क्या खुले अंतरिक्ष में जीवन संभव है ?

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जब हम एलियंस का ख़याल करते हैं तो यही सोचते हैं कि अंतरिक्ष में कहीं दूर किसी ग्रह पर एलियन रहते होंगे. हम ये नहीं सोचते कि ब्रह्मांड में ही कहीं एलियन रहते हैं.

मगर ये ख़याल भी बुरा नहीं. अभी पिछले महीने ही वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि अंतरिक्ष के बेहद मुश्किल हालात में भी ज़िंदगी पैदा हो सकती है.

फ्रांस की नाइस यूनिवर्सिटी की कॉर्नेलिया मेंनर्ट और उनके साथियों ने दिखाया कि जमे हुए पानी, मेथेनॉल और अमोनिया को इकट्ठा किया जाए तो चीनी के अलग-अलग रूपों में तब्दील किया जा सकता है. इनसे डीएनए और आरएनए बन जाएंगे. किसी भी जीव के ये बुनियादी हिस्से होते हैं.

कहने का मतलब ये कि अंतरिक्ष में ज़िंदगी के लिए ये ज़रूरी चीज़ें इकट्ठी हो जाएं और फिर इनकी बारिश किसी ग्रह पर हो, तो वहां ज़िंदगी की गुजाइश बन जाती है.

हालांकि कुछ वैज्ञानिक ये भी कहते हैं कि ज़िंदगी पनपने के लिए किसी ग्रह का होना ज़रूरी नहीं. खुले अंतरिक्ष में भी ज़िंदगी पनप सकती है. आख़िर इसकी कितनी उम्मीद है?

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धरती पर ज़िंदगी की शुरुआत कैसे हुई? इस सवाल के जवाब में भी वैज्ञानिक कई थ्योरी बताने लगते हैं. उसके लिए ज़रूरी माहौल की शर्तें गिनाने लगते हैं. सबसे ज़रूरी है कि तापमान सही हो.

अंतरिक्ष में तापमान ज़ीरो होता है. फिर वहां पर कोई वायुमंडल नहीं होता, वैक्यूम होता है. डीएनए बनाने के लिए चीनी और अमीनो एसिड तो मौजूद हैं. लेकिन सिर्फ़ इनसे काम नहीं बन सकता. इन सबका एक सही जगह इकट्ठा होना ज़रूरी है. जिससे ज़िंदगी की बुनियाद पड़े. अंतरिक्ष की तो बात ही छोड़िए, धरती के अलावा किसी और ग्रह पर भी ये गुंज़ाइश नहीं तलाशी गई है.

मगर इससे इनकार करना भी ठीक नहीं. अंतरिक्ष भी रेगिस्तान जैसा ही है. यहां पर ज़िंदगी पनपने की उम्मीद है.

मगर उससे पहले इस बात पर सबको रज़ामंद होना होगा कि आख़िर ज़िंदगी है तो क्या? डीएनए और आरएनए जो अपने जैसी कॉपी बना लेते हैं, वो जीव के तौर पर गिने जाते हैं.

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किसी भी जीव के लिए बुनियादी केमिकल, कार्बन माना जाता है. वैसे सब जीव कार्बन के बने नहीं होते. मगर ज़्यादातर में ये बुनियादी केमिकल होता है.

ब्रिटेन की एडिनबर्ग यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक चार्ल्स कॉकेल कहते हैं कि कार्बन से बने जीवों के लिए पानी का होना ज़रूरी है. वैसे बिना पानी के भी ज़िंदगी पनप सकती है. कई उल्कापिंडों पर ज़िंदगी के ज़रूरी बुनियादी केमिकल पाए गए हैं.

मगर इन केमिकल के बीच आपस में रिएक्शन होना ज़रूरी है. अंतरिक्ष में ऐसा होना मुमकिन नहीं. तभी अंतरिक्ष में अब तक ज़िंदगी नहीं पनप सकी. हालांकि आगे भी ऐसा नहीं होगा, ये नहीं कहा जा सकता.

1970 के दशक में ही सोवियत वैज्ञानिक विताली गोल्डांस्की ने लैब में ये साबित किया था कि अंतरिक्ष जैसे माहौल में भी केमिकल रिएक्शन होता है.

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अंतरिक्ष में विकिरण बहुत है. इनके असर से भी केमिकल रिएक्शन हो सकता है. वैज्ञानिक मानते हैं कि अंतरिक्ष में छोटे स्तर पर तो केमिकल रिएक्शन हो भी सकता है. मगर जिंदगी के लिए जितना ज़रूरी है, उतने बड़े पैमाने पर वैक्यूम में केमिकल रिएक्शन होना मुश्किल है.

वैज्ञानिक कहते हैं कि किसी ग्रह पर ज़िंदगी के लिए ज़रूरी दो बुनियादी चीज़ें आसानी से मिल जाती हैं. गर्मी और रौशनी. ऊर्जा उन्हें अपने सितारों से मिल जाती है. वैसे वैज्ञानिक कहते हैं कि धरती पर ज़िंदगी को पहली ऊर्जा सूरज से नहीं, ज्वालामुखी विस्फोट से मिली. आज भी ज्वालामुखी विस्फोट से धरती के भीतर की ऊर्जा बाहर निकलती है.

धरती के अलावा बृहस्पति ग्रह के तमाम चंद्रमा पर भी ज्वालामुखी पाए जाते हैं.

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अंतरिक्ष में दो ग्रहों या चंद्रमाओं के बीच की जगह पर मौजूद छोटे-छोटे बर्फीले केमिकल, कहां से ऊर्जा हासिल करेंगे, ये समझना मुश्किल है. वैसे कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक डेविड स्टीवेंसन कहते हैं कि आकाशगंगा में बहुत से छोटे-छोटे ग्रहों के टुकड़े हैं. ये अपने सूरज से इतनी दूर हैं कि उनसे न गर्मी मिलती है न ऊर्जा और न ही रौशनी.

इन पर ज़िंदगी पनपने की उम्मीद थी, अगर ये अपने सितारों के क़रीब होते. मगर ये दूसरे ग्रहों की ताक़त से खिंचकर अपने सितारों से दूर हो गए. इसलिए इन पर ज़िंदगी नहीं पनप सकी.

लेकिन ऐसा नहीं कि ऐसे छोटे ग्रहों पर ज़िंदगी पनपने की उम्मीद हमेशा के लिए ख़त्म हो गई. इन सबके धरातल के भीतर भरी ऊर्जा, ज़िंदगी पनपने का सोर्स हो सकती है.

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जैसे आज धरती की आधी ऊर्जा, इसके भीतर के लावा के उबाल से पैदा होती है. इसी तरह इन छोटे ग्रहों के भीतर भरी ऊर्जा से ये करोड़ों सालों में इतने गर्म हो सकते हैं कि इन पर ज़िंदगी पनपने की गुंजाइश हो सकती है. इन ग्रहों का घना वायुमंडल भी ज़िंदगी पनपने में मददगार साबित हो सकता है.

स्टीवेंसन जैसे वैज्ञानिक मानते हैं कि ऐसे ग्रहों पर ज़िंदगी पनप तो सकती है, मगर धरती जैसा विकास होना मुमकिन नहीं. क्योंकि ये अपने सितारों से दूर हैं. और यहां की ज़िंदगी का ब्रह्मांड के दूसरे ग्रहों की ज़िंदगियों से संपर्क होना क़रीब-क़रीब नामुमकिन है. अरबों साल तक वहां के जीव अकेले ही रहेंगे.

तो, किसी ग्रह से परे अंतरिक्ष में ज़िंदगी मुमकिन तो है. इंसान को इसका पता चलना बाक़ी है. वैसे वैज्ञानिकों ने उम्मीद नहीं छोड़ी है.

पर अगर ऐसी जगह पर ज़िंदगी पनपेगी तो वो कैसी होगी? उसका रूप रंग क्या होगा? इसका अंदाज़ा लगाना मुश्किल है.

(अंग्रेज़ी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी अर्थ पर उपलब्ध है.)

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