महज दो साल में ये शहर तबाह हो गया

  • 15 अप्रैल 2016
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ये कहानी एक ऐसे शहर की है, जिसने बर्बाद होने के बाद तबाही देखी. जो उजड़ चुका था, फिर भी उजाड़ दिया गया. जिसके सिर्फ़ निशां मिलते थे, मगर वो निशान भी बर्बर इंसानों ने मिटा दिए.

जो शहर सिर्फ़ क़िताबों में था. जिसके क़िस्से बड़े-बूढ़ों की ज़ुबां से सुनने को मिलते थे. उस शहर को, जिसके महज़ कुछ अवशेष मौजूद थे. वो भी कुछ लोगों की आंखों में ऐसे खटके कि वो यादें तहस-नहस कर दी गईं. वो अवशेष भी तबाह कर दिए गए.

ये कहानी है सीरिया के शहर पल्माइरा की. यह दो उंगलियों में फंसी एक तस्वीर है जिसमें, कभी शानदार रहे इस शहर के कुछ शानदार खंडहर दिखते हैं. इसी तस्वीर के के पीछे है आज का मंज़र, जिसमें टूटे-फूटे पत्थर के टुकड़े हैं, लंगड़ाकर चलता हुआ इतिहास है. जो अपने जख़्मों को सहला रहा है. मानो आंसू बहाते हुए ख़ुद पर हुए ज़ुल्म की बेज़ुबां दास्तां सुना रहा हो.

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दर्दनाक दास्तां बयां करने वाली ये तस्वीर तैयार की जोसेफ़ ईद ने. सीरिया के ऐतिहासिक ठिकाने पल्माइरा की ये ख़ास तस्वीर जोसेफ़ ने दो तस्वीरों को मिलाकर तैयार की है. एक है वो तस्वीर जो जोसेफ़ ने दो साल पहले उसी जगह की खींची थी. उससे भी बड़े कैनवास पर, मगर इसके पीछे वो तस्वीर है, जो पल्माइरा के आज के हालात बयां करती है.

ये मंज़र इसलिए इंसानियत के सामने है, क्योंकि इसे हैवान बन चुके कुछ इंसानों ने ही धरती पर उकेरा.

जब इस्लामिक स्टेट ने पिछले साल पल्माइरा पर कब्ज़ा कर लिया, तो उन्होंने इस ऐतिहासिक शहर के खंडहरों को डायनामाइट से उड़ा दिया. भरे-पूरे इतिहास के गवाह रहे इन खंडहरों को तहस-नहस कर डाला.

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अब जबकि रूसी वायुसेना की मदद से सीरिया की फौज ने एक बार फिर पल्माइरा को अपने कब्ज़े में ले लिया है. तो, ये खंडहर पूरी दुनिया के लिए चुनौती बन गए हैं. कैसे इस धरोहर को फिर से ज़िंदा किया जाए? कैसे इसे आने वाली नस्लों के लिए सहेजकर रखा जाए?

नई और पुरानी तस्वीरों को मिलाकर, फ़ोटोग्राफर जोसेफ ईद ने दुनिया को वो मंज़िल दिखाने की कोशिश की है, जहां इस्लामिक स्टेट, इंसानियत को ले जाने पर आमादा है. ये आतंकवादी संगठन ऐतिहासिक धरोहरों को मिटाकर, हमें एक अंधेरे, घुटनभरे मुस्तक़बिल की ओर धकेल रहा है.

पल्माइरा, इंसानी सभ्यता की कामयाबी का बड़ा प्रतीक थे. ये खंडहर, विशाल खंभे, शहर में प्रवेश के लिए बने दरवाज़ों की नक्काशीदार मेहराबें, किसी की जीत और किसी की हार की कहानी कहती थीं. साथ ही वो बताती थीं कि इंसान के हाथों का हुनर, दिमाग़ का खुलापन, कैसी ख़ूबसूरत तस्वीरें धरती पर उकेर सकता है.

पल्माइरा के ये खंडहर, ईसा के बाद की दूसरी और तीसरी सदी में बनाए गए थे. जब यूनानियों ने यहां के स्थानीय निवासियों यानी पार्थियन्स को हराया था.

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जोसेफ़ ईद की पल्माइरा की ये तस्वीर, चीन के बाग़ी कलाकार आई वेईवेई की 1995 की ऐतिहासिक तस्वीर की याद दिलाती है. ये तस्वीर, ''ड्रॉपिंग ए हान डायनैस्टी अर्न'' के नाम से मशहूर हुई थी.

इसमें एक शख़्स, चीन की दो हज़ार साल पुरानी एक ऐतिहासिक धरोहर को ज़मीन पर पटककर तबाह करता दिखता है. उसके चेहरे पर अपने किए का कोई पछतावा नहीं दिखता. न ही देखने वाले तुरंत ये समझ पाते हैं कि आख़िर इस सुराही के टूटने से इंसानियत ने कितना बड़ा नुक़सान उठाया. मगर, जब आप लगातार ग़ौर से इस तस्वीर को देखते हैं तो आपको इसकी गंभीरता का एहसास होता है.

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जोसेफ़ ईद की पल्माइरा की तस्वीरें भी यही बताती है. मगर जहां ऐई की तस्वीर को कलाकृति माना जाता है. वहीं जोसेफ ईद की तस्वीरों को तबाही की दास्तां बताने वाला कहा जा रहा है.

ऐई की तस्वीरों के मुरीद कहते हैं कि उन्होंने एक धरोहर की बर्बादी की बेहद छोटी सी मिसाल के ज़रिए एक बहुत बड़ी बात समझाने की कोशिश की थी. मगर, जोसेफ ईद की तस्वीर में तो तबाही ख़ुद ब ख़ुद इतनी बड़ी दिखती है. आज पूरी दुनिया पल्माइरा की ऐतिहासिक धरोहरों की बर्बादी को लेकर दुखी है.

वैसे दोनों तस्वीरों की तुलना भी नहीं. ऐई ने जिस सुराही को तोड़ने की तस्वीर ली. वो उन्होंने ऐक ऐसे बाज़ार से ख़रीदी थी, जहां बनावटी सामान ख़ूब बिकते हैं. ऐसे में वो सुराही दो हज़ार साल पुरानी कोई ऐतिहासिक धरोहर थी या नहीं, ये भी पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता है. वहीं जोसेफ ईद की तस्वीरें तो साफ बताती हैं कि इस्लामिक स्टेट किस बेदिली से इतिहास के पन्नों को ख़ून से रंग रहा है. मानवता के कई सबूत मिटाने पर आमादा है.

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ऐई की तस्वीरें किसी कलाकार की कल्पना भर हैं. वहीं पल्माइरा की तस्वीरें तल्ख़ सच्चाई बयां करती हैं. ऐई एक सुराही फोड़कर अपनी आज़ादी का एलान करते हैं. वहीं पल्माइरा की तबाही हमें एक ख़ास सोच की क़ैदी बनाती है.

(अंग्रेज़ी में मूल लेख यहां पढ़ें, जो बीबीसी कल्चर पर उपलब्ध है.)

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