तालिबान नेता मुल्ला मंसूर का पाक से क्या नाता था?

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मुल्ला अख्तर मोहम्मद मंसूर अफ़ग़ानिस्तान के कंधार प्रांत के प्रभावशाली पश्तून हैं और इस्हाक़ज़ई कबीले के हैं.

शनिवार रात को अमरीकी अधिकारियों ने दावा किया कि उन्होंने अफ़ग़ान-पाक सीमा पर कई ड्रोन हमले किए हैं जिनमें संभवत: मुल्ला मंसूर मारे गए हैं.

अफ़ग़ानिस्तान और तालिबान गुटों के बीच क्या है मुल्ला मंसूर की अहमियत? एक नज़र डालते हैं मुल्ला मंसूर के अब तक के जीवन पर...

कंधार का क्षेत्र अफगानिस्तान में पश्तून समुदाय का राजनीतिक और सांस्कृतिक केंद्र माना जाता है.

तालिबान में नेतृत्व की भूमिका से पहले, मुल्ला मंसूर, मुल्ला उमर के समय कार्यवाहक प्रमुख की भूमिका में भी रहे. मुल्ला उमर तालिबान के संस्थापक और आध्यात्मिक प्रमुख थे.

मुल्ला मंसूर तालिबान के उन पहले लड़ाको में से थे जिन्होंने पाकिस्तान से कंधार पर हमला किया था फिर दो साल में ताबड़तोड़ हमले करते हुए पूरे अफ़ग़ानिस्तान पर कब्ज़ा कर लिया था. इन तालिबान ने ही अहमद शाह मसूद के नॉदर्न एलायंस को छोड़कर सभी मुजाहिदीन गुटों का सफ़ाया कर दिया था.

मुल्ला उमर की मौत के काफी समय बाद तक भी वह तालिबान की आधिकारिक वेबसाइट पर उनके बयानों को चलाते रहे.

Image caption मुल्ला उमर की मौत के बाद भी मुल्ला मंसूर तालिबान की वेबसाइट पर उनके ऑडियो चलाते रहे

मुल्ला मंसूर की इस हरकत ने शीर्ष तालिबान नेताओं में काफी विवाद पैदा किया था. उन पर ऐसे आरोप भी लगे कि उन्होंने कुछ कबीलों के नेताओं के साथ या फिर पाकिस्तानियों से मिलकर मुल्ला उमर की हत्या की साजिश रची.

उनके कई विरोधियों ने उन पर पाकिस्तानी खुफ़िया तंत्र के हाथों की कठपुतली होने का आरोप भी लगाया था. उन पर ये आरोप भी था कि मुल्ला मंसूर को पाकिस्तानी एजेंसियां सुरक्षा प्रदान करती हैं.

हालांकि, उनके नेतृत्व को मिल रही चुनौती तब ख़त्म होती नज़र आई जब अल-क़ायदा प्रमुख अयमान अल-ज़्वाहिरी ने मुल्ला मंसूर को मुल्ला उमर का वैध उत्तराधिकारी स्वीकार कर लिया.

1980 के दशक में जब तत्कालीन सोवियत संघ ने अफ़ग़ानिस्तान पर हमला किया और उसकी सेनाएँ वहाँ मौजूद थीं, तब मुल्ला मंसूर अपने परिवार के अन्य सदस्यों की तरह ही मुज़ाहिद्दीन थे और अपने साथ हथियार रखते थे.

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Image caption तालिबान लड़ाकों ने उनसे पहले सत्ता पर काबिज़ हुए मुजाहिद्दीन को खदेड़ दिया था

1987 में वो बलूचिस्तान की राजधानी क्वेटा चले गए. वहां उन्होंने अपनी धार्मिक शिक्षा जारी रखी.

मुल्ला मंसूर का जन्म 1963 और 1965 के बीच बंद-ए-तैमूर में, कंधार के मैवंद जिले में हुआ. ये अफगानिस्तान के दक्षिण और पाकिस्तान के दक्षिण पश्चिम बलूचिस्तान के बॉर्डर पर है.

एक स्वतंत्र अफ़गान समाचार एजेंसी पझवॉक के अनुसार, कंधार पर कब्ज़े के बाद तालिबान ने मंसूर को दक्षिणी शहर में हवाई अड्डों की सुरक्षा का प्रभारी बना दिया. बाद में उन्हें 'जेट लड़ाकू विमानों का कमांडर' भी बनाया गया था.

जब तालिबान ने 1996 में काबुल पर कब्जा किया था तब मंसूर अफगान एयरलाइन के निदेशक बनाए गए थे. बाद में उन्हें नागरिक उड्डयन मंत्री बनाया गया, इसके साथ ही उन्हें परिवहन और एयरफोर्स की अतिरिक्त जिम्मेदारी भी दी गई.

जब तालिबान सत्ता में आया तो उन पर यह भी आरोप लगा कि उन्होंने खाड़ी देशों में अपने व्यवसाय को स्थापित किया और वो भी अफ़ीम की खेती के इस्तेमाल से.

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Image caption पाकिस्तान से आए तालिबान लड़ाकों ने पहले कंधार और फिर काबुल पर कब्ज़ा कर लिया

2001 में जब अमरीका ने अफ़गानिस्तान पर हमला किया तो दूसरे तालिबानी नेताओं की तरह ही मुल्ला मंसूर भी क्वेटा चले गए थे.

2007 में जब पाकिस्तान ने पूर्व सुरक्षा मंत्री और तालिबान के नेता मुल्ला ओबैदुल्ला अख़ुंद को बंदी बनाया तो तालिबानी काउंसिल ने मुल्ला अब्दुल घनी को उनकी जगह दी. मुल्ला मंसूर को उस समय मुल्ला घनी का डिप्टी बनाया गया.

जब 2010 में मुल्ला ओबैदुल्ला को आईएसआई और सीआइए ने गिरफ्तार कर लिया गया तब मंसूर को तालिबान मूवमेंट का कार्यवाहक मुखिया बना दिया गया.

जब अफ़गानिस्तान खुफ़िया विभाग ने ये जानकारी लीक की कि मुल्ला उमर 2013 में ही मारे गए हैं तो इस सूचना से मंसूर को शर्मिदगी उठानी पड़ी.

लेकिन तभी पाकिस्तानी स्थित तालिबान नेताओं की काउंसिल ने तेजी से कार्रवाई करते हुए मंसूर को स्थाई नेता घोषित कर दिया था.

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