क्यों चमकते हैं, क्रिकेट स्टंप और बेल्स?

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क्रिकेट मैच के दौरान चमकती स्टंप अक्सर क्रिकेट प्रेमी को रोमांच में डाल देती है.

विकेट के चमकने की इस तकनीक को जानने की कोशिश की है, हैरी लॉ और हना सैंडर ने.

मैच के दौरान, स्टंप के ऊपर लाल चमकती रोशनी पर, शायद हर दर्शक का ध्यान गया होगा.

परंपरागत रूप से क्रिकेट के स्टंप और उसके बेल्स, लकड़ी के बनाए जाते हैं, लेकिन अब नए चमकदार विकेटों में प्लास्टिक भी मिलाया जाता है, जिसमें लेड लाइट लगी होती है.

आईसीसी ने जुलाई 2013 में अंतर्राष्ट्रीय मैचों में इस तरह के चमकदार विकेटों के प्रयोग की अनुमति दी थी.

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उसके बाद से ही सैंकड़ों घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय मैंचों में इस तरह के विकेट का प्रयोग हुआ है.

इस तरह के चमकदार विकेट, वन-डे क्रिकेट मैंच में रोमांच तो बढ़ाते ही हैं, लेकिन इनका एक बड़ा व्यवहारिक इस्तेमाल भी है.

क्रिकेट का नियम कहता है कि कोई भी बल्लेबाज़ अपनी क्रीज़ के बाहर रह जाए और स्टंप गिर जाएं तो वह आउट हो जाता है.

यहां विकेट गिरने का मतलब है, बेल्स या गिल्ली का उखड़ जाना. बल्लेबाज़ के आउट होने के लिए बेल्स के दोनों छोरों का विकेट से अलग होना ज़रूरी है.

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हालांकि किसी अंपायर के लिए बेल्स के उखड़ने का वास्तविक समय समझ पाना बहुत मुश्क़िल होता है.

लेकिन अब 'ज़िंग विकेट सिस्टम' के नए उपकरण से यह काम आसान हो गया है.

इसमें बेल्स और विकेट के बीच जिस पल संपर्क टूटता है, ठीक उसी वक़्त विकेट और बेल्स चमक उठते हैं.

इस सिस्टम को ऑस्ट्रेलिया के एक पूर्व क्रिकेटर ब्रोंट एकरमैन ने तैयार किया है, उनको इसकी प्रेरणा अपनी बेटी के एक खिलौने से मिली.

वह खिलौना लगभग एक क्रिकेट बॉल के आकार का था और उसमें एलईडी लाइट लगी हुई थी.

इस तकनीक में क्रिकेट के बेल्स में कम वोल्टेज की बैटरी लगी होती है और हर गिल्ली में माइक्रोप्रॉसेसर लगा होता है.

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यही माइक्रोप्रॉसेसर पता लगाता है कि विकेट और बेल्स के बीच संपर्क किस वक़्त टूटा है.

इस सिस्टम में बेल्स में एक सेकेंड के हज़ारवें हिस्से में रोशनी जल सकती है.

एकरमैन के मुताबिक़, "भले ही बारिश हो, झटका लगे या कंपन हो लेकिन बेल्स में रोशनी तभी चमकेगी, जब इसके दोनों छोरों का संपर्क विकेट से पूरी तरह से टूट जाएगा."

यह संपर्क टूटने के बाद माइक्रोप्रॉसेसर, विकेट को रेडियो सिग्नल भेजता है और फिर विकेट में भी लाइट जलने लगती है.

इस सिस्टम से पहले, कई बल्लेबाज़ ग़लत आउट दिए गए होंगे या कई बार आउट होने का बाद भी किसी बल्लेबाज़ को जीवनदान मिल गया होगा.

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इस आधुनिक तकनीक के विकास में हज़ारों ऑस्ट्रेलियन डॉलर का ख़र्च हुआ है.

इसने लकड़ी के नाज़ुक विकेट और बेल्स को एक महंगे उपकरण में बदल दिया है.

यानि कि जीत के बाद किसी खिलाड़ी को हाथ में क्रिकेट का स्टंप उखाड़कर दौड़ते देखना, अब पुराने दिनों की बात हो सकती है.

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