'इधर भारत का जंगी जुनून, उधर भूखे किसान'

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Image caption भारत और पाकिस्तान एक दूसरे पर हथियारों की रेस को बढ़ाने का आरोप लगाते हैं

पाकिस्तान के उर्दू अख़बारों मे जहां भ्रष्टाचार के आरोपों में छह सैन्य अफसरों की छुट्टी चर्चा का विषय है, वहीं भारत की सबमरीन मिसाइल के परीक्षण पर पाकिस्तानी सरकार की नराजागी को भी तवज्जो दी गई है.

रोज़नामा ‘एक्सप्रेस’ ने ‘भारत का जंगी जुनून’ शीर्षक से लिखा है कि पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता कहते हैं कि भारत ने परमाणु पनडुब्बी से चलने वाली एटमी मिसाइल का परीक्षण कर हिंद महासागर को भी परमाणु हथियारों की दौड़ में शामिल कर दिया है.

अख़बार लिखता है कि भारत की तरफ़ से पारंपरिक हथियारों के साथ साथ एटमी हथियारों की तैयारी से लगता है कि वो क्षेत्र में अपना दबदबा कायम करने के लिए जंगी जुनून में पड़ चुका है.

अख़बार का आरोप है कि जंगी ताक़त के नशे में भारत ने वैश्विक क़ानूनों की परवाह न करते हुए पाकिस्तान को एटमी मिसाइल के परीक्षण की जानकारी देना भी ज़रूरी नहीं समझा.

'औसाफ़' लिखता है कि भारत की जंगी तैयारियों को देख कर लगता है कि वो पड़ोसी देशों के ख़िलाफ़ आक्रामक इरादे रखता है और अंतरराष्ट्रीय नियमों क़ानूनों को ताक पर रख कर क्षेत्र में जंगी जुनून को हवा दे रहा है.

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Image caption पाकिस्तान के परमाणु हथियारों की सुरक्षा को लेकर हमेशा सवाल उठाए जाते रहे हैं

अख़बार ने इस सिलसिले में राजस्थान के बीकानेर में भारतीय सेना के अभ्सास का भी ज़िक्र किया है जिसमें उसके मुताबिक़ तीस हज़ार से ज़्यादा सैनिक हिस्सा ले रहे हैं.

'जंग' लिखता है कि भारत ने हथियारों की ऐसी दौड़ शुरू की है जिसमें पाकिस्तान भी शामिल होने के मजबूर है क्योंकि उसे अपना बचाव सुनिश्चित करना है.

अख़बार कहता है कि यूं तो दोनों देशों में संसाधनों का बहुत बड़ा हिस्सा इस दौड़ पर ख़र्च होता है और इसी वजह से दोनों देशों के बहुत से लोग बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं.

अख़बार कहता है कि भारत में रोज़ भूख और ग़रीबी से तंग आकर किसानों की आत्महत्याओं का सिलसिला कई दशकों से जारी है.

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Image caption सेना प्रमुख राहील शरीफ के फैसले को लेकर पाकिस्तान में बहुत चर्चा हो रही है

रोज़नामा दुनिया ने भ्रष्टाचार के आरोपों में छह बड़े सैन्य अफ़सरों को हटाने के लिए सेना प्रमुख जनरल राहील शरीफ़ के फैसले को सही क़रार दिया है.

अख़बार लिखता है कि ये ऐसा फ़ैसला है जिससे सिविल संस्थाओं के प्रमुखों, अफ़सरों और राजनेतों को भी सीख लेनी चाहिए.

'नवा-ए-वक़्त' लिखता है कि इस वक़्त पनामा लीक्स के मामले में ख़ास तौर से सत्ताधारी परिवार बहुत दबाव में है और विपक्षी पार्टियां सरकार के ख़िलाफ़ जोरदार मुहिम चलाने की योजना बना रही हैं.

अख़बार लिखता है कि बेलाग जबावदेही की जरूरत अपनी जगह, मगर इस समय सैन्य संस्था की सक्रियता से जिस संभावित नए सियासी संकट का संकेत मिल रहा है वो देश की सुरक्षा और व्यवस्था को बनाए रखने के लिहाज से अच्छी ख़बर नहीं देता है.

हाल में छोटू गैंग के ख़िलाफ़ पाकिस्तानी सेना की कार्रवाई पर जसारत लिखता है- अब डाकुओं को भी सेना ही पकड़ेगी.

अख़बार लिखता है कि अगर फौज ही डाकुओं से निपटेगी और कराची में भी ऑपरेशन करेगी तो फिर चुनी हुई सरकारों का क्या काम रह गया है.

अख़बार के मुताबिक ये चुनी हुई सरकारों की 'नालायकी' है कि हर काम के लिए सेना को बुलाना पड़ा रहा है क्योंकि अगर ये सरकारें और पुलिस डाकुओं का सफ़ाया भी नहीं करेंगी तो और क्या करेंगी.

रुख़ भारत का करें तो उत्तराखंड के हालिया नाटकीय घटनाक्रम पर 'हिंदोस्तान एक्सप्रेस' लिखता है कि राज्य में लगे राष्ट्रपति शासन को हटाने वाला हाई कोर्ट का फ़ैसला ऐतिहासिक था लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 27 अप्रैल तक राष्ट्रपति शासन को बहाल रखा है.

अख़बार कहता है कि आगे क्या होगा, ये तो 27 अप्रैल की सुनवाई से तय होगा लेकिन केंद्र सरकार के लिए जहां ये एक ज़बरदस्त झटका है वहीं मौजूदा राजनीति पर भी एक सख़्त हमला है.

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अख़बार की राय है कि धारा 356 के दुरुपयोग को लेकर बीजेपी हमेशा कांग्रेस को कोसती रही है, लेकिन लगता है कि अब वो अपने पहले रुख़ से उलट काम कर रही है.

इस विषय पर 'हमारा समाज' ने ‘सत्ता की जंग’ शीर्षक से लिखा है कि हाई कोर्ट में शिकस्त खा चुकी केंद्र सरकार शायद ही सुप्रीम कोर्ट को अपनी दलीलों से संतुष्ट कर पाए और राष्ट्रपति शासन को दुरुस्त ठहरा पाए.

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