मेरे बाप का पैसा...

  • 21 मई 2016
नवाज़ शरीफ़ (फ़ाइल फोटो) इमेज कॉपीरइट Getty

मेरे पिताजी बहुत अमीर थे. मेरे पिताजी इतने अमीर थे कि आप कभी सोच भी नहीं सकते कि वे कितने अमीर थे. सबसे ज़्यादा अमीर.

जब ज़ालिम शासक आपकी दौलत पर कब्ज़ा कर लेते थे तो वे और अमीर हो जाते. दूसरे देशों के राजा उन्हें बुलाते, उनके साथ तस्वीरें खिंचवाते और उनसे अमीर होने के गुर पूछते. मेरी बात पर यक़ीन नहीं आता तो ये तस्वीर देखो.

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वह कौन है? मैं हूँ, सूट पहना हुआ है. 1973 की तस्वीर है. इस समय आप में से कितनों के पास सूट था. ग़ौर से देखें तो मैं आपको कोई ऐसा-वैसा लगता हूँ. और यह जो साथ खड़े हैं वो अमीरात के शेख़ हैं, ये कोई शेख रशीद टाइप शेख़ नहीं है. ये ‘असली ते वड्डे’ शेख़ हैं. शेख़ ज़ैद. नाम तो सुना ही होगा.

आप लोगों में से कितनों के पिता की शेख़ ज़ैद के साथ तस्वीर है. अगर है तो लाओ दिखाओ.

ये उस समय की बात है जब डॉलर चार रुपए का होता था, और सरकारी अधिकारी का वेतन पांच सौ रुपए था. देसी घी सवा रुपए सेर और बकरे का मांस दो रुपए सेर होता था.

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गेहूं आठ रुपए मन और मौलवी हलवे की देग पर ही खुश हो जाता था जो बत्तीस रुपए में बनती थी, जब पत्रकार की क़ीमत एक कप चाय और दो बिस्कुट होती थी.

उमरा (हज के समय के अलावा मक्का जाना) का किराया साढ़े चार सौ रुपए, बाटा के जूते ढाई रुपए में और सेठों की बेइज्ज़ती मुफ़्त में हुआ करती थी. उनके भले समय में मेरे अब्बा करोड़ों कमाया करते थे.

तुम अठारह करोड़ हो तुम में से कितनों को पता होगा कि करोड़ में कितने शून्य होते हैं. और आप सभी के माता-पिता का बहुत सम्मान है लेकिन ये तो बताओ उनके पास था क्या जो मेरे पिता का हिसाब मांगते हो.

वो जो मेरे भाषण पर डेस्क बजाकर खुश हो रहे हैं, उनके पिता अमीर नहीं थे लेकिन उनकी औलादें कहेंगी कि मेरे पिता के पास बहुत पैसा था.

और ये जो मेरी आवाज़ करोड़ों-अरबों का ज़िक्र कर रुआंसी हो रही है तो इसकी वजह यह है कि हमें विरासत में बेतहाशा धन के साथ कमी का एहसास भी मिला है. अमीर आदमी के घर, कार की तरह इस कमी का एहसास भी अधिक होता है. पिताजी को भी यह एहसास सारी उम्र रहा कि कोई तानाशाह राजा उनकी मेहनत की कमाई न छीन ले.

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फिर वह दुबई के दयालु राजा शेख़ ज़ैद से मिले तो पता चला कि शेख़ साहब को भी कमी का एहसास था कि देखो सऊदी अरब के राजा को उसके पास कितना पैसा है, सोने के शौचालय बना रखे हैं. जब हम सऊदी मेहमान हुए तो पता चला कि वो इस दुख में रहते हैं कि असल मौज तो कुवैती कर रहे हैं.

यही एहसास की कमी थी जो मुझे इस क्षेत्र में ले आई. पिताजी ने कहा कि पैसा तो अब ख़ुद बन रहा है. लोहे की भट्टी के पास जाओगे तो रंग काला होगा. कोई व्हाइट कॉलर काम कर लो, नाइन टू फाइव, इसीलिए राजनीति में आ गए. और आगे बढ़ते-बढ़ते प्रधानमंत्री, फिर प्रधानमंत्री और फिर प्रधानमंत्री बन गए. तो यूं समझो कि ज़ालिम राजाओं से बाप की कमाई बचाने के लिए ख़ुद राजा बन बैठे.

और अब तुम फिर पूछने लगे कि यह पैसा कहां से आया. मैंने शायद आपको बताया नहीं कि मेरे पिता थे उनके पास......

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