आप 'लाइ डिटेक्टर' से झूठ बोल सकते हैं?

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पोलीग्राफ़ या झूठ पकड़ने वाली मशीन से चालाकी करना कितना आसान है?

बीबीसी संवाददाता टिफ़ानी वेन ने ख़ुद ऐसा करने की कोशिश की. आइए जानते हैं क्या वह इसमें सफल हो पाईं या नहीं.

इसके लिए जब टिफ़ानी वेन ने 'गेज़िट पोलीग्राफ़ संस्थान' से संपर्क किया, तो संस्थान के सहायक संस्थापक इरैन गेज़िट ने कहा ''पोलीग्राफ़ी कोई खेल नहीं है.''

हालांकि इस जवाब के बावजूद वो इरैन गेज़िट के पिता मोर्डी गेज़िट का साक्षात्कार करने पहुँचीं.

इस संस्थान की शुरुआत करने से पहले, मोर्डी गेज़िट 10 साल तक तेल अवीव में इसराइली पुलिस की पोलीग्राफ़ यूनिट में काम कर चुके थे.

टिफ़ानी वेन यह इरादा भी करके गई थीं कि वह निश्चित तौर पर 'लाइ डिटेक्टर' से झूठ बोलकर जीत जाएंगी.

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इसके लिए उन्हें आराम कुर्सी पर बैठाया गया. उनके सीने के पास फ़ीते की तरह दो पट्टियाँ लगा दी गईं. उसके बाद उनकी उंगलियों पर धातु के यंत्र लगाए गए.

इसके अलावा ब्लड प्रेशर मापने वाली एक मशीन भी उनके सामने लटक रही थी. और इन सबसे कुछ तार निकलकर एक बॉक्स से जुड़े थे. फिर यह बॉक्स लगातार मोर्डी गेज़िट के लैपटॉप में डेटा पहुँचा रहा था.

लाइ डिटेक्टर टेस्ट के दौरान कई चीज़ों की जांच होती है. इसमें सांस की दर, धड़कन, ब्लड प्रेशर और त्वचा की गेल्वेनिक प्रतिक्रिया की जाँच की जाती है.

गेल्वेनिक प्रतिक्रिया, त्वचा में मौजूद विद्युतीय गुणों की जांच करता है.

ज़रूरत पड़ने पर लाइ डिटेक्टर टेस्ट में कुछ और चीज़ों की भी जांच की जा सकती है; मसलन एमआरआई से मस्तिष्क की सक्रियता.

आमतौर पर अमरीका और ज़्यादातर यूरोपीय देशों में पोलीग्राफ़ से जुटाए गए सुबूत को कोर्ट में पेश नहीं किया जा सकता.

मगर अधिकारी इन सुबूतों का दूसरा इस्तेमाल करते हैं. ब्रिटेन में जांच अधिकारी पोलीग्राफ़ के सुबूतों का इस्तेमाल गंभीर यौन अपराधियों की निगरानी के लिए करते हैं. इस आधार पर कई लोगों को वापस जेल भेजा जाता है.

अमरीका में सीआईए और दूसरी सरकारी नौकरियों की इच्छा रखने वालों का पोलीग्राफ़ टेस्ट किया जाता है.

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अमरीकी पोलीग्राफ़ एसोसिएशन के प्रमुख वॉल्ट गुडसन ने 25 साल तक टेक्सस पुलिस में काम किया है.

वॉल्ट गुडसन पुलिस जांच में पोलीग्राफ़ के महत्व पर जोर देते हैं. उनका कहना है, "किसी जाँच के दौरान पोलीग्राफ़ बहुत मदद करता है. यह बहुत जल्द ही किसी संदिग्ध के बारे में बहुत कुछ बता देता है. इससे हम यह तय कर सकते हैं कि क्या हमें उसी व्यक्ति पर ध्यान रखना है या फिर किसी और को भी जांच के दायरे में लाना है."

पोलीग्राफ़ टेस्ट में किसी को धोख़ेबाज़ी सिखाने का नतीजा काफ़ी गंभीर हो सकता है. ओक्लाहोमा के एक पूर्व पुलिस अधिकारी को हाल ही में इसके लिए दो साल की जेल हुई है. उन्होंने कुछ अंडरकवर फ़ेडरल एजेंटों को पोलीग्राफ़ को धोख़ा देने का प्रशिक्षण दिया था, जो अपने अपराध छिपाना चाह रहे थे.

क्या बिना किसी ट्रेनिंग के टिफ़ानी वेन के लिए पोलीग्राफ़ टेस्ट को मूर्ख बना पाना संभव है?

जिस वक़्त टिफ़ानी मोर्डी गेज़िट से मिलीं, उन्हें लगा कि वह एक सरकारी एजेंट के सामने हैं. टिफ़ानी को 69 साल के मोर्डी के चेहरे पर उनका अनुभव दिख रहा था.

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पूरी तरह प्रोफ़ेशनल और आत्मविश्वास से भरे मोर्डी ने टिफ़ानी से उनका प्रेस कार्ड मांगा. इस दौरान टिफ़ानी सोच रही थीं कि अगर वह लाइ डिटेक्टर से चालाकी करने में सफल हो भी गईं, तो भी यह व्यक्ति उन्हें पकड़ लेगा.

टिफ़ानी जाँच से पहले ही इस तरह नर्वस हो रही थीं, मानो वो किसी ऐसे काम में पकड़ी गई हैं, जो उन्होंने किया ही नहीं है. हालांकि बाद में उन्हें पता चला कि यह पोलीग्राफ़ टेस्ट से जुड़ी समस्या का एक हिस्सा है.

पोलीग्राफ़ टेस्ट के दौरान आमतौर पर एक कुशल जांचकर्ता, आपसे ज़रूरी और ग़ैरज़रूरी दोनों तरह से सवाल करता है. जैसे - क्या आपने बैंक डकैती की थी और क्या आपने कभी कोई ऐसी चीज़ अपने पास रखी है जो आपकी नहीं थी?

अब क्योंकि बिना कुछ झूठ बोले, ग़ैरज़रूरी सवालों के जवाब में वास्तव में कोई भी 'नहीं' बोलना आसान नहीं होता, इसलिए लाइ डिटेक्टर टेस्ट के लिए ग़ैरज़रूरी सवालों के दौरान मिली मनोवैज्ञानिक प्रतिक्रिया एक तरह का आधार या बेसलाइन बन जाती है.

इसके पीछे योजना यह होती है कि बिना किसी तनाव के झूठ बोलने पर आप जो प्रतिक्रिया देते हैं, उसे इकट्ठा कर लें.

इस तरह के आंकड़ों से इंसान को मशीन को समझने में काफ़ी मदद मिलती है और उसे ज़्यादा आत्मविश्वास होता है कि मशीनें एक सफ़ेद झूठ बोलने पर मिलने वाली प्रतिक्रियाओं पर निगरानी रख रही हैं.

यह 'क्या आप एक इंसान हैं' जैसे सीधे के सवाल के मुक़ाबले बेहतर होता है.

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साल 2000 से antipoligraph.org चलाने वाले जॉर्ज मैस्ख के मुताबिक़, पोलीग्राफ़ को मात देने तरीक़ा यह है कि आप ज़रूरी सवालों को पहचानें और उन पर अपनी प्रतिक्रिया को संयमित तरीक़े से आगे बढ़ाएं.

गुडसन के मुताबिक़ किसी नौसिखिए छात्र के सामने वह पोलीग्राफ़ टेस्ट को मात दे सकते हैं, लेकिन किसी अनुभवी जांचकर्ता के सामने ऐसा कर पाना आसान नहीं है.

वे बताते हैं, "इंसानी के मनोविज्ञान को बदल पाना मुश्किल नहीं है और कई ऐसी वेबवाइट हैं, जो ऐसा सिखाती हैं. मगर ऐसी वेबसाइट यह नहीं सिखा सकती कि किसी के मनोविज्ञान को किस तरह बदला जाए, जो पोलीग्राफ़ टेस्ट करने वाले को किसी सवाल के जवाब में सही या स्वाभाविक लगे."

वे कहते हैं, "जब जाँच के दौरान कोई अपने शरीर की प्रतिक्रियाएं बदलकर सामान्य अवस्था में लाने की कोशिश करता है, तो इससे एक असामान्य डेटा या अस्वाभाविक मनोवैज्ञानिक प्रतिक्रिया पैदा होती है. इसे एक अनुभवी जांचकर्ता पकड़ लेता है."

कुछ शोधकर्ता इसे लेकर भी चिंतित हैं कि ग़लती होने पर जांच में कुछ ज़्यादा ही ग़लत संकेत मिलने लगते हैं. इसका मतलब है कि ग़लती से फँसे बेगुनाह लोग, कुछ ज़्यादा ही पॉजिटिव संकेत देने लगते हैं.

और ग़लती से बच निकले गुनाहगार कुछ ज़्यादा ही नेगेटिव संकेत देने लगते हैं. यह ऐसी घटना है, जिसे पोलीग्राफ़ की वैधता पर ब्रिटिश साइकोलॉजिकल सोसाइटी की 2014 की रिपोर्ट में देखा जा सकता है.

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गुडसन के मुताबिक़, सच बोलने वाले कुछ लोग अपने शरीर की प्रतिक्रियाओं को क़ाबू में रखने के लिए ज़ोर लगाने की कोशिश में पोलीग्राफ़ टेस्ट में पास नहीं हो पाते.

वह कहते हैं, "जब कोई बेगुनाह अपने मनोविज्ञान को बदलने की कोशिश करता है, तो वह सोचता है कि इससे वह पोलीग्राफ़ में पास हो जाएगा. मगर पोलीग्राफ़ ऐसे लोगों को भ्रम में रहने वालों में गिनता है."

कई वैज्ञानकि मानते हैं कि लाइ डिटेक्टर के सिद्धांत में कई ख़ामियां हैं क्योंकि यह ज़रूरी नहीं है कि मनोवैज्ञानिक प्रतिक्रिया का संबंध झूठ बोलने से ही हो.

2011 में आंकड़ों के एक अध्ययन में अमरीकी पोलीग्राफ़ एसोसिएशन ने पाया कि तुलना करने वाले सवालों का जो जवाब मिला, उनमें से क़रीब 15 फ़ीसदी ग़लत थे.

हालांकि टिफ़ानी वेन जिस जांच को पास करने की कोशिश कर रही हैं, वो काफ़ी तेज़ आवाज़ में है और उसे धोख़ा दे पाना थोड़ा मुश्किल है. लेकिन वे ऐसा एक 'स्टोरी' बनाने के लिए कर रही हैं, इसलिए मोर्डी गेज़िट ने उनके लिए एक उपाय ढूंढा है, ताकि वह इस प्रक्रिया की जांच कर सकें. इसके लिए तुलनात्मक सवालों की भी कोई ज़रूरत नहीं है.

मोर्डी गेज़िट ने उन्हें एक काग़ज़ पर 1 से 7 के बीच कोई एक संख्या लिखने को कहा. इस दौरान वे अपने तरीके से कुछ 'झूठ' करने की कोशिश कर रही थीं, जैसा उन्होंने कुछ लिखा ही न हो.

उधर, टिफ़ानी के शरीर की प्रतिक्रिया पर मोर्डी की नज़र थी.

यह ख़ामियों से भरे इस ज्ञान को समझने का एक सरल तरीका था, जिसका उपयोग जाने-माने अपराधों की जांच में होता है. इसमें जांचकर्ता किसी संदिग्ध को कुछ ख़ास जानकारियों के साथ पेश करता है. ऐसी जानकारी जिसका अपराध से कोई संबंध हो या न हो, और इन पर संदिग्ध की क्या प्रतिक्रिया रही है.

उदाहरण के तौर पर बैंक डकैती की बात को ही ले लें. अन्य सूचनाओं के साथ बैंक डकैती की रकम की मात्रा को भी पेश करते हैं. या फिर पुलिस ने बैंक को जो काग़ज़ात दिए हों, उसे पेश किया जा सकता था.

फिर भी जॉर्ज मैस्ख कहते हैं कि इसे धोख़ा दे पाना संभव है. ब्रिटिश साइकोलॉजिकल सोसाइटी की रिपोर्ट के मुताबिक़ तुलनात्मक तरीका और वैज्ञानिक दृष्टि से कम विवादास्पाद उपाय के मुकाब़ले, इस दोषपूर्ण ज्ञान की जांच सैंद्धांतिक रूप से तो बहुत असरदार दिखती है.

उधर टिफ़ानी वेन भी अपनी परीक्षा में बुरी तरह नाकाम रहीं, उन्हें झूठ में पकड़ लिया गया. उन्होंने संख्या '6' के लिए झूठ का सहारा लिया था और मोर्डी गेज़िट ने भी उन्हें ठीक इसी समय पकड़ा.

(अंग्रेज़ी में मूल लेख यहां पढ़ें, जो बीबीसी फ़्यूचर पर उपलब्ध है.)

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