कैसे भेजे जाते हैं खुफिया संदेश?

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इक्कीसवीं सदी में हमारी ज़िंदगी तरह तरह के सिस्टम की ग़ुलाम बन गई है.

हमारा खाना, कपड़ा, दवाएं और फ़ोन, हर चीज़ एक ख़ास सप्लाई चेन के ज़रिए हम तक पहुंचती है.

इसके लिए ये चीज़ें कभी जहाज़ के ज़रिए, तो कभी नाव से और कभी रेलगाड़ी से पहुँचाई जाती हैं.

दुनिया की 85 फ़ीसद माल की ढुलाई समंदर के ज़रिए होती है, जो वज़न में क़रीब एक हज़ार करोड़ मेट्रिक टन होती है.

बोइंग या एयरबस जैसे, हर कारोबारी विमान में कुछ न कुछ सामान लदा होता है.

केवल ब्रिटेन के हवाई अड्डे हर साल क़रीब पच्चीस लाख टन सामान का हिसाब क़िताब देखते हैं.

वहीं ब्रिटेन की रेलगाड़ियां हर साल क़रीब साढ़े छह सौ करोड़ टन माल की ढुलाई करती हैं.

माल ढुलाई के इस बुनियादी ढांचे का संचालन बिना किसी मुसीबत या रोक-टोक के चलता रहे, इसमें बेहतरीन संचार व्यवस्था मदद करती है.

हमें उनकी ख़बर तभी मिलती है, जब कोई परेशानी आती है. जब विमान या ट्रेन में लदा कोई पार्सल गुम हो जाता है या जब कोई ट्रेन लेट हो जाती है.

बीबीसी की टीम ने ये जानने की कोशिश की है कि आम आदमी विमानों, जहाज़ों और रेलगाड़ियों के इस कम्यूनिकेशन सिस्टम को कहां तक समझ पाते हैं.

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इसके लिए बीबीसी की टीम ने फैमिलियर्स नाम का एक प्रोजेक्ट शुरू किया. इसमें जहाज़ों, विमानों और रेलगाड़ियों के बीच हो रही बातचीत का एक लाइव नक्शा दिखाने की कोशिश की गई.

इसमें सारे डेटा तो नहीं दिखाई देते, लेकिन मोटा-मोटा अंदाज़ा हो जाता है कि सभी चीज़ों का संचालन कैसे हो रहा है.

अब 'सॉफ्टवेयर-डिफाइन्ड रेडियो' या एसडीआर नाम की एक नई तकनीक भी आ गई है. ये आज की यूएसबी ड्राइव या डोंगल जैसा होता है, जिससे वायरलेस पर आ जा रही आवाज़ें और खुफिया संदेश सुने जा सकते हैं.

आपको ये जानकर हैरानी होगी कि तरक़्क़ी के इस दौर में भी माल ढुलाई की संचार व्यवस्था बुनियादी तौर पर पुराने रेडियो संदेशों से ही चल रही है.

हर जहाज़, रेलगाड़ी या विमान, रेडियो के ज़रिए संदेश भेजकर बाक़ी लोगों से बात करता है. रेडियो तकनीक समंदर में चल रहे जहाज़ों के लिए आपस में बात करने का सबसे अच्छा ज़रिया है.

इसमें वो चलते-चलते भी अपना संदेश दे सकते हैं और दूसरों की बातें सुन सकते हैं.

अगर यातायात के साधनों को ट्रैक करने की बात करें, तो विमानों का पीछा करना सबसे ज़्यादा आसान होता है.

हर विमान के कॉकपिट में, 'ऑटोमैटिक डिपेंडेंट सर्विलेंस ब्रॉडकास्ट' या एडीएस-बी ट्रांसपोंडर लगा होता है, जिसके ज़रिए विमान से रेडियो संदेश भेजे जा सकते हैं.

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सैटेलाइट के ज़रिए अपनी स्थिति का पता लगाकर तमाम विमान रेडियो पर ये जानकारी खुलकर बाक़ी दुनिया से साझा करते हैं.

इनके रेडियो की फ़्रीक्वेंसी 1090 मेगाहर्त्ज होती है और एसडीआर की मदद से ये संदेश आसानी से सुने जा सकते हैं.

इसी तरह मालवाहक जहाज़ और तेल टैंकर्स का भी पीछा किया जा सकता है. विमानों की तरह वो भी रेडियो के ज़रिए खुले तौर पर संदेश का लेन-देन करते हैं.

इस सिस्टम को 'ऑटोमैटिक आइडेंटिटी सिस्टम' या एआईएस कहते हैं. यह 161.975 मेगाहर्त्ज और 162.025 मेगाहर्त्ज के बीच रेडियो संदेश भेजता और सुनता है.

हालांकि सच्चाई ये है कि समंदर के जहाज़ों के रेडियो संदेश सुनना थोड़ा मुश्किल है. इसके लिए जहाज़ का आपकी नज़रों के सामने होना ज़रूरी है, जो कि हर वक़्त संभव नहीं है.

इसलिए किसी तीसरे ज़रिए से ही जहाज़ों के रेडियो संदेश सुने जा सकते हैं.

रेलवे के संदेश सुनना क़रीब-क़रीब नामुमकिन है. साल 2014 में ब्रिटिश रेलवे ने क़रीब तेईस सौ करोड़ टन माल की ढुलाई की.

इन ट्रेनों को ट्रैक करना अपने आप में बड़ा मुश्किल काम है. मालगाड़ियों के ड्राइवर ग्लोबल सिस्टम फॉर मोबाइल कम्यूनिकेशन रेलवे या जीएसएम-आर के ज़रिए बात करते हैं.

ये ख़ास तौर से ब्रिटेन के रेलवे सिस्टम के लिए बना मोबाइल नेटवर्क है.

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जीएसएम-आर एक बंद नेटवर्क है, यानि ये कि नेटवर्क के बाहर के लोग इसके संदेश नहीं सुन सकते. इसके संदेशों को डिकोड करना भी ग़ैरक़ानूनी है.

हालांकि जब किसी ट्रेन से संदेश भेजा जाता है, तो इसका पता लगाया जा सकता है. इसकी फ़्रीक्वेंसी 876-880 मेगाहर्त्ज होती है.

लेकिन हम इसे सुन नहीं सकते और ये भी पता नहीं लगा सकते कि इसे किस ट्रेन से भेजा गया.

दुनिया भर में यातायात व्यवस्था ऐसे ही रेडियो तरंगों के ज़रिए चलती है. अगर इसकी कल्पना किसी नेटवर्क से करें, तो ये तारों के बेहद उलझे हुए नेटवर्क जैसा है.

इस पर ख़राब मौसम और इलेक्ट्रोमैग्नेटिक तरंगों का बहुत असर पड़ता है. पहाड़ी और जंगली इलाक़ों की वजह से भी इस बातचीत पर बुरा असर होता है, क्योंकि इससे रेडियो सिग्नल अटक जाते हैं.

कई बार ट्रेनों की आवाजाही की लाइव फ़ीड भी मिलती है. कई रेलवे सिस्टम में कुछ हिस्सा लोगों के लिए खुला होता है, तो कुछ संदेश ख़ुफ़िया होते हैं.

वहीं विमानों के रेडियो संदेश खुफिया नहीं होते. हालांकि कई देशों में पायलट और एयर ट्रैफिक कंट्रोलर की बातचीत सुनना ग़ैरक़ानूनी है.

यातायात के संचालन का ये पूरा सिस्टम ही आम लोगों की नज़र से दूर रखने के लिए बनाया गया है. ऐसे मे हम इसमें झांकने की कोशिश करेंगे, तो पहले तमाम नियम-क़ायदों की दीवार फांदनी होगी.

(अंग्रेज़ी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ़्यूचर पर उपलब्ध है.)

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