जहां टीवी पर काम करने की सज़ा मौत है

शकीला इब्राहिमख़िल

90 के दशक में तालिबान ने जब अफ़ग़ानिस्तान पर कब्ज़ा किया तो सबसे पहले टेलीविजन, संगीत और थिएटर पर प्रतिबंध लगाया.

तालिबान युग के ख़ात्मे के बाद एक बार फिर मीडिया की गतिविधियां बढ़ी लेकिन टीवी हस्तियां लगातार चरमपंथियों के निशाने पर आने लगे.

देश के सबसे लोकप्रिय टीवी स्टेशन, टोलो में काम करने वाली दो महिलाओं ने अपनी आपबीती बताई कि कैसे वो मौत की धमकियों के बीच अपना काम करते रहे.

शकीला इब्राहिमख़िल - टोलो टीवी संवाददाता

टोलो टीवी संवाददाता शकीला इब्राहिमख़िल की ख़ुद की ज़िन्दगी की कहानी उन ख़बरों से मिलती जुलती है जो हर रात वो रिपोर्ट करती हैं.

तालिबान राज के दौरान कम उम्र में उनकी शादी करा दी गई और जब उनके पति की अचानक से मौत हो गई तो बूढ़े मां-बाप और तीन छोटे बच्चों की ज़िम्मेदारी उनपर आ गई.

2001 में अमरीकी के नेतृत्व में जब अफ़ग़ानिस्तान पर हमले हुए तो उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की और एक पत्रकार के तौर पर काम शुरू किया.

2012 में उन्होंन सहर गुल की कहानी दुनिया के सामने लगाई. 15 साल की सहर को उनके पति और ससुराल वालों ने उसे बंद करके रखा दी क्योंकि उसने वेश्यावृत्ति से इनकार कर दिया था.

कहानी सुनकर दुनिया भर के लोग हैरान रह गए और अफ़ग़ानिस्तान में इससे आक्रोश पैदा हो गया.

लेकिन अफ़ग़ानिस्तान में औरतों की पीड़ा को उजागर करने के चलते उन्हें चरमपंथियों से मौत की धमकी मिली.

उन्होंने अफ़ग़ानिस्तान में हो रहे आत्मघाती हमलों की रिपोर्टिंग भी की हैं. ये भी उनके लिए मौत की धमकियों की वजह रही है.

हमलों के बाद की रिपोर्टिंग, ज़िंदा बचे लोगों का इंटरव्यू और मृतकों के परिजनों से बातचीत करने जैसे काम से उन्होंने अपने लिए एक मुक़ाम बना लिया है.

वो कहती हैं, "हम इन दुखद घटनाओं का फ़ायदा उठाते हैं, लेकिन दुर्भाग्य से ये हमारे काम का हिस्सा है."

ट्रॉमा सेंटर के डॉक्टर उन्हें भली भांति जानते हैं. जब वो उन्हें देखते हैं वो कहते हैं कि उन्हें पता है कि अब जल्द नए मरीज़ भर्ती होने वाले हैं.

उन्होंने ऐसे हादसे कई बार रिपोर्ट किए हैं और लगता था कि उन्हें ऐसी पीड़ा सहने की आदत हो गई है. लेकिन सच्चाई इसके उलट है. वो रो पड़ती हैं.

ये संवाददाता की ज़िंदगी का एक पहलू है जो टोलो टीवी के दर्शकों को अमूमन नहीं दिखता.

वो कहती हैं, "मैं बहुत कष्ट सहती हूं. शायद इसलिए कि मैं एक मां हूं. मैं अपनी भावनाओं पर क़ाबू पाने की कोशिश करती हूं, लेकिन ये संभव नहीं है."

"मैं भी एक मां हूं, आप जानते हैं. मैं इन बच्चों के भविष्य को लेकर चिंतित हूं. मैं जब इस बच्चों को देखती हूं तो मुझे अपने बच्चों की याद आती है. मैं समझती हूं कि इनमें से किसी के लिए भी भविष्य अच्छा नहीं होगा."

साल के शुरूआत में इब्राहिमखिल को टोलो टीवी पर ही हुए एक आत्मघाती हमले की दर्दनाक रिपोर्टिंग करनी पड़ी.

20 जनवरी को भारी व्यस्तता के बीच मध्य काबुल में एक तालिबान आत्मघाती हमलावर ट्रक मिनि वैन से जा टकराया जिसमें टोलो कर्मचारी काम ख़त्म कर घर लौट रहे थे.

घटना में 7 लोगों की मौत हो गई थी और 20 घायल हो गए थे.

वो याद करती हैं, "हर नाम पढ़ने के साथ मैं चिल्लाना और रोना चाहती थी. अपने साथियों को खोना हम सबके लिए बेहद दर्दनाक़ था."

लेकिन उनका मानना है कि हमले ने उन सबको और निर्भीक बना दिया है.

वो कहती हैं, "हम मानते हैं कि टोलो को दबाने की कोशिश अफ़ग़ानिस्तान में बोलने की आज़ादी को दबाना है. और हम अफ़ग़ानिस्तान के लोगों को ऐसा बिल्कुल महसूस नहीं करने देंगे."

काबुल के पत्रकार सरकारी प्रचार को आसानी से समझ जाते हैं.

वो जानते हैं कि विदेशी सेना के चले जाने के बाद वहां की सुरक्षा व्यस्था कितने ख़तरे में है और देश की अर्थव्यवस्था का कितना बुरा हाल है.

ये सब उन्हें काफ़ी मुश्किल हालात में डाल देते हैं. क्या सभी ख़तरों के बावजूद वो डटे रहें और लोगों के दुखों की कहानी दुनियां को बताते रहें या वो अपने परिवार की ख़ातिर ये सब छोड़ अलग हट जाएं जैसा हज़ारों लोगों ने किया.

इब्राहिमख़िल भी इस सच्चाई से रूबरू हो चुकी हैं. काबुल में उनसे मुलाक़ात के बाद मुझे पता चला कि वो अफ़ग़ानिस्तान छोड़ फिलहाल तुर्की चली गई हैं.

ये तय नहीं है कि वो वापिस लौटेंगी कि नहीं, लेकिन वो कहती हैं कि फ़िलहाल उनके लिए अपने बच्चों की परवरिश अपनी ही मुल्क में करना ख़तरनाक हो गया था.

आर्याना सईद - "अफ़गान स्टार" पर सिंगर और जज

अफ़गान स्टार, पॉप आइडल का एक संस्करण, अफ़ग़ानिस्तान में टेलिविजन का सबसे लोकप्रिय शो है, लेकिन इसकी अशिष्टता और अनैतिकता के कारण तालिबान इसकी आलोचना करता रहा है.

इसने प्रोग्राम की महिला जज और अफ़ग़ानिस्तान की सबसे लोकप्रिय गायकों में से एक आर्याना सईद को तालिबान के निशाने पर ला दिया है.

वो सिर पर स्कार्फ पहनने से इनकार करती हैं और दुनिया भर के दूसरे पॉप स्टार्स की ही तरह चुस्त कपड़ों में परफॉर्म करती हैं.

उनके गानों के बोल महिलाओं को ताक़तवर होने और अच्छे भविष्य के लिए लड़ाई लड़ने की प्रेरणा देते हैं और कई अफ़गान महिलाओं के लिए ये समर्थन जुटाने का नारा बन गया है.

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कई मायनों में वो उन बातों का प्रतिनिधित्व करती हैं जो तालिबान और दूसरे कट्टरपंथी नहीं चाहते हैं - एक आधुनिक अफ़ग़ानिस्तान, महिलाओं के अधिकार, अभिव्यक्ति की आज़ादी.

यही कारण है कि जब भी वो अपने लंदन वाले घर से हवाई यात्रा कर अफ़ग़ानिस्तान पहुंचती हैं तो लगातार उनपर मंडराते ख़तरे की अफ़वाह सुनाई देती है.

पिछले साल काबुल के नेशनल फुटबॉल स्टेडियम में उनके कार्यक्रम के बाद उन्हें मिली मौत की धमकी के बाद उनका दोबारा इस तरह का कार्यक्रम करना असंभव लगता है.

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