'कोई आंख ऐसी न थी जो आँसुओं से भरी न हो'

  • 23 अप्रैल 2016
इमेज कॉपीरइट AP

राजधानी काठमांडू से 130 किलोमीटर दूर चर्चित ट्रेकिंग केंद्र लांगतांग पिछले साल नेपाल में आए भूंकप में बुरी तरह तबाह हुआ था.

एक वक्त घाटी के बीचोंबीच स्थित ये गांव नेपाली और विदेशी ट्रेकर्स का सबसे पसंदीदा स्थान था.

इमेज कॉपीरइट AFP

अपने प्राकृतिक सौंदर्य व चीड़ के जंगलों के लिए मशहूर लांगतांग में 25 अप्रैल 2015 को जब भूकंप आया तो भारी भूस्खलन हुआ जिससे पूरा गांव चट्टान, मिट्टी, और ऊपर से गिरती पहाड़ियों के नीचे दब गया.

इमेज कॉपीरइट .

भूकंप के बाद सबसे पहले लांगतांग पहुंचने वाले बीबीसी संवाददाता जस्टिन रॉलैट के अनुसार वहां तबाही इतनी ख़तरनाक थी कि पूरे इलाके में केवल एक इमारत नज़र आती थी, जैसे कि अन्य सभी इमारतों को किसी बड़े बुलडोज़र ने धरती में मिला दिया हो.

वहाँ पर होटलों, गेस्ट हाउस और ट्रेकर्स की जगह केवल मलबा और लाशें ही देखी जा सकती थी.

रॉलैट ने एक साथ एक के ऊपर एक पड़ी 52 लाशें देखी थीं.

इमेज कॉपीरइट .

जस्टिन रॉलैट के मुताबिक, "इस गांव के अधिकांश लोग तिब्बती हैं. यह मुसीबतों से भरी और सख्त पहाड़ी ज़िंदगी जीने के आदी होते हैं. भूकंप के बाद जब मैं इस गांव में आया और इसके निवासियों में से जिससे भी बातचीत की तो हर किसी की आंखों को नम पाया. कोई आंख ऐसी न थी जो आंसुओं से भरी न हो. पूरा गांव ग़म और सदमे में जी रहा था."

डेन्डअप लामा की आंखें तो रो-रोकर लाल हो चुकी थी. डेन्डअप ने बेहद निराशा भरे अंदाज़ कहा था, "हमने अपना सब कुछ खो दिया है, यहां हर किसी ने अपना परिवार खोया है.' यह दृश्य इतना मार्मिक और भयावह था कि मैं खुद भी अपने आंसूओं को रोक नहीं पाया था."

इस बार रॉलैट जब सालभर बाद वापस लौटे तो डेन्डअप ने उनका स्वागत गले लगाकर किया. लेकिन उसकी आंखों में नमी अब भी मौजूद थी. वह रॉलेट और उनके साथियों को घाटी की चोटी पर बनाए गेस्ट हाउस में ले गया. यह गेस्ट हाउस उसने ही बनाया था.

इमेज कॉपीरइट Surendra Phuyal

भूकंप से काफी लोग भी इस गेस्ट हाउस के आसपास आकर बस गए हैं. इनमें काफी सारे अभी अस्थाई घरों में रह रहे हैं. यह समुदाय जैसे-तैसे अपनी ज़िंदगी को दोबारा संवारने की कोशिश कर रहा है.

भूकंप में मारे गए लोगों की बरसी को मानने के लिए इस गांव के बाशिंदे जब पूजा करने के लिए गांव में एकत्र हुए तो उनके चेहरों को देखकर साफ पता चल रहा था कि उन पर आज भी क्या गुजर रही है. डेन्डअप ने मुझे वो जगह भी दिखाई जहां उन्होंने अपनी मां की मृत देह को मलबे में से निकाला था. इस दौरान उन्होंने अपना मुंह मुझसे फेर लिया.

दावा शेरपा ने इस भूंकप में अपनी पत्नी, बेटे और पोते को हमेशा के लिए खो दिया था. इस बात का ग़म आज भी उनके चेहरे पर साफ पढ़ा जा सकता है.

वह बेहद उदासी भरे लहजे में बताते हैं कि सिर्फ 15 मिनट में सब कुछ तबाह हो गया था. आज भी जब मैं अपनी आंखे बंद करता हूं तो भूंकप की भयावह यादें मुझे घेर लेती हैं और सोने नहीं देती.

इमेज कॉपीरइट AP

उनकी नम आंखे बताती हैं कि वह पिछले एक वर्ष से ठीक से सो नहीं पाएं हैं.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए

संबंधित समाचार