फिर सुर्खियों में है 'बुर्क़ा मुल्ला'

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पाकिस्तान के कट्टरपंथी सुन्नी धर्मगुरु मोहम्मद अब्दुल अज़ीज़ एक बार फिर ख़बरों में हैं और इस बार उनका नाम हत्या के मामले में सामने आया है.

अज़ीज़ पर पाकिस्तान के मानवाधिकार कार्यकर्ता और पत्रकार ख़ुर्रम ज़की की हत्या का आरोप है.

ज़की सांप्रदायिकताविरोधी वेबसाइट ‘लेट अस बिल्ड पाकिस्तान’ के संपादक थे.

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पाकिस्तान के एक तालिबानी धड़े ने कहा है कि पत्रकार ज़की शियाओं के ख़िलाफ़ अजीज़ के उग्र भाषणों को लेकर अभियान चला रहे थे, इसलिए उन्होंने ज़की की हत्या कर दी.

पिछले साल, अज़ीज़ का नाम मानवाधिकार कार्यकर्ता सबीन मोहम्मद की हत्या के मामले में भी सामने आया था, जब एक संदिग्ध ने कहा था कि अज़ीज़ के भाषण को सुनने के बाद उसने ये क़दम उठाया.

अब्दुल अज़ीज़ पाकिस्तानी तालिबान और अन्य स्थानीय सशस्त्र इस्लामिक और इस्लामिक स्टेट समूहों के समर्थन में उग्र भाषण देने के लिए कुख्यात हैं.

पंजाब में पैदा हुए अज़ीज़ राजधानी इस्लामाबाद की लाल मस्जिद में बड़े हुए, उनके पिता को 1966 में मस्जिद का इमाम नियुक्त किया गया था.

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Image caption इस्लामाबाद स्थित लाल मस्जिद (फ़ाइल फोटो)

1990 के दशक में पिता की हत्या के बाद अज़ीज़ और उनके भाई अब्दुल राशिद ग़ाज़ी ने उनकी जगह ली.

लेकिन 2004 में अज़ीज़ को लाल मस्जिद के इमाम की पदवी से हाथ धोना पड़ा, जब उन्होंने पाकिस्तानी सेना के ख़िलाफ़ ही फ़तवा जारी कर दिया और सेना पर हमला करने वाले इस्लामिक लड़ाकों को ‘शहीद’ क़रार दिया.

अज़ीज ने इस्लामिक स्टेट के साथ किसी तरह के संबंधों से इनकार किया है, लेकिन इस्लामिक क़ानून को लेकर आईएस की विचारधारा की तारीफ़ की है.

अज़ीज़ सिर्फ़ लड़कियों के लिए जामिया हफ़्सा नामक मदरसा चलाते हैं. इस मदरसे ने तब और सुर्खियां बटोरी जब उन्होंने इसके पुस्तकालय का नाम ओसामा बिन लादेन के नाम पर रखा.

2007 में लाल मस्जिद पर सेना के क़ब्ज़े के दौरान भी अज़ीज़ की भूमिका बेहद चर्चित रही. इस दौरान सेना के साथ हुए संघर्ष में मस्जिद के अंदर मौजूद लगभग 50 इस्लामिक लड़ाकों की मौत हो गई थी.

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Image caption कट्टरपंथी धर्मगुरु अब्दुल अज़ीज़ (दाएं)

इस घटना के बाद अज़ीज़ ने लाल मस्जिद से बुर्क़ा पहनकर भागने की कोशिश की थी, लेकिन पकड़े गए थे. यही वजह है कि उन्हें 'बुर्क़ा मुल्ला' के रूप में भी जाना जाता है.

उनके मदरसे में पढ़ रही लड़कियों के इस्लामिक स्टेट के प्रति वफ़ादारी दिखाने संबंधी वीडियो के जवाब में अज़ीज़ कहते हैं, “इन लड़कियों ने ये सब कुछ ख़ुद किया है. उन्होंने ऐसा इसलिए किया, क्योंकि उन्हें अपने मज़हब से प्यार है, इसलिए मैं इसकी निंदा नहीं कर सकता. हमारे नेताओं ने हमें 64 साल से बेवक़ूफ़ बनाया है. उन्होंने हमसे कहा था कि वे हमारे लिए इस्लामिक व्यवस्था लेकर आएंगे. कोई भी इसे लेकर ईमानदार नहीं है.”

इराक़ और सीरिया में इस्लामिक स्टेट का ज़िक्र करते हुए वो कहते हैं, “हमें पाकिस्तान और दुनिया के अन्य हिस्सों में ख़लीफ़ा का राज चाहिए...”

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2014 में पेशावर में सैन्य स्कूल पर तालिबानी हमले के बाद इस्लामिक कट्टरपंथियों के ख़िलाफ़ व्यापक सैन्य कार्रवाई की निंदा की. अज़ीज़ कहते हैं, “ओ शासकों, ओ सत्ता में बैठे लोगों, अगर तुम इस तरह की कार्रवाई करोगे, तो इसकी प्रतिक्रिया होगी.”

राजनीतिक विश्लेषक ख़ालिद अहमद का कहना है कि अब्दुल अज़ीज़ की इस्लामाबाद के कई तबक़ों में अच्छी पकड़ है और यही वजह है कि सत्ता उनसे उलझना नहीं चाहती.

पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसी की एक रिपोर्ट भी बताती है कि इस्लामाबाद और रावलपिंडी में यदि अज़ीज़ और लाल मस्जिद के कट्टरपंथियों पर कोई लगाम नहीं लगाई गई, तो वे क़ानून व्यवस्था के लिए गंभीर ख़तरा पैदा कर सकते हैं.

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