क्या आप भी मुँहतोड़ जवाब देना चाहते हैं?

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आपने कभी ऐसे आदमी के साथ काम किया है जो ख़ुद को असुक्षित महसूस करता हो, या जिसे डर लगता हो, या जो आपको डराता हो.

वो लगातार आप पर फ़ब्तियां कसता हो या आपकी छोटी-मोटी बातों का बेहूदा जवाब देता हो. आपकी नाकामी का मज़ाक़ बनाता हो.

कई बार ऐसा होता होगा कि आप ऐसे लोगों को मुँहतोड़ जवाब देना चाहते हैं, मगर कुछ कह नहीं पाते. कई बार आप दो दिन बाद उसकी बात याद करके कोई कड़क सा जवाब सोच लेते होंगे.

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मगर, तब तक तो बहुत देर हो चुकी होती है.

किसी की भी फ़ब्तियों का सही वक़्त पर माकूल जवाब दे पाना ही आपको तसल्ली दे सकता है. आप जैसे ही किसी की बात पर चौंकते हैं, तो ज़रूरी होता है कि आप उसका फ़ौरी जवाब दे सकें.

जानकार कहते हैं कि किसी की बेहूदा बात या भद्दे मज़ाक़ का मुँहतोड़ जवाब देने के लिए ज़रूरी है कि पहले आप उसकी बात ग़ौर से सुनें.

एक बात तो यह कि मुँहतोड़ जवाब कोई योजना बनाकर नहीं दिया जा सकता. वह तभी आपके दिमाग़ में आना चाहिए. इसके लिए ज़रूरी है कि जब कोई बोले तो आप उसकी बात पहले ध्यान से सुनें.

जर्मनी के थिएटर लैंग्वेज स्टूडियो की एबिगेल पॉल कहती हैं कि लोग दूसरों के बोलने की रफ़्तार से ज़्यादा तेज़ी से सोचते हैं. इससे सुनने वाले को सामने वाले की बात का जवाब सोचने का वक़्त मिल जाता है.

जिस वक़्त बोलने वाला यह सोच रहा होता है कि सामने वाला उसकी बात सुन रहा है, ठीक तभी वह मन में जवाब सोच रहा होता है.

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आप इस बात को ऐसे समझें. कितनी ही बार कॉन्फ्रेंस कॉल में आप दूसरों की बात सुनते-सुनते कोई आइडिया देने की सोचने लगते हैं. कुछ सवालों के जवाब बताने को बेताब हो जाते हैं, यहां तक कि सामने वाले की बात ख़त्म नहीं होती और आप बोल पड़ते हैं.

यही आदत उस वक़्त भी लागू होती है जब आप किसी की फ़ब्तियां या बेहूदा मज़ाक़ सुन रहे होते हैं.

अब सवाल यह है कि किसी की बात सुनते हुए जो आपके पास वक़्त होता है उसका कैसे सही इस्तेमाल करें कि आप सामने वाले को मुँहतोड़ जवाब दे सकें.

एबिगेल कहती हैं कि हम अक्सर दूसरों की बात पूरी तरह सुने बग़ैर जवाब देने को बेताब होते हैं और सटीक जवाब देने का मौक़ा गंवा देते हैं. वो कहती हैं कि किसी को मुंहतोड़ जवाब देने का सबसे सही तरीक़ा है कि उसे ग़ौर से सुनें.

एक तरीक़ा हो सकता है एक शब्द वाला वॉलीबाल खेल खेलना. जिसमें दो लोग धड़ाधड़, बारी-बारी एक-एक शब्द जोड़कर एक कहानी बुनने की कोशिश करते हैं. इस खेल में खिलाड़ी अपने साथी की बात ग़ौर से सुनने को मजबूर होते हैं. तभी वो जल्दी से सही शब्द बोल पाएंगे.

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इस खेल का मक़सद होता है कि हम अपने अहम को किनारे रखें और सामने वाले को ध्यान से सुनें, उसे अहमियत दें. क्योंकि किसी की भी बात ध्यान से सुनने का मतलब है कि आप अपनी राय बदलने को राज़ी हैं.

जहां तक बात व्यंग्य भरी बातों की है, तो अगर आपका कोई साथी लगातार ऐसी हरकत करता या करती है, तो उसकी बातें ग़ौर से सुनने की आदत डालें. उसकी बात ध्यान से सुनेंगे तभी आप उसको मुँहतोड़ जवाब दे पाएंगे. सुनने की आदत डालकर आप, पूरी बातचीत का कंट्रोल अपने हाथ में ले लेते हैं.

अगर कोई यह कहकर आपका मज़ाक़ बनाता है कि आपने तो बहुत बढ़िया काम किया. तो, आप यह कहकर उसे चुभने वाला जवाब दे सकते हैं कि मुझे ऐसे काम के लिए कम ही तारीफ़ मिलती है.

अगर कोई कहे कि क्या आप बस इतना ही कर सकते हैं. तो जवाब में कह सकते हैं कि, शायद मेरी इतनी ही क़ाबिलियत है. अब इससे बेहतर काम का रास्ता आप ही सुझाएं.

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एक और तरीक़ा ये कि बातचीत के दौरान आप सामने वाले का भाव बढ़ा दें. अगर कोई बार-बार आपके काम में खोट निकालता है तो आप ये कहकर उसका भाव बढ़ा सकते हैं कि आप कोई बेहतर सलाह दे सकते हैं, कोई नया तरीक़ा सुझा सकते हैं क्या?

आपकी मदद से ये काम और अच्छे तरीक़े से किया जा सकता है. बहुत कुछ इस पर निर्भर करेगा कि आप किस लहज़े में यह बात कहते हैं. व्यंग्य भरा लहज़ा आपकी बातों का मतलब पूरी तरह बदल देगा.

इन मामलों की जानकार बेलिना रैफ़ी कहती हैं कि किसी को मात देनी हो तो अपने लहज़े में नरमी लाएं. आधी बाज़ी आप ऐसे ही जीत लेंगे.

बेलिना कहती हैं कि जब दफ़्तर में चुहलबाज़ी या मज़ाक़, बेहूदगी में तब्दील होता है तो माहौल ख़राब हो जाता है. इससे लोगों के रिश्ते भी ख़राब हो जाते हैं.

उनके मुताबिक़ किसी के काम में कमी निकालने से काम पर असर पड़ता है. जिसके काम में बार-बार खोट निकाली जाती है, उसकी परफ़ॉर्मेंस पर भी इसका असर पड़ता है.

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अक्सर फ़ब्तियों का जवाब व्यंग्य से देने का दिल करता है. अगर आप बातचीत को पॉज़िटिव रखते हैं तो बाज़ी आपके हाथ लग सकती है. लोग उसमें छुपी हाज़िरजवाबी को महसूस कर पाएंगे.

सामने वाला भी कितनी बार व्यंग्य करेगा. जब आप उसकी बात को दरकिनार कर अपने तरीक़े से उससे निपटेंगे. कोई अगर कहे कि यह काम बड़ा धीमा चल रहा है. तो आप कह सकते हैं कि धीमा ही सही, मगर चल तो रहा है, रुका तो नहीं.

बेलिना रैफ़ी कहती हैं कि बातचीत को पॉज़िटिव रखकर आप दफ़्तर का माहौल बदल सकते हैं. इससे आपके साथी, आपके जूनियर और आपके बॉस के बीच आपकी इमेज बेहतर होगी. इससे लोगों का मज़ाक़ बनाने वाले की बदनीयती भी लोगों के सामने ज़ाहिर हो जाएगी.

वैसे हाज़िरजवाबी का एक ही मक़सद होता है, माहौल को हल्का-फुल्का बनाना. आप बात ऐसे कहें कि लोग मुस्कुरा उठें या ठहाका लगाएं. तो बात अपने आप ही ख़त्म हो जाती है.

दूसरों का हँस देना ही आपकी जीत की निशानी है.

(अंग्रेजी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी कैपिटल पर उपलब्ध है.)

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