जब गाने के लिए निकाल लिए जाते थे लड़कों के अंडकोष

  • 11 अप्रैल 2016
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अक्सर आपने लोगों को दूसरों की आवाज़ की नक़ल उतारते सुना होगा. कई बार मर्द, औरतों जैसी आवाज़ निकालने की कोशिश करते हैं. तो कुछ आदमियों की आवाज़ क़ुदरती तौर पर महिलाओं जैसी होती है.

मगर आजकल नाटकों में, ओपेरा में कई ऐसे गायक सुनने को मिल रहे हैं, जो हैं तो मर्द, मगर गाते हैं औरतों की आवाज़ में. पहले-पहल सुनने पर तो लोग इसका यक़ीन तक नहीं करते. क्योंकि ऐसे ऊंचे सुरों में गाने का सलीक़ा, अक्सर औरतों में ही देखा जाता है. लेकिन अगर आपने ''बी गीस'' का रिकॉर्ड सुना है कभी तो आपको पता होगा कि कैसे मर्द, औरतों की बनावटी आवाज़ में गाते हैं. ऐसा बनावटी सुर अक्सर पकड़ में आ जाता है.

पर आजकल मर्दों के औरतों के सुर में गाने का चलन तेज़ी से बढ़ रहा है. लोग ऊंचे सुरों वाले ऐसे गायकों को ख़ूब पसंद भी कर रहे हैं. यूं तो बनावटी सुरों का ये चलन पिछली सदी का है. मगर इक्कीसवीं सदी में इसका बाज़ार बहुत तेज़ी से फैल रहा है.

शास्त्रीय संगीत की दुनिया में ऐसे गायको की अच्छी ख़ासी तादाद है. मसलन, अल्फ्रेड डेलर, जेम्स बोमैन, डेविड डेनियल्स और एंड्रियास शॉल. इनका ख़ूब नाम है. फिर भी, औरतों की आवाज़ में गाने वाले मर्द गायक गिनती के ही हैं.

अभी चालीस बरस पहले ही ऐसे गायकों को उंगलियों पर गिना जा सकता था. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तो इनकी तादाद और भी कम थी. लेकिन, हाल के कुछ बरसों में कई ऐसे गायक शोहरत और कामयाबी हासिल कर रहे हैं. ये ऐसे गायक हैं जो लड़कपन में ही नपुंसक बना दिए गए गायकों जैसी आवाज़ निकालते हैं, नामर्द बनाए जाने की प्रक्रिया से गुज़रे बिना.

नई नस्ल के इन गायकों में 33 बरस के अमरीकी गायक एंथनी रॉथ कॉस्टैंजो का नाम पहले नंबर पर आता है. इन्हें ''परफ़ेक्ट म्यूज़िशियन'' कहा जाता है. इसी तरह 38 साल के फ्रेंच गायक फिलिप यारूस्की हैं, जो किसी भी आम पॉप गायक की तरह ही बेहद लोकप्रिय हैं. वो जहां भी जाते हैं, उनके फ़ैन उनके पीछे पड़ जाते हैं.

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इसी तरह भारतीय मूल के संगीतकार ज़ुबिन मेहता के भतीजे बेजुन मेहता भी काफ़ी शोहरत कमा रहे हैं. फिर 36 बरस के ब्रितानी गायक लेस्टिन डेवीस का नाम आता है. डेवीस तो अपनी गायकी के लिए ग्रैमी और दो ग्रामोफ़ोन अवार्ड जीत चुके हैं.

बर्तानवी अख़बार द टेलीग्राफ़ उन्हें इंटरनेशनल स्टार का दर्जा दे चुका है. औरतों की तरह गाने वाले किसी मर्द के लिए ये मामूली उपलब्धि नहीं.

सवाल ये उठता है कि ऐसे गायकों का चलन शुरू कैसे हुआ? और कैसे इसमें लोगों की इतनी दिलचस्पी हो गई? इन सवालों के जवाब के लिए इतिहास के पन्ने पलटने होंगे.

ब्रिटिश गायक लेस्टिन डेवीस कहते हैं कि ऐसी आवाज़ निकालना हंसी खेल नहीं. उनकी आवाज़ क़ुदरती तौर पर ऐसी नहीं है. इसके लिए उन्होंने बहुत मशक़्क़त की है. गले से महीन सुर निकालने के लिए बहुत रियाज़ करना पडता है.

डेवीस कहते हैं कि लोग अक्सर समझ लेते हैं कि कुछ मर्दों की आवाज़ औरतों जैसी है. वो गायक बन गए हैं तो औरतों जैसी आवाज़ में गा रहे हैं. मगर सच ये नहीं है. वो कहते हैं कि हर आदमी, औरतों जैसे बनावटी सुर निकाल सकता है. इनमें से कुछ लोग लगातार ऐसा करने लगते हैं, जैसे कि ख़ुद डेवीस. डेवीस समझाते हैं कि जैसे पॉप गायक बैरी गिब, अपने मध्यम सुर के बजाय लगातार ऊंचे सुर में गाए. जैसे कि औरतें गाती हैं. जब किसी तराने के सुर कुछ ज़्यादा ही ऊंचे उठने लगते हैं तो कई बार ये एहसास होता है कि ये सोपरानो या ऊंचे सुर में गाने वाली महिलाओं जैसी आवाज़ में गाया जाए तो और अच्छा लगेगा.

डेवीस की क़ुदरती आवाज़ धीमी है. वो गाते हैं तो मध्यम सुर में. लेकिन, लड़कपन में ही उन्होंने ने महिलाओं जैसे ऊंचे सुर निकालने की कोशिश शुरू कर दी थी. उनके दोस्तों ने इसकी तारीफ़ की. उनका हौसला बढ़ाया. तो उन्होंने अपनी इस क़ाबिलियत को गंभीरता से लिया और इस पर काफ़ी मेहनत की. डेवीस ने कैम्ब्रिज के सेंट जॉन्स कॉलेज से गायकी की स्कॉलरशिप हासिल की. इसके बाद उन्होंने ब्रिटेन की रॉयल एकेडमी ऑफ़ म्यूज़िक से ट्रेनिंग ली. इसके बाद जो उन्होंने कामयाबी की राह पकड़ी तो पीछे मुड़कर नहीं देखा.

आज ऐसी बनावटी, ऊंचे सुरों वाली गायकी में करियर भले अच्छा हो. मगर इसका इतिहास बेहद भयानक रहा है. सत्रहवीं और अठारहवीं सदी में चर्च में महिलाओं के बोलने पर पाबंदी थी. मगर जब चर्च में गीत गाए जाते थे, तो महिलाओं की आवाज़ की भी ज़रूरत पड़ती थी. ऐसी ज़रूरतों के लिए लड़कों को कम उम्र में ही नपुंसक बना दिया जाता था. ताकि उनकी आवाज़ महीन ही रहे, आदमियों जैसी भारी न हो जाए.

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नपुंसक बनाए गए इन गायकों में सबसे बड़ा नाम था इटली के कार्लो ब्रोश्की का. जिन्हें फैरीनेली के नाम से ज़्यादा शोहरत मिली. उस दौर में फैरीनेली जैसे गायक तैयार करने के लिए लड़कों को कम उम्र में ही बधिया किया जाता था. उनके अंडकोष निकाल दिए जाते थे. इसके पीछे चर्च का नियम था. जिसके मुताबिक़, महिलाओं को चर्च के भीतर आवाज़ नहीं निकालनी चाहिए.

सिर्फ़ चर्च ही क्यों, मन बहलाने के दूसरे ज़रियों में भी महिलाओं के जाने पर रोक थी. जैसे कि किसी नाटक कंपनी में. ऐसे में आदमी ही औरतों के भी रोल करते थे. इसके लिए भी ये नपुंसक बनाने का रिवाज चलन में था. उस वक़्त ओपेरा की शुरुआत हो रही थी. उसमें ऊंचे सुरों वाले गायकों की ज़रूरत हुआ करती थी. इसलिए भी ये रिवाज ख़ूब चलन में था. ऐसे कलाकारों का काफ़ी नाम और सम्मान भी था. ख़ुद फैरीनेली के बारे में कहा जाता था कि एक ईश्वर है और एक ही फैरीनेली. पूरे यूरोप में फैरीनेली की आवाज़ की धूम थी.

आज हमें मालूम नहीं कि ऐसे नपुंसक बनाए गए गायकों की आवाज़ कैसी होती थी. मगर, इसके पीछे के क्रूर रिवाज को भूलना मुश्किल है.

अभी हाल ही में फ्रेंच गायक फिलिपे यारूस्की ने कहा था कि उनकी महीन, ऊंचे सुरों वाली आवाज़ सुनकर कुछ लोगों के अंदर नफ़रत की भावना जागेगी. आख़िर किसी मर्द के शरीर से औरत जैसी आवाज़ का निकलना कोई आम बात तो नहीं. लोग अक्सर ऐसे गायकों को हिजड़े समझते हैं.

वहीं ब्रिटिश गायक डेवीस इसको अलग नज़रिए से देखते हैं. वो कहते हैं कि किसी भी नई चीज़ को जानने समझने में वक़्त लगता है. शुरुआत में इससे डर भी पैदा होता है. आज भले लोग इसे बेहतर समझते हों, मगर बीसवीं सदी के पचास के दशक में ऐसी आवाज़ वाले गायक अल्फ्रेड डेलर को ज़रूर ज़्यादा मुश्किलों का सामना करना पड़ा होगा. लोगों ने उनकी गायकी में मीन-मेख निकाला. उस वक़्त तो लोग ये भी कहते थे कि अल्फ्रेड को अकेले गाने की इजाज़त नहीं दी जानी चाहिए.

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पर अब वक़्त बदल चुका है. चर्च की गायक मंडली से शुरू हुई परंपरा आज शोहरत पाने का नया ज़रिया बन गई है. ओपेरा में गायकी की शुरुआत से लेकर आज मर्दों के महिलाओं की आवाज़ निकालने का चलन बहुत आगे बढ़ चुका है. आज ख़ास ऐसे गायकों के लिए गीत लिखे जा रहे हैं, संगीत की धुनें तैयार की जा रही हैं.

संगीत को ज़िंदा रखने के लिए ये ज़रूरी है कि हम न सिर्फ़ पुराने चलन को दोहराते रहें, बल्कि ये भी ज़रूरी है कि उसमें नए सुर और नई धुनें जोड़ते रहें. बनावटी आवाज़ वाले सुरों का ये चलन वैसी ही कोशिश है.

(अंग्रेज़ी में मूल लेख यहां पढ़ें, जो बीबीसी कल्चर पर उपलब्ध है.)

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