द.अफ़्रीका में मिले आदिमानव के पैरों के निशान

इमेज कॉपीरइट Alamy Stock Picture

हम सबको ये जानने में दिलचस्पी रहती है कि आख़िर आदि मानव कैसे रहते थे. वो कैसे ज़िंदगी बसर करते थे? उनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी कैसी रही होगी?

यूं तो नई-नई तकनीक और वैज्ञानिक तजुर्बों से हर रोज़ आदि मानव की ज़िंदगी पर नई रोशनी डाली जा रही है. मगर हाल ही में वैज्ञानिकों को पता चला है एक पुराना तरीक़ा, जिसकी मदद से गुफ़ाओं में रहने वाले आदि मानव की ज़िंदगी के बारे में काफ़ी कुछ पता चल पाएगा.

अफ्रीका में कई ऐसी गुफ़ाएं हैं जिनके भीतर पाषाण युग या स्टोन एज के इंसानों की रिहाइश के सबूत मिलते हैं.

मगर दिलचस्प बात ये है कि आदि मानव के ये निशान किसी नई तकनीक की मदद से नहीं खोजे गए. न ही वैज्ञानिकों ने इसके लिए मेहनत की.

असल में नामीबिया की गुफ़ा में आदि मानव के पैरों के ये निशान, वहां के तीन आदिवासियों ने खोज निकाले हैं. ये प्रोफ़ेशनल ट्रैकर, नामीबिया के एक आदिवासी समुदाय से ताल्लुक़ रखते हैं.

जर्मनी के निएंडरथल म्यूज़ियम के आंद्रे पास्टूर्स को नई तकनीक की मदद से आदि मानव के निशान खोजने में महारत हासिल है. लेकिन उन्हें ये भी पता है कि जैसे जानवरों के पग मार्क से उनके बारे में पता लगाया जा सकता है. ठीक वैसे ही आदि मानव के पैरों के निशान की मदद से उनके बारे में जानकारी जुटाई जा सकती है.

इमेज कॉपीरइट Andreas Pastoors et al

अफ्रीका में ऐसे कई आदिवासी क़बीले हैं जिनके सदस्य आदि मानव के पैरों के निशान खोज निकालते हैं.

फ्रांस की पेक मर्ल गुफ़ा को ही लीजिए. इसके अंदर वैज्ञाविकों ने आदि मानव के पैरों के कई निशान खोजे हैं. मगर नामीबिया के क़बीले के तीन ट्रैकर जैसे ही गुफ़ा में पहुंचे उन्होंने आदि मानव के पैरों के कई निशान वैज्ञानिकों को बताए जो वैज्ञानिक नहीं देख पाए थे.

नामीबिया के इन प्रोफ़ेशनल ट्रैकर्स के नाम हैं सिके, जुंटा और थाओ. ये जु-होआंसी-सैन क़बीले के सदस्य हैं.

इन तीनों ट्रैकर्स ने ये भी बताया कि पेक मर्ल गुफ़ा में पांच इंसानों के पांव के निशान थे. जबकि पहले वैज्ञानिकों को लगता था कि गुफ़ा में सिर्फ़ दो आदि मानव रहे थे. लेकिन नामीबियाई ट्रैकर्स ने बताया कि गुफ़ा में कुल पांच लोग आज से क़रीब पंद्रह हज़ार साल पहले रहते थे.

इनमें एक बुज़ुर्ग था. दो महिलाएं थीं. एक युवक था और एक बच्चा भी था. बच्चा गुफ़ा में ख़ूब उछल-कूद मचाता था.

इमेज कॉपीरइट Andreas Pastoors et al

बहुत से आदिवासी समुदायों के पास पिछली पीढ़ियों से विरासत में मिली ऐसी कई ख़ूबियां हैं. जिनका फ़ायदा, इंसान के विकास के राज़ उजागर करने में लिया गया है.

आंद्रे पास्टूर और उनके साथी ये मानते हैं कि सिके, जुंटा और थाओ की इस ख़ूबी का फ़ायदा लिया जा सकता है आदि मानव के निशान जुटाने में. ख़ास तौर से गुफ़ाओं मे रहने वाले आदि मानवों के बारे में.

आंद्रे मानते हैं कि नई तकनीक और आदिवासी की जानकारियों के मेल से आदि मानव के बारे में काफ़ी नई जानकारियां जुटाई जा सकती हैं.

ब्रिटिशल म्यूज़ियम के निकोलस एश्टन उस टीम के सदस्य हैं जिसने ब्रिटेने के हैपिसबर्ग इलाक़े में आदि मानवों के निशानों को खोजा था. एश्टन भी मानते हैं कि नई तकनीक का पुरानी जानकारी से मेल होना चाहिए. एश्टन कहते हैं कि आज तकनीक और आदिवासी जानकारियों को जोड़ दें तो कई नई चीज़ें मालूम हो सकती हैं.

इमेज कॉपीरइट Andreas Pastoors et al

जिस तरह जू होआंशी-सैन आदिवासियों ने पेक मर्ले गुफ़ा में आदि मानव के पैरों के निशान खोजकर वैज्ञानिकों को चौंका दिया. उन्होने बताया कि गुफ़ा में दो नहीं पांच लोग रहते थे. उन्होंने गुफ़ा में रहने वालों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी के बारे में भी बता दिया.

हालांकि एश्टन को लगता है कि जू होआंशी-सैन आदिवासियों के लिए ब्रिटेन की हैपिसबर्ग गुफ़ाओं के बारे में शायद वो कुछ ज़्यादा न बता पाएं. क्योंकि हैपिसबर्ग में इंसानों की अलग नस्ल के निशान मिले हैं. हम ये हमें तय करना होगा कि इन आदिवासी ट्रैकर्स पर कितना भरोसा किया जा सकता है.

मगर आज जहां पुरानी जानकारी जुटाने में तकनीक का बोलबाला है. वहां आदिवासी ट्रैकर्स, हमारी जानकारी को बढ़ा रहे हैं. ये काफ़ी हौसले की बात है.

पिछली सदी के नब्बे के दशक में कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी ने इन ट्रैकर्स को लेकर एक रिसर्च की थी. उन्होंने इन जू होआंशी-सैन आदिवासियों से आदि मानव की ट्रैकिंग के लिए कहा. उन्होंने जो भी बताया वो वैज्ञानिकों की जुटाई असल जानकारी से काफ़ी मेल खाता था.

जानकार मानते हैं कि दुनिया ने बहुत सही वक़्त पर इन ट्रैकर्स की ख़ूबियां पहचान ली हैं. क्योंकि अब तो आदिवासियों के बीच भी ट्रैकिंग की क़ाबिलियत घट रही है. कई जगह आदिवासियों के धंधों पर पाबंदी लगा दी गई है. जैसे बोत्सवाना में तो शिकार पर ही रोक लगी है. ऐसे में वहां के आदिवासियों के बीच ट्रेकिंग की ख़ूबी कम हो रही है.

इमेज कॉपीरइट Andreas Pastoors et al

अब वैज्ञानिक अगर आदि मानव की जानकारी जुटाने में आदिवासियों की मदद ले रहे हैं. तो इससे उन्हें रोज़गार तो मिल रहा है.

दक्षिण अफ्रीका में ऐसा एक संगठन काम करता है जो इन आदिवासी ट्रैकर्स को रोज़गार मुहैया कराने में मदद करता है. पिछले बीस सालों में इस संगठन ने कम से कम पांच हज़ार आदिवासियों को ट्रेकिंग करने का सर्टिफ़िकेट दिया.

इससे ट्रेकिंग करने वालों का हौसला भी बढ़ा और अब वैज्ञानिक भी इन लोगों से आसानी से जुड़ सकते हैं. इससे आदि मानव के बारे में जानकारी जुटाने में भी काफ़ी मदद मिली. आदिवासियों की रोज़ी-रोटी का भी जुगाड़ हो गया.

(अंग्रेज़ी में मूल लेख यहां पढ़ें, जो बीबीसी अर्थ पर उपलब्ध है.)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार