बांग्लादेश में हो रही हत्याओं के पीछे कौन

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बांग्लादेश में एक के बाद एक हुए क़ातिलाना हमलों ने इस देश और देश के बाहर भी ख़तरे की घंटी बजा दी है.

इस मामले में अब तक यह बहुत साफ़ भी नहीं है कि इन हत्याओं के पीछे किनका हाथ है.

बीबीसी ने इन हत्याओं से जुड़े कुछ अहम सवालों की पड़ताल की है.

अब तक कितने लोगों की हत्या हो चुकी है?

बांग्लादेश में 2013 से धर्मनिरपेक्ष लेखकों, ब्लॉगरों, प्रोफ़ेसर, धार्मिक अल्पसंख्यकों और दो विदेशियों समेत अब तक 20 लोगों की हत्या हो चुकी है.

यहां इन हमलों का आरोप इस्लामिक चरमपंथियों पर लगाया जाता है.

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अप्रैल के अंतिम दिनों में, दो दिन के भीतर तीन लोगों की हत्या ने यह डर भी बढ़ा दिया कि यहां हिंसा में तेज़ी आ रही है.

अक्तूबर में दो विदेशियों, एक इटली और एक जापान के व्यक्ति की हत्या ने इस मुद्दे को नया मोड़ दे दिया है. इसने सुरक्षा को लेकर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं.

कई हमलों में तो चाक़ू गोदकर हत्या की गई है, जबकि कुछ में लोगों का सिर क़लम किया गया है.

क्या बांग्लादेश में हिंसा बढ़ रही है?

बांग्लादेश में हो रही हत्याओं को देख कर तो यही लगता है कि यहां हिंसा में तेज़ी आई है.

यहां पहले धर्मनिरपेक्ष और नास्तिक ब्लॉगरों पर हमले हो रहे थे. लेकिन ऐसा लगता है कि अब चरमपंथियों ने अपनी हिंसा का दायरा बढ़ा दिया है.

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23 अप्रैल को मारे गए यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर नास्तिक तो नहीं थे, लेकिन वो ऐसी कई सांस्कृतिक गतिविधियों में शामिल थे, जिनके बारे में कट्टरपंथियों का कहना था कि ये इस्लाम के ख़िलाफ़ हैं.

इस तरह के विचारों से बांग्लादेश में बढ़ता कट्टरपंथ दिखता है. बांग्लादेश एक धर्मनिरपेक्ष देश है. यहां मुस्लिमों का बहुमत है.

यहां कई लोग हैं, जो कथित तौर पर उनके धर्म के ख़िलाफ़ बोलने वालों के प्रति कोई सहानुभूति नहीं रखते हैं. यहां तक कि इस तरह की अवधारणा के पीछे कोई बुनियाद हो या न हो.

ढाका में प्रोफ़ेसर की हत्या के बाद समलैंगिकों के अधिकार के लिए आंदोलन चलाने वाले एक व्यक्ति और उनके साथी की हत्या से भी यही ज़ाहिर होता है कि चरमपंथियों ने अपनी वारदात का दायरा बढ़ा लिया है.

इन हत्याओं के पीछे किसका हाथ है?

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बांग्लादेश में हज़ारों चरमपंथी समूह हैं. यह अभी तक साफ नहीं है कि इन हत्याओं के पीछे किसका हाथ है?

कथित तौर पर इस्लामिक स्टेट या अल-क़ायदा से जुड़े संगठनों के बजाय सरकार दावा करती है कि इसके पीछे विपक्षी दलों या स्थानीय इस्लामिक संगठनों का हाथ है, जो देश को अस्थिर करना चाहते हैं.

सरकार के इस दावे पर विवाद है. विपक्षी दल इन दावों को ग़लत ठहराते हैं.

बांग्लादेश में समलैंगिक अधिकारों की वकालत करने वाली पहली पत्रिका 'रूपाबन' के संपादक की हत्या के बाद प्रधानमंत्री शेख हसीना ने कहा, "इन गुप्त हत्याओं के पीछे विपक्षी दलों का हाथ है, जो देश को अस्थिर करना चाहते हैं."

पिछले साल सितंबर में इटली के सहायता समूह के कार्यकर्ता सिसर टैवेला और जापानी किसान कुनियो होशी पर एक ही तरीक़े से हमला किया गया था.

रिपोर्टों के मुताबिक़ आईएस ने इन हमलों की ज़िम्मेदारी ली थी.

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लेकिन जब सरकार यह कहती है कि बांग्लादेश में एक संगठन के तौर पर आईएस की कोई मौज़ूदगी नहीं है, तो वहीं कई जानकार मानते हैं कि यह मुद्दा बहुत छोटा है, क्योंकि वहां कई स्थानीय चरमपंथी गुटों की विचारधारा भी आईएस जैसी ही है.

सेना के पूर्व ब्रिगेडियर जनरल सख़ावत हुसैन, जो अब एक सुरक्षा विश्लेषक हैं, वो कहते हैं, "हर गुप्त इस्लामिक संगठनों के बीच आपस में कुछ संबंध है, क्योंकि वो एक तरह की विचारधारा रखते हैं. लेकिन मैं पूरे यक़ीन के साथ नहीं कह सकता कि विदेशियों की हत्या में इस्लामिक स्टेट का कोई हाथ है या नहीं."

क्या पुलिस ने अब तक किसी हमलावर को पकड़ा है?

पिछले साल चाकू से गोदकर बांग्लादेश में चार धर्मनिरपेक्ष ब्लॉगरों की हत्या कर दी गई थी. हर हत्या के बाद लोग सराकर की तरफ ध्यान लगाकर देख रहे थे.

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अक्तूबर में बांग्लादेश के उत्तरी इलाक़े में एक हमले में एक ईसाई पादरी की गला रेत कर हत्या कर दी गई. इस हत्या के बाद पुलिस ने प्रतिबंधित इस्लामिक ग्रूप जमात उल मुजाहिदीन के पांच सदस्यों को गिरफ़्तार किया था.

इसके अलावा इस्लाम की सूफ़ी विचारधारा के एक धर्म गुरु यानि 'पीर' का ढाका के उनके घर पर ही सर क़लम कर दिया गया था.

पीड़ितों के सूची बढ़ने के बाद भी, जांच के मामले में पुलिस बहुत आगे नहीं बढ़ पाई है.

अबतक केवल 2013 में हुई ब्लॉगर अहमद राजीब हैदर की हत्या के मामले में ही किसी को सज़ा हो पाई है. लेकिन बाक़ी के मामलों में अब तक किसी को सज़ा नहीं मिली है.

असल में कई मामलों में तो पुलिस, अभियुक्तों की पहचान भी नहीं कर पाई है. उदाहरण के लिए लेखक अविजित रॉय की हत्या को एक साल से भी ज़्यादा वक़्त गुज़र चुका है, लेकिन इस मामले में किसी पर आरोप भी तय नहीं हो पाया है.

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जानकारों का मानना है कि पुलिस, जांच के काम को गंभीरता से नहीं ले रही है. इसके पीछे शेख़ हसीना का वह बयान है, जिसमें उन्होंने नास्तिक ब्लॉगरों की ही आलोचना की थी.

पिछले सप्ताह धर्म की आलोचना करने वालों को कड़ी चेतावनी देते हुए उन्होंने कहा था, "मैं ऐसे लेखन को स्वतंत्र नहीं, बल्कि केवल अपवित्र मानती हूं. कोई भी व्यक्ति ऐसे शब्द क्यों लिखता है? अगर कोई हमारे पैग़ंबर या किसी और धर्म के ख़िलाफ़ लिखता है, तो यह किसी भी हालत में मंज़ूर नहीं है."

वहीं विपक्षी दलों का कहना है कि लेखकों और विपक्ष पर आरोप लगाने से भरोसेमंद जांच को धक्का लगा है.

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