जो मां-बाप के होते भी अनाथ हैं

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ये ऐसी औद्योगिक क्रांति है, जो स्टेरॉयड लेकर हुई है.

चीन ने मात्र कुछ ही दशकों में वह हासिल कर लिया है, जिसके लिए दूसरे देशों को क़रीब-क़रीब सदी लग गई हैं. और अगर इसकी रफ़्तार असाधारण है तो पैमाना भी.

और हां, इस बात पर अचरज नहीं होना चाहिए कि इस आर्थिक उथल-पुथल के साथ जो सामाजिक विस्थापन हुआ है, वह इस क़दर बड़ा है कि चार्ल्स डिकेंस ने सपने में भी नहीं सोचा होगा.

इसकी मानवीय त्रासदी को कोई भी चीज़ चीन के छूट गए बच्चों की कहानी से ज़्यादा बेहतर ढंग से नहीं कह सकती.

चीन के बहुत से बच्चों की कहानी एक एनिमेशन फ़िल्म के टांग युवेन जैसी है. उसके माता-पिता चेंगदू शहर की एक कपड़ा मिल में काम करते हैं और उन्हें गांव से वही शक्ति घसीटकर ले गई है जो एक सदी पहले ब्रिटेन के मैनचेस्टर में ब्रितानी ग्रामीणों को ले गई थी.

अनुमान के अनुसार छह करोड़ से ज़्यादा चीनी बच्चे ग्रामीण इलाक़ों में पल रहे हैं जबकि उनके माता-पिता कहीं और काम करते हैं - चीन के आर्थिक चमत्कार की हृदयस्थली में असेंबली लाइन पर सामान लगाते या उत्पादन करने वाली मशीन चलाते हुए.

बच्चों की यह संख्या चीन की कुल आबादी का 20 फ़ीसदी है और लगता है कि हाल के वर्षों में चीन के सरकारी नियंत्रण वाले मीडिया को इस त्रासद घटनाक्रम पर चर्चा करने का लाइसेंस मिल गया है.

जून 2015 में चार भाई-बहनों में सबसे छोटे पांच साल की उम्र के बच्चे ने, जिनके मां-बाप काम करने कहीं और गए थे - पेस्टीसाइड खाकर आत्महत्या कर ली थी.

चाइना डेली की ख़बर में साफ़ किया गया कि यह अकेला मामला नहीं है. सिक्सियान में अपनी दादी, अपने छोटे भाई और दो चचेरे भाइयों के साथ रहने वाला टांग युवेन कहता है, 'मुझे उनकी बहुत याद आती है.'

हफ़्ते भर वो अपने स्कूल के पास एक कमरे के अपार्टमेंट में समय गुज़ारते हैं, कमरे के बीच रखे एक टब में नहाते हैं और पड़ोसियों के साथ शौचालय साझा करते हैं. वो ग़रीब हैं.

ये चारों बच्चे 'छूट गए बच्चे' हैं और क्योंकि कई दशकों से ग्रामीण इलाक़े सिचुआन से करोड़ों कर्मचारी बाहर जाते रहे हैं, इसलिए यह सामान्य बात है. सिक्सियान के प्राथमिक स्कूल में 80% तक बच्चे अपने मां या पिता के बिना ही रहते हैं.

आधुनिक चीन का निर्माण इन आतंरिक रूप से विस्थापित श्रमिकों के कठोर श्रम से ही हुआ होगा लेकिन इसकी भारी क़ीमत उनके बच्चों को भी चुकानी पड़ी है.

यह वियोग टांग युवेन के इंटरव्यू में बहुत सामान्य ढंग से दिखता है, "मैं जानता हूं कि मेरे माता-पिता के लिए पैसा कमाना बहुत मुश्किल है. लेकिन मैं उन्हें बहुत ज़्यादा याद करता हूं और यह बहुत तकलीफ़देह है."

गुइझाओ प्रांत में, जो 2015 के पेस्टीसाइड आत्महत्या मामले वाले से बहुत दूर नहीं है, हमें 14 साल की टाओ लान अपने 11 साल के भाई टाओ जिनकुन के साथ रहते हुए मिले.

वह शायद चीन के बच्चों की ख़ुशहाली के सबसे खौफ़नाक़ आंकड़ों का हिस्सा हैं: माना जाता है कि 20 लाख से ज़्यादा छूट गए बच्चे बग़ैर किसी नज़दीकी रिश्तेदार के सहयोग के, अकेले रहते हैं.

दो कमरे के घर में, जिसके लकड़े के तख़्तों की बीच से हवा आती है, वह अपने छोटे भाई को स्कूल का काम करने में मदद करती हैं, बाहर एक छोटे से ज़मीन के टुकड़े पर अपनी सब्ज़ियां उगाती हैं और खाना बनाती हैं.

दोनों बारी-बारी से बर्तन धोते हैं. उनके माता-पिता वहां से करीब एक हज़ार मील दूर रहते और काम करते हैं और साल में बस एक बार ही आ पाते हैं.

मैं टाओ लान से पूछता हूं, "अगर स्कूल में तुम्हारा दिन बहुत ख़राब बीते तो तुम अपने मां और पिता को बता तो नहीं पाती होगी."

अपने आंसू पोंछते हुए वह बोलती है, "मैं उन्हें नहीं बता सकती. मां और पापा बहुत मुश्किल ज़िंदगी काट रहे हैं. मैं नहीं चाहती कि वह मेरी चिंता करें."

पश्चिमी जगत में तो अब यह मान लिया गया है कि बचपन में अभाव और तिरस्कार बाद के जीवन में असमाजिक और आपराधिक बर्ताव की वजह बन सकते हैं.

लेकिन सिचुआन और गुइझ़ाओ में मिले बच्चों में मुझे ग़ुस्सा या असंतोष नज़र नहीं आया.

इसके बजाय वह असाधारण परिपक्विता के साथ यह स्वीकार करने को तैयार नज़र आए कि आर्थिक ज़रूरतों की वजह से उनके माता-पिता को जीवन में मुश्किल चुनाव करने पड़े हैं. अब अधिकारियों ने अपनी तरह की पहली देशव्यापी गणना करने का ऐलान किया है ताकि छूट गए बच्चों की सही संख्या का पता किया जा सके.

लेकिन दबाव बढ़ाने की कोशिशें और बेहतर आंकड़े इकट्ठा करने की कोशिशें समस्या की जड़ तक नहीं पहुंचेंगी.

चेंग्डू में टैक्सटाइल फ़ैक्ट्री और टांग युवेन के घर की दूरी महज़ कुछ घंटे की यात्रा की है. लेकिन काम के लंबे घंटे और पैसा बचाने की ज़रूरत का अर्थ यह है कि उसके माता-पिता के लिए साल में दो या तीन बार ही घर आना ठीक रहता है.

और इसके स्वाभाविक हल, अपने बच्चों को साथ ले जाना, का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता. चीन की घरेलू पंजीकरण प्रणाली के अनुसार वह जहां चाहे काम करने के लिए स्वतंत्र हैं लेकिन उन्हें और उनके बच्चों को सरकारी कल्याणकारी सुविधाएं जैसे कि स्वास्थ्य सुविधा सिर्फ़ अपने गांव में ही मिल सकती है.

उनकी फ़ैक्ट्री के नज़दीक के एक रेस्तरॉं में हमने टांग युवेन के माता-पिता को उनके बेटे का रिकॉर्डेड इंटरव्यू दिखाया.

यह एक तकलीफ़देह और कुछ हद तक क्रूर प्रयोग लग रहा था, जैसा नाटकीय प्रभाव की तलाश में रहने वाले टीवी न्यूज़ के रिपोर्टरों को पसंद होता है. लेकिन दोनों माता-पिता वह वीडियो देखने के लिए बहुत उत्सुक लह रहे थे.

आखिरकार उन्होंने टांग युवेन के पांच महीने से नहीं देखा था. टांग युजुन जब अपने 12 साल के लड़के को औपचारिक कपड़ों में देखते हैं तो हंसते हैं. मुझे यह हंसी ग्रामीण जीवन की नीरसता के बीच संपन्नता की चमक के निजी अहसास सी लगी.

बाद में पता चला कि वह अपने पिता के कपड़ों को उठा रहा है. टांग बताते हैं, "वह मेरी टाई है!"

उसकी मां लियु टिंग ने सुबकते हुए मुझे कहा, "मुझु उसकी बहुत चिंता होती है, क्योंकि मैं उसकी साथ नहीं हूं. मुझे उसकी सुरक्षा की चिंता होती है. अगर कोई कानूनी अड़चन नहीं होती तो हम उसे अपने साथ ले आते."

सरकार मानती है कि छूट गए बच्चों की समस्या का तुरंत समाधान किए जाने की ज़रूरत है. लेकिन जो भी मेड इन चाइना उत्पाद ख़रीदता है या अब भी विकास कर रही इस अर्थव्यवस्था में निवेश करता है- एक सवाल है.

अगर यह अति-विशाल औद्योगिक क्रांति अधिक लोकतांत्रिक अवरोधों वाली जगह में हुई होती तो जो विस्थापित श्रमिक इसके केंद्र में, हो सकता है कि वह एक आधारभूत मांग करने में सक्षम हो पाते.

ऐसी मांग जिसकी अक्सर अन्य जगह परवाह नहीं की जाती. और हो सकता है कि उन्होंने अब तक अपने परिवार के साथ जीने का अधिकार हासिल कर लिया होता.

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