कोमा में पड़े इंसान से बात करना मुमकिन होगा?

  • 7 मई 2016
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कई बार चोट या किसी हादसे के चलते लोग कोमा में चले जाते हैं. उनकी सुनने, सोचने-समझने, बोलने और महसूस करते की ताक़त ख़त्म हो जाती है. उनकी बस सांसें चलती रहती हैं. वो बस नाम के लिए ज़िंदा रहते हैं.

कुछ लोग ऐसी बीमारी के भी शिकार हो जाते हैं कि वो चल-फिर नहीं सकते. वो देख-सुन सकते हैं. समझ सकते हैं. महसूस कर सकते हैं. मगर अपने एहसास को बयां नहीं कर सकते. इस बीमारी को एएलएस या "एमायोट्रॉफिक लैटेरल स्क्लेरोसिस'' कहते हैं.

कुछ ऐसा ही हुआ जर्मनी की वालट्रॉट फैनरिक के साथ. उनके पति जोआचिम बताते हैं कि 2007 में ज़मीन पर गिरे सिक्के को उठाते वक़्त वालट्रॉट के साथ जाने क्या हुआ कि वो गिर पड़ीं और फिर नहीं उठ सकीं. तीन महीने बाद उन्हें पता चला कि वालट्रॉट को "एमायोट्रॉफिक लैटेरल स्क्लेरोसिस'' या एएलएस है.

दोनों की ज़िंदगी तो तबाह सी हो गई. ये हादसा मई 2007 में पेश आया था. सितंबर के आते आते वालट्रॉट के सांस लेने के सिस्टम ने काम करना बंद कर दिया था.

जोआचिम कहते हैं कि जब उन्हें ये पता चला तो वो सारा दिन अस्पताल में रोते फिरते रहे. वो समझ नहीं पा रहे थे कि आख़िर इतनी जल्दी ज़िंदगी कैसे बदल गई. अभी कुछ महीने पहले फैनरिक दंपति हाथों में हाथ डाले बाग़ों की सैर किया करते थे.

2010 में डॉक्टरों ने बताया कि वालट्रॉट पूरी तरह से कोमा में चली गई हैं. उसी हाल में वो आज तक हैं.

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ऐसा नहीं कि वालट्रॉट को कुछ महसूस नहीं होता. उन्हें कमरे की गर्मी सर्दी का एहसास होता है. एक जगह पर बरसों से पड़े रहने का दर्द भी होता है. वो लोगों की बातें भी सुन सकती हैं. मगर उनका दिमाग़ क्या सोच रहा है? ये अब से कुछ दिनों पहले तक किसी को पता नहीं चलता था.

जर्मनी की ट्यूबिन्जेन यूनिवर्सिटी के न्यूरोसाइंटिस्ट नील्स बीरबॉमर ने अपना पूरा करियर ऐसे लोगों की बीमारी समझने में लगा दिया है जिन्हें ऐसी बीमारी है. जो महसूस तो करते हैं. मगर अपने एहसास बता नहीं पाते. नील्स को लगता है कि अब उन्हें इस अंधेरे रास्ते में रौशनी दिखने लगी है.

एफएमआरआई तकनीक से वैज्ञानिक ऐसे लोगों के दिमाग़ की हरकतें पढ़ सकते हैं जो कोमा में सुन्न पड़े होते हैं. ऐसे लोगों को ट्रेनिंग देकर हां या ना करने का काम भी कराया जा सकता है. कनाडा के एड्रियन ओवेन ने ये तरीक़ा खोजकर कोमा में पड़े लोगों से बातचीत का रास्ता खोला था.

दिक़्क़त ये है कि एफएमआरआई कराना बहुत परेशानी वाला और ख़र्चीला काम है. इसी वजह से जर्मन वैज्ञानिक नील्स और उनके साथी, ऐसे लोगों से बात करने का नया तरीक़ा खोजने में लगे हैं.

अस्सी के दशक से ही ऐसी तकनीक मौजूद है जिससे इंसान के दिमाग़ के उस हिस्से का पता लगाया जा सकता है जहां पर ज़बानों के और क़ाबिलियत के संदेश पढ़े और समझे जाते हैं. इस तकनीक की मदद से अल्जाइमर बीमारी की वजह समझने में भी मदद मिली है.

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नील्स ने अपने तमाम तजुर्बों से पाया कि जब कोमा में पड़ा इंसान हां या ना कहना चाहता है तो दोनों ही सूरतों में दिमाग़ में ख़ून की दौड़ान की रफ़्तार एकदम अलग होती है.

नील्स ने एक ब्रेन कंप्यूटर बनाया. इसकी मदद से उन्होंने वालट्रॉट से उनके पति की आवाज़ में कई सवाल पूछे.

जैसे कि, क्या लंदन इंग्लैंड की राजधानी है?

क्या पेरिस जर्मनी की राजधानी है?

क्या तुम्हारा नाम वालट्रॉट है?

इस दौरान नील्स का बनाया ब्रेन कंप्यूटर, वालट्रॉट के दिमाग़ की हरकतों पर नज़र रखता था. क़रीब पच्चीस सेकेंड के बाद वालट्रॉट के दिमाग़ की हरकतों से उनके सवालों के जवाब मिल जाते थे. धीरे-धीरे, नील्स को वालट्रॉट से ज़्यादातर सवालों के जवाब मिलने लगे.

नील्स बताते हैं कि कुछ सवालों के जवाब आपको पता होते हैं. तो आप चाहें न चाहें, आपका दिमाग़ वो सवाल सुनते ही प्रतिक्रिया देता है. जवाब देता है. हां या ना वाले जवाब देते वक़्त दिमाग़ अलग तरह से रिएक्ट करता है.

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इसके लिए बहुत ज़्यादा दिमाग़ लगाने की ज़रूरत नहीं होती. जब वालट्रॉट से ये सवाल किए जाते हैं तो नील्स का ब्रेन कंप्यूटर ये पता लगा सकता है कि वालट्रॉट का दिमाग़ सोया है या जाग रहा है.

हालांकि नील्स को इस बात की तसल्ली होनी बाक़ी थी कि वो वालट्रॉट का दिमाग़ सही तरीक़े से पढ़ पा रहे हैं. इस बात का पता लगाना टेढ़ी खीर है. क्योंकि दिमाग़ के भीतर हंगामा सा बरपा रहता है. एक साथ बहुत से काम होते रहते हैं. जब किसी मरीज़ का दिमाग़ सवालों के जवाब सोच रहा होता है. उसी वक़्त दिमाग़ लाखों और काम भी कर रहा होता है. उन लाखों कामों में से अपने सवाल का जवाब तलाशना बड़ी चुनौती है.

इसके लिए नील्स ने कंप्यूटर के ज़रिए वालट्रॉट से सरल सवाल कई बार पूछे. जब ये तय हो गया कि वालट्रॉट ने कम से कम सत्तर फ़ीसद बार इन सवालों के सही जवाब दिए, तब तक ब्रेन कंप्यूटर पर वो जवाब दर्ज नहीं किए गए.

नील्स कहते हैं कि ये ज़रूरी है कि मरीज़ को ब्रेन कंप्यूटर से बात करने की आदत हो जाए. इसके बाद भी आपको इस बात की तसल्ली करनी होगी कि आप अपने ही सवालों के जवाब मरीज़ के दिमाग़ से पा रहे हैं.

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नील्स, अपना तजुर्बा बताते हैं. एक बार उन्होंने वालट्रॉट से पूछा कि क्या आप घर पर हैं. इसका जवाब हर बार हां में मिला.

फिर नील्स ने कुछ मुश्किल सवाल किए. मसलन,

क्या आप तकलीफ़ में हैं?

क्या आप अपने पति को देखना चाहती हैं ?

क्या आप जीना चाहती हैं?

कोमा में जाने वाले तमाम मरीज़ों की तरह वालट्रॉट भी वेंटिलेटर पर हैं. उन्हें नली के ज़रिए खाना खिलाया जाता है.

डॉक्टर मानते हैं कि उन्हें अब किसी चीज़ का स्वाद नहीं आता. लेकिन वालट्रॉट के पति जोआचिम अपनी पत्नी का बहुत ख़याल रखते हैं. वो अभी भी साथ-साथ छुट्टी पर जाते हैं. जब भी उनकी पसंदीदा गायिका हेलेन फ़िशर का शो होता है. दोनों साथ जाते हैं. जोआचिम अपनी बीवी को व्हीलचेयर पर ले जाते हैं, शो दिखाने के लिए.

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नील्स कहते हैं कि एक सवाल से ये पता चलता है कि अपने हालात से मरीज़ परेशान होकर मरना चाहता है या फिर जीने की तमन्ना उनके अंदर है.

अगर मरीज़ से ये पूछा जाए कि क्या आप ख़ुद को अपने परिवार पर बोझ समझते हैं? अगर मरीज़ का जवाब हां है तो इसका मतलब ये है कि मरीज़ अब नहीं जीना चाहता. जो लोग हमेशा जीने की चाहत जताते हैं उनके लिए उनके परिजन बेहतर माहौल बनाए रखते हैं. हमेशा उनसे प्यार जताते हैं. उनकी अहमियत का उन्हें एहसास कराते हैं.

नील्स बताते हैं कि उनके सवालों के जो जवाब मिले हैं उनसे ये पता चलता है कि वालट्रॉट जीना चाहती हैं. उनके पति कहते हैं कि, ''हमारा रिश्ता अभी बहुत मज़बूत है''.

दिक़्क़त ये है कि जोआचिम अपनी पत्नी से तीन महीने में सिर्फ़ एक बार बात कर पाते हैं, जब नील्स और उनकी टीम घर आती है. अब जोआचिम ख़ुद एक ब्रेन कंप्यूटर ख़रीदना चाहते हैं. ताकि वो अपनी पत्नी से जब जी चाहे तब बात कर सकें. लेकिन वो बहुत महंगा है और बीमे की रकम से नहीं ख़रीदा जा सकता.

वहीं नील्स के पास वालट्रॉट जैसे पांच और मरीज़ हैं. वो उम्मीद जता रहे हैं कि एक दिन उनका तजुर्बा ऐसे मरीज़ों से बातचीत करने में का आएगा. हालांकि अभी तो उनके रिसर्च की ये शुरुआत भर है. ऐसे ही रिसर्च करने वाले दूसरे लोगों ने नील्स के तजुर्बों पर सवाल भी उठाए हैं.

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फिर कुछ लोग नैतिकता का सवाल उठाते हैं. कोमा में पड़े मरीज़ के दिमाग़ पर इतना ज़ोर डालना सही है या नहीं. कि उनसे ज़िंदगी और मौत के सवाल किए जाएं.

नील्स कहते हैं कि कोमा में पड़े मरीज़ों की दिमाग़ी तरंगों की रफ़्तार आम इंसानों जैसी ही यानी पांच हर्त्ज की होती है, जब वो सोते रहते हैं. इसका मतलब ये कि लकवे के शिकार इंसान पर लंबे वक़्त पर कुछ-कुछ सो जाने जैसा असर होता है.

वहीं कोमा में पड़े मरीज़ों को तमाम एहसास अच्छे से होते रहते हैं. ऐसे में अगर वो अपनी बात किसी भी तरीक़े से बता पाते हैं तो वो मरीज़ और तीमारदार, दोनों के लिए अच्छा होगा.

वैसे कुछ जानकार कहते हैं कि कोमा में पड़ा हर मरीज़ अपने एहसास ब्रेन कंप्यूटर को बता पाएगा, ये कहना ज़रा मुश्किल है. कई बार उनके जवाब ग़लत भी समझे जा सकते हैं. इससे उनकी तकलीफ़ बढ़ने का डर है.

वहीं नील्स को उम्मीद है कि आगे चलकर वो ऐसी तकनीक विकसित कर लेंगे, जिससे कोमा में पड़े इंसान से बात करना मुमकिन हो सकेगा. फिलहाल तो ब्रेन कंप्यूटर उनके दिमाग़ की सिर्फ़ हां या ना को समझ सकता है. इसमें भी सत्तर फ़ीसद ही कामयाबी होती है. अगर यही कामयाबी अस्सी फ़ीसद हो जाए तो कंप्यूटर, मरीज़ के दिमाग़ से निकलने वाले शब्द भी पकड़ सकेगा. मगर ये अभी दूर की कौड़ी है.

नील्स कहते हैं कि अगर वो ऐसा करने में कामयाब हुए तो सुकून से मर सकेंगे.

(अंग्रेज़ी में मूल लेख यहां पढ़ें, जो बीबीसी फ़्यूचर पर उपलब्ध है.)

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