एटमी फ़्यूजन से पूरी होगी ऊर्जा की जरूरतें

  • 14 मई 2016
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इंसान को तरक़्क़ी चाहिए. तरक़्क़ी के लिए ज़रूरी है ऊर्जा. ऊर्जा हमें ईंधन से मिलती है. आज दुनिया में कई तरह के ईंधन काम में लाए जा रहे हैं. सबसे ज़्यादा जिनका इस्तेमाल हो रहा है वो है कोयला और तेल.

दोनों ईंधन ज़मीन के अंदर से निकालकर इस्तेमाल किए जा रहे हैं. मगर दिक़्क़त ये है कि दोनों का भंडार सीमित है. एक वक़्त ऐसा आएगा जब दोनों ख़त्म हो जाएंगे. साथ ही दोनों से प्रदूषण बहुत होता है.

इसीलिए तमाम देश एटमी ईंधन पर भी ज़ोर दे रहे हैं. मगर एटमी प्लांट लगाना बेहद ख़र्चीला है. दूसरे इसके बाई प्रोडक्ट के तौर पर निकलने वाले रेडियो एक्टिव कचरे को ठिकाने लगाना भी बड़ी चुनौती है.

इसीलिए काफ़ी दिनों से वैज्ञानिक एक ऐसे ईंधन की तलाश कर रहे हैं. जिससे पर्यावरण को भी नुक़सान न हो और उसका कोई बाई प्रोडक्ट भी न हो. कुछ लोगों को ये तलाश फ्यूज़न में ख़त्म होती नज़र आती है.

फ्यूज़न वो केमिकल रिएक्शन है जिसमें दो परमाणुओं का मेल होने से एनर्जी निकलती है. जैसे एटमी रिएक्शन में दो परमाणुओं के टकराकर बिखरने से बेहिसाब ऊर्जा निकलती है. वैसे ही जब दो परमाणु, एक दूसरे से जुड़ते हैं तो दोनों के मिलन से भी बहुत ऊर्जा निकलती है. एटमी विस्फ़ोट से भी ज़्यादा. इसी तकनीक से हाइड्रोजन बम बनाए जाते हैं.

सूरज, जो धरती पर ऊर्जा का इकलौता स्रोत है, वहां भी इतनी आग फ्यूज़न के चलते ही है. वैज्ञानिकों को लगता है कि अगर इंसान दो परमाणुओं का मेल कराकर उसमें से ईंधन बना सके तो एनर्जी का इससे अच्छा सोर्स कोई और हो नहीं सकता. इससे प्रदूषण भी नहीं फैलेगा और इसके ख़त्म होने का भी कोई ख़तरा नहीं होगा. इंसान की ऊर्जा की सारी ज़रूरतें इससे पूरी हो सकती हैं.

जब से फ्यूज़न की पावर के बारे में पता चला है तब से ही तमाम वैज्ञानिक इस तकनीक से चलने वाले पावर प्लांट बनाने के लिए काम कर रहे हैं. फ्रांस में तो फ्यूज़न तकनीक से चलने वाला एक रिएक्टर बरसों से बनाया जा रहा है. इसका नाम है आईटर. इस प्रोजेक्ट में कई देशों ने रकम लगाई है.

इसकी कामयाबी का पूरी दुनिया को बेसब्री से इंतज़ार है. मगर ये प्रोजेक्ट इतनी धीमी रफ़्तार से चल रहा है कि इसका बजट कई गुना बढ़ चुका है. साथ ही इसके हाल-फिलहाल पूरा होने की उम्मीद भी नहीं.

दुनिया भर में सरकारी प्रोजेक्ट का यही हाल है. यहां तक कि अमरीका जैसे देश भी सरकारी सिस्टम के चलते अब तक कोई फ्यूज़न रिएक्टर नहीं बना सके हैं.

इसीलिए दुनिया भर के कुछ बेहद कामयाब कारोबारी, भविष्य के इस ईंधन में दिलचस्पी ले रहे हैं. ये अरबपति उन मुट्ठी भर लोगों की मदद के लिए अपनी झोली खोल रहे हैं, जो फ्यूज़न तकनीक को कामयाब करके इंसानियत की मदद करना चाहते हैं.

ऐसे अरबपति कारोबारियों में पहला नाम है अमेज़न कंपनी के मालिक जेफ बेजोस. उन्होंने कनाडा के एक फ्यूज़न एनर्जी प्रोजेक्ट में करोड़ों का दांव खेला है.

कनाडा के वैंकूवर शहर में चल रहे इस प्रोजेक्ट का नाम है जनरल फ्यूज़न. इसके अगुवा हैं मिशेल लाबर्ज. मिशेल ने साल 2001 में लेज़र प्रिंटिंग कंपनी क्रियो की नौकरी छोड़कर फ्यूज़न तकनीक को कामयाब बनाने का मिशन शुरू किया था.

मिशेल कहते हैं कि उन्हें समझ आ गया था कि हमारी धरती को बहुत सारी ऊर्जा की ज़रूरत है, जो कोयले और तेल से नहीं पूरी होने वाली. इस चुनौती का मुक़ाबला, एटमी पावर प्लांट से भी नहीं किया जा सकता. मिशेल की नज़र में फ्यूज़न ही वो तकनीक है जिससे धरती की ऊर्जा की ज़रूरतें पूरी की जा सकती हैं.

इसके लिए तमाम सरकारी प्रोजेक्ट चल भी रहे हैं. दिक़्क़त ये है कि उनकी रफ़्तार बेहद सुस्त है. इसीलिए मिशेल ने जनरल फ्यूज़न की शुरुआत की.

आज कनाडा के वैंकूवर में उनका प्लांट रोज़ाना, क़रीब पचास से एक सौ तक टेस्ट करता है. शहर से दूर, सुनसान इलाक़े में तोप जैसी गरज वाली मशीनें, इंसान के इशारे पर शोर मचाती हैं, या फिर शांत रहती हैं.

फ्यूज़न तकनीक से ऊर्जा पैदा करने में दिक़्क़त जो आ रही है वो ये है कि दो परमाणुओं की टक्कर लगातार कराई कैसे जाए? और फिर इससे निकलने वाली ऊर्जा को इकट्ठा कैसे किया जाए? दो एटमों को टकराने में काफ़ी ताक़त लगती है. अब तक वैज्ञानिक वो तरीक़ा नहीं निकाल पाए हैं जिससे एटमों की टक्कर के बाद उनका मिलान करके जो उर्जा निकले, वो इस केमिकल प्रक्रिया को पूरी करने से ज़्यादा हो.

ऐसा मुमकिन है. ये बात हाइड्रोजन बम के तमाम कामयाब टेस्ट से साबित हो चुकी है. मगर, एटमों के फ्यूज़न से निकलने वाली ऊर्जा को कैसे नियंत्रित करके दूसरे काम में लाया जा सके, वो तरीक़ा अब तक नहीं ढूंढा जा सका है.

वैंकूवर में जनरल फ्यूज़न की लैब में मिशेल और उनके साथी यही काम कर रहे हैं, वो भी दसियों साल से. अमेज़न के जेफ बेजोस ने इसी प्रोजेक्ट में पैसा लगाया है, ताकि फ्यूज़न तकनीक को कामयाब बनाने की सरकारी कोशिशों की धीमी रफ़्तार से आगे निकला जा सके. इस प्रोजेक्ट में क़रीब दो करोड़ डॉलर रुपए लगे हैं.

सिर्फ़ जेफ़ बेजोस ही नहीं, अमरीका की बड़ी निवेश कंपनी क्राइसैलिक्स, कनाडा की तेल कंपनी सेनोवस और मलयेशियाई सरकार की निवेश कंपनी ख़ज़ाना नेशनल बेरहद ने भी जनरल फ्यूज़न में पैसा लगाया है.

वैंकूवर में जनरल फ्यूज़न के ठिकाने पर कई बरस से फ्यूज़न तकनीक को कामयाब बनाने की कोशिशें जारी हैं. कंपनी के प्रमुख मिशेल लाबर्ज ने प्लाज़्मा फिजिक्स में पीएचडी की हुई है. वो कहते हैं कि उनके कई प्रयोग कामयाब रहे हैं. मिशेल लाबर्ज, फ्यूज़न तकनीक को बड़े छोटे पैमाने पर आज़मा रहे हैं. कामयाब होने की सूरत में उन्हें पैसे की कमी नहीं रहेगी.

मगर इस प्रोजेक्ट से जुड़े अमीर लोग, हॉलीवुड फिल्म ''डार्क नाइट राइज़ेज़'' की याद दिलाते हैं. जिसमें कुछ अरबपति मिलकर एक वैज्ञानिक को फ्यूज़न रिएक्टर बनाने में मदद करते हैं. ताकि उससे हाइड्रोजन बम बना सकें.

ख़ैर, जनरल फ्यूज़न के अगुवा मिशेल या उनके निवेशकों का ऐसा कोई इरादा नहीं. आज मिशेल की कंपनी में 65 लोग काम कर रहे हैं. वैंकूवर में एक छोटा सा एटमी रिएक्टर लगाया है. जहां पर मिशेल और उनकी टीम लगातार काम कर रही है.

फ्यूज़न तकनीक के जानकार केनेथ फाउलर कहते हैं कि फिलहाल मिशेल और उनकी टीम कामयाबी के बेहद क़रीब पहुंचती लग रही है. वो आख़िरी चुनौती का सामना कर रहे हैं.

वहीं अमरीकी सरकारी प्लाज़्मा फ़िज़िक्स लैब के डिप्टी डायरेक्टर माइकल ज़ार्नस्ट्राफ को लगता है कि मिशेल और उनके साथियों के लिए अभी दिल्ली दूर है.

वैसे आख़िर में तो जनरल फ्यूज़न की कामयाबी इस बात पर निर्भर करेगी कि उनके निवेशकों का उन पर भरोसा बना रहता है या नहीं. वजह ये है कि ऐसे निवेशक दस साल के भीतर अपनी पूंजी पर फ़ायदेमंद रिटर्न चाहते हैं. मगर विज्ञान के प्रयोग इस बात की कोई गारंटी नहीं दे सकते.

जनरल फ्यूज़न के ठिकाने से क़रीब दो हज़ार किलोमीटर दक्षिण में एक और लैब है जो फ्यूज़न तकनीक से ऊर्जा पैदा करने की कोशिश कर रही है. इसका नाम है ट्राई अल्फ़ा. डो कैलिफोर्वनिया की ऑरेंज काउंटी में है.

ये लैब पिछले 18 सालों से ये कोशिश बेहद ख़ुफ़िया तरीक़े से कर रही है. हाल-फिलहाल तक, बाक़ी दुनिया से संपर्क के लिए इसने कोई ज़रिया नहीं खोला था.

मगर अब ट्राई अल्फा, अपने मिशन के बारे में लोगों से जानकारी साझा कर रही है. इसके निवेशकों में माइक्रोसॉफ्ट के सह-संस्थापक पॉल एलेन, वेंचर कैपिटल कंपनी वेनरॉक से लेकर रूसी सरकार की कंपनी रूसनैनो तक शामिल है.

हाल के दिनों में ट्राई अल्फा ने अपने से जुड़ी कई जानकारियां उजागर की हैं. यहां तककि पिछले साल अगस्त में मीडिया को भी बुलाया गया था ट्राई अल्फा के रिएक्टर और लैब को देखने के लिए. ट्राई अल्फ़ा कंपनी, जनरल फ्यूज़न से अलग तकनीक की मदद से फ्यूज़न एनर्जी पैदा करने की कोशिश कर रही है.

माइकल ज़ार्नस्ट्राफ कहते हैं कि ट्राई अल्फा की तकनीक साधारण है मगर ज़्यादा विकसित नहीं है. माइकल ने पिछले साल ट्राई अल्फा के केंद्र का जायज़ा लिया था. वो कहते हैं कि फ्यूज़न के लिए आम तौर पर ड्यूटेरियम-ट्राइटियम का इस्तेमाल होता है.

मगर ट्राई अल्फा बोरॉन-11 और प्रोटॉन के परमाणुओँ का मेल कराने की कोशिश कर रही है. केनेथ फाउलर कहते हैं कि ये बेहद मुश्किल है.

वैसे सभी जानकार ये मानते हैं कि फ्यूज़न तकनीक को कामयाबी से ऊर्जा पैदा करने में इस्तेमाल करने में अब तक कोई कामयाब नहीं हुआ. इसलिए ये कहना सही नहीं कि फलां तरीक़ा ग़लत है और फलां नहीं.

ट्राई अल्फ़ा के तरीक़े में कमी भले लोग निकालें, मगर उनके पास निवेशकों की अच्छी ख़ासी फौज है. ऊर्जा कंपनियों में पैसा लगाने वाले अमरीकी निवेशक मॉरिस गुंडरसन भी इसके निवेशकों में से एक हैं. मॉरिस कहते हैं कि ट्राई अल्फा कामयाब हो न हो, उसका प्लान अच्छा है. जोखिम लेने लायक़ है.

ट्राई अल्फा और जनरल फ्यूज़न ने बड़े निवेशक भले जुटा लिए हों, मगर उनके लिए चुनौती कामयाबी नहीं, वक़्त है. क्योंकि वेंचर कैपिटल निवेशक, दस साल से ज़्यादा वक़्त लेने वाले प्रोजेक्ट में दिलचस्पी नहीं लेते. तो अगर, ट्राई अल्फ़ा और जनरल फ्यूज़न ने वक़्त पर कामयाबी के क़दम नहीं चूमे, तो उनको पैसे का टोटा हो सकता है.

वहीं, फ्यूज़न तकनीक की कामयाबी में कितना वक़्त लगेगा, ये कहना बहुत मुश्किल है. फिर भी मॉरिस गुंडरसन उन बड़े कारोबारियों की तारीफ़ करते हैं जिन्होंने इन कंपनियों में निवेश किया है. वो कहते हैं कि जेफ बेजोस और पॉल एलेन ने बहादुरी भरा क़दम उठाया है. वो सम्मान के क़ाबिल हैं.

हालाकिं वो अपने कारोबार जैसी कामयाबी फ्यूज़न एनर्जी की दुनिया में दोहरा पाएंगे, इसमें संदेह है. ये हज़ार गुना ज़्यादा मुश्किल काम है.

हालांकि केनेथ फाउलर और माइकल ज़ार्नस्ट्राफ जैसे जानकार कहते हैं कि बड़े निवेशकों का दिलचस्पी लेना ही इस बात का सबूत है कि हम फ्यूज़न से ऊर्जा पैदा करने के बेहद क़रीब हैं.

दुनिया को बेकरारी से इस कामयाबी का इंतज़ार है. हमें आज इसकी सख़्त ज़रूरत भी है. ख़राब होते पर्यावरण और ख़त्म होते परंपरागत ईंधनों जैसे कोयले और तेल के भंडार, इस ज़रूरत को और बढ़ा रहे हैं.

वरना पहाड़ों पर बर्फ़ की चादर जैसी क़ुदरती ख़ूबसूरती से लेकर शानदार समुद्री बीच तक को क्लाइमेट चेंज से ख़तरा है. इन सब का जवाब फ्यूज़न एनर्जी ही है.

(अंग्रेज़ी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ़्यूचर पर उपलब्ध है.)

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