एक महिला जिसने नियो नाज़ियों को चुनौती दी

एसप्लंड इमेज कॉपीरइट Wikimedia Commons

दुनिया में इन दिनों दक्षिणपंथ की लहर सी चल रही है. अमरीका में डोनल्ड ट्रम्प, यूरोपीय देशों में नियो नाज़ी आंदोलन या फिर भारत में बीजेपी का बढ़ता असर, इस बात की मिसाल हैं.

ये ख़ुद को राष्ट्रवादी कहते हैं. विरोधियों को लोकतांत्रिक तरीक़े से हराने के बजाए कुचलने की बातें करते हैं. हर बात को राष्ट्रहित से जोड़ने का चलन है.

ऐसे ही नियो नाज़ियों के विरोध की प्रतीक बन गई है एक तस्वीर. ये तस्वीर पिछले हफ़्ते दुनिया भर में सोशल मीडिया पर वायरल हो गई.

ये तस्वीर एक महिला की है, जिसने अकेले आगे बढ़कर खुलेआम, तीन सौ नियो नाज़ियों को चुनौती दी. ये तस्वीर, बहादुरी की मिसाल बन गई. जिसमें एक महिला, हाथ उठाए, मुट्ठी ताने, तीन सौ लोगों की भीड़ के सामने जा खड़ी होती है. अपना विरोध जताती है. जबकि आस-पास खड़े लोग तमाशबीन बने रहते हैं.

इमेज कॉपीरइट David LagerlfExpoTT News AgencyPress Association Images

ये तस्वीर, 1830 में फ्रेंच पेंटर यूजीन डेला क्वा की बनाई पेंटिंग, 'लिबर्टी लीडिंग द पीपुल' की याद दिलाती है.

वाक़िया 1 मई का है. जब स्वीडन के एक शहर में तीन सौ नियो नाज़ियों ने यूरोप में एशिया से आ रहे शरणार्थियों के ख़िलाफ़ मार्च निकाला.

जब ये लोग शहर के बीचो-बीच से गुज़र रहे थे, तभी अफ्रीकी मूल की स्विडिश महिला टेस एसप्लंड बीच सड़क पर नियो-नाज़ियों के सामने आ खड़ी हुई. उसके होंठ भिंचे थे. हाथ तना था. मुट्ठी बंद थी.

शराणार्थियों के ख़िलाफ़, नियो नाज़ियों के इस मार्च का विरोध करने से टेस ख़ुद को रोक नहीं पायी. टेस की इस बहादुरी को पास ही खड़े एक शख़्स, डेविड लैगरलॉफ ने कैमरे में क़ैद करके सोशल मीडिया पर डाल दिया.

अगले कुछ दिनों तक टेस की बहादुरी की कहानी कहती ये तस्वीर पूरी दुनिया में सोशल मीडिया पर वायरल रही.

टेस एस्प्लंड का ये विरोध, किसी योजना के तहत नहीं, अचानाक दर्ज कराया गया था. मगर इसने 1830 में बनी पेंटिंग, 'लिबर्टी लीडिग पीपुल' की याद दिला दी.

इमेज कॉपीरइट Wikimedia Commons

इस पेंटिंग में फ्रेंच कलाकार यूजीन डेला क्वा ने एक महिला को आज़ादी का प्रतीक बनाकर पेश किया था. वो महिला, फ्रेंच इंक़िलाब का तिरंगा उठाए, बारूद के धुएं के बीच से गुज़रती दिखाई देती है.

उसके पीछे हथियारबंद लोगों की भीड़ है, जो फ्रांस के राजा चार्ल्स दशम का विरोध कर रही है.

1830 में फ्रेंच राजा चार्ल्स दशम को जनता के विरोध के चलते गद्दी छोड़नी पड़ी थी. उस पर आरोप था कि वो कट्टरपंथी नीतियों को लागू कर रहा है. इसमें पत्रकारों के लिखने और बोलने पर पाबंदी लगाने का फ़ैसला भी शामिल था.

टेस एस्प्लंड के विरोध की फोटो हो या फिर यूजीन डेला क्वा की पेंटिंग. दोनों ही आम लोगों के विरोध की मिसाल हैं. दोनों के उठे हाथ, तनी, बंद मुट्ठियां, जनता के विरोध की ताक़त का एहसास कराती हैं.

(अंग्रेज़ी में मूल लेख यहां पढ़ें, जो बीबीसी कल्चर पर उपलब्ध है.)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार