टैक्स जस्टिस नेटवर्क' के एलेक्स कोब्हम ने बीबीसी को बताया, "इसमें एक दोहरी नीति है. कई विकसित देश जहां वित्तीय पारदर्शिता नहीं है वो ख़ुद ही इसका समर्थन करते हैं या फिर इसे पनाह देते हैं."

बैंकिंग में लगभग अभेद्य गोपनीयता की परंपरा के साथ इस सूची में स्विटज़रलैंड सबसे ऊपर है. वैश्विक दबाव के बाद हाल ही में अंतरराष्ट्रीय कर चोरी के मामलों की जांच में ख़ाताधारकों की पहचान करने के लिए उसने इस गोपनीयता में कुछ छूट दी है.

इस सूची में स्विटज़रलैंड के बाद हाँगकाँग दूसरे स्थान पर है. 'द टैक्स जस्टिस नेटवर्क' के मुताबिक़ हाँगकाँग चिंता की एक बड़ी वजह है.

हाँगकाँग 1997 तक ब्रिटेन का उपनिवेश था और अब चीन का विशेष प्रशासी क्षेत्र है.

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पनामा पेपर्स से पता चला है कि इस कंपनी का क़रीब एक-तिहाई कारोबार हाँगकाँग और चीन के ऑफ़िस से आया है. इसने मोसाक फोंसेका के लिए चीन, सबसे बड़ा बाज़ार और हाँगकाँग सबसे व्यस्त ऑफ़िस बन गया.

यह जाने बगैर कि दौलत किसकी है, हाँगकाँग कथित शेयरधारकों को रक़म की लेनदेन की अनुमति देता है.

वहीं अमरीका में व्हाइट हाउस से महज़ कुछ दूरी पर, पूर्व-तटीय राज्य डेलवेयर में 945,000 कंपनियां मौजूद हैं, जो कि यहां की आबादी के लगभग बराबर है.

नेवाडा, एरिज़ोना और व्योमिंग के साथ ही डेलवेयर, अमरीका के उन चार राज्यों में है, जिसकी वित्तीय नियमों में ढीलेपन के कारण आलोचना हो चुकी है. वहां रजिस्टर्ड कई कंपनियों पर 'घोस्ट कंपनी' होने का भी शक है. यानी कि ऐसी कंपनी जो असल में मौजूद ही नहीं है.

भ्रष्टाचार विरोधी अभियान चलाने वाले ट्रांन्सपेरेंसी इंटरनेशनल इन राज्यों की व्याख्या, ट्रांसनेशनल क्राइम हेवेन (अंतरदेशीय अपराध का स्वर्ग) की तरह करता है.

12000 कंपनियों की पनाहगाह द केमैन आइलैंड्स के यूग्लैंड हाउस मामले पर 2008 में न्यू हैंपशायर में एक बहस के दौरान राष्ट्रपति ओबामा ने कहा था, "वह या तो सबसे बड़ी इमारत है या फिर रिकॉर्ड के आधार पर सबसे बड़ा टैक्स घोटाला है."

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यूग्लैंड हाउस की वेबसाइट पर दी गई जानकारी के मुताबिक़, अब यह इमारत में 18000 कंपनियों का रजिस्टर्ड ऑफ़िस है.

हालांकि द केमैन आइलैंड्स ब्रिटेन का हिस्सा है, लेकिन वह स्वशासन के आधार पर चलता है.

जसोन कोब्हम कहते हैं कि अगर इस स्थिति में द केमैन आइलैंड्स को ब्रिटेन की रैंक में शामिल कर लिया जाए, तो ब्रिटेन का स्थान इस सूची में सबसे ऊपर हो जाएगा.

ब्रिटेन के ही अधीन आने वाले 'द ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड्स' को भी पनामा पेपर्स ने एक बार फिर सुर्खियों में ला दिया है.

जिन कंपनियों का नाम पनामा पेपर्स में आया है उनमें पनामा में रजिस्टर्ड कंपनियों की तुलना में, दोगुना से भी ज़्यादा कंपनियां द ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड्स में रजिस्टर्ड हैं.

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