अपने जज़्बातों को दबाना अच्छी बात नहीं

  • 24 मई 2016
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हर देश के लोगों के बारे में धारणा बन जाती है. जैसे, अमरीकियों को ढीठ और बिंदास कहा जाता है. इसी तरह फ्रेंच लोगों को रूमानी और अक्खड़ माना जाता है. वहीं अंग्रेज़ों के बारे में कहा जाता है कि वो रूखे मिज़ाज के होते हैं.

अपने भाव खुलकर नहीं ज़ाहिर करते. तकलीफ़ चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो, अंग्रेज़, सबके सामने रोना पसंद नहीं करते. लोग मानते हैं कि आम तौर पर अंग्रेज़ रिज़र्व रहते हैं. खुलकर बातें नहीं करते.

तो क्या वाक़ई ऐसा है? क्या सच में अंग्रेज़ ऐसे होते हैं कि सबके सामने झूठ-मूठ की बहादुरी दिखाते हैं? वैसे किसी ख़ास देश के लोगों की बात छोड़ दें तो भी क्या रूखा मिज़ाज आपको बहादुर इंसान के तौर पर पेश करता है? अगर आप अपने मनोभाव छुपाए रखते हैं तो क्या लोग आपको मज़बूत इरादों वाला समझते हैं?

ब्रिटेन की क्वीन मैरी यूनिवर्सिटी के थॉमस डिक्सन ने एक दिलचस्प क़िताब लिखी है. इसका नाम है ''वीपिंग ब्रिटैनिका''. वो क्वीन मैरी यूनिवर्सिटी के सेंटर फ़ॉर द हिस्ट्री ऑफ इमोशन्स के निदेशक हैं. डिक्सन बताते हैं कि ब्रिटेन के लोगों के रूखे होने के बारे में जो धारणा बनी है वो असल में 1870 से लेकर 1945 के दौर की थी. उस दौर में ब्रिटिश साम्राज्य अपने उरूज पर था.

पब्लिक स्कूल में पढ़े-लिखे लोग, साम्राज्यवादी ताक़त से लैस अंग्रेज़, पूरी दुनिया पर राज कर रहे थे. ऐसे में अगर वो खुलकर एहसास का इज़हार करते तो लोग उनकी बहादुरी को बनावटी मानते. इसलिए वो बाक़ी दुनिया से बड़ी रुखाई से पेश आते थे.

थॉमस डिक्सन कहते हैं कि उस दौर से पहले अंग्रेज़ खुलकर अपने एहसास बयां करते थे. महारानी विक्टोरिया के दौर में जब ये रूख़े मिज़ाज के होने का आरोप अंग्रेज़ों पर चस्पां हुआ, उस वक़्त भी अंग्रेज़ बहुत जज़्बाती हुआ करते थे. मशहूर लेखक चार्ल्स डिकेंस की ही मिसाल ले लीजिए.

उन्होंने अपने तमाम किरदारों के जज़्बात खुलकर बयां किए हैं. या फिर ख़ुद महारानी विक्टोरिया को ही लीजिए. 1837 में जब जनता उनकी ताजपोशी का जश्न मना रही थी, तो ख़ुशी से उनके आंसू छलक पड़े थे.

थॉमस डिक्सन कहते हैं कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद अंग्रेज़ों का रूखा मिज़ाज बदलने लगा था. उन्नीस सौ साठ का दशक आते आते टीवी पर एगोनी आंटी नाम के किरदार तो अंग्रेज़ों को इस बात का हौसला दे रहे थे कि वो अपने जज़्बात खुलकर बयां करें. तब से दौर और भी बदल चुका है. मगर अंग्रेज़ों के रूखे होने की जो इमेज बनी, वो कभी भी बदल नहीं सकी.

डिक्सन कहते हैं कि आज ब्रिटेन में तमाम टीवी चैनल्स पर रोने-धोने वाले सीरियल आते हैं. उन्हें देख-देखकर लोगों की आंसुओं की धार बह चलती है. फिर भी अंग्रेज़ यही सुनना पसंद करते हैं कि वो रूखे मिज़ाज के हैं. असल में ये इमेज उनके सबसे बेहतरीन दौर से जुड़ी है. उस दौर की याद दिलाती है. लोग उसी में खोए रहना चाहते हैं.

इन सबके बावजूद ये कहा जा सकता है कि दूसरे देशों के लोगों के मुक़ाबले, अंग्रेज़ कम जज़्बाती होते हैं. वैसे वैज्ञानिकों ने इस बारे में अंग्रेज़ों पर कोई रिसर्च नहीं की है. मगर दूसरे देशों के लोगों पर काफ़ी तजुर्बा किया गया है.

जैसे कि जापानी लोगों को ग़लती का, शर्म का, किसी का कर्ज़दार होने का बहुत ज़्यादा एहसास होता है. उनके मुक़ाबले अमरीकी या यूरोपीय लोगों में ये जज़्बात कम होते हैं. अमरीकी और यूरोपीय लोग ग़ुस्से, खीझ और घमंड के भाव ज़्यादा महसूस करते हैं.

शायद ये एहसास अलग-अलग देशों की सभ्यताओं, उनकी सक़ाफ़त से जुड़े हैं. हर समाज में अलग-अलग मूल्यों को तरजीह दी जाती है. किसी ख़ास हालात पर लोग क्या महसूस करते हैं, क्या कहते हैं, वो तरीक़ा ही उनके जज़्बात तय करता है.

वैसे अलग अलग समाज में अपने जज़्बात खुलकर बयां करने के बारे में लोगों की अलग राय होती है.

2007 में ब्रिटेन के 2500 लोगों पर एक सर्वे किया गया था. उनसे पूछा गया कि क्या वो अपने एहसास खुलकर बयां करते हैं. केवल बीस फ़ीसद लोगों ने कहा पिछले 24 घंटे में उन्होंने खुले तौर पर अपने जज़्बात ज़ाहिर किए. हालांकि 72 फ़ीसद ने ये भी माना की दिल की बात दिल में रखने से घुटन होती है. इससे सेहत पर भी बुरा असर पड़ता है. इन लोगों में से 19 फ़ीसद को तो ये भी याद नहीं था कि उन्होंने कब आख़िरी बार खुलकर अपने एहसास ज़ाहिर किए थे.

अपने जज़्बात को छुपाना, उन्हें दबाना एक मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है. स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के जेम्स ग्रॉस कहते हैं कि लोग जो तमाम तरीक़े आज़माते हैं अपने मनोभाव छुपाने के लिए, उनमें से एक तरीक़ा, जज़्बात को दबाने का भी है.

कई लोग, ऐसे हालात टालते हैं जिसमें उनके जज़्बात बाहर आ जाएं. कुछ लोग हालात को ही बदलने की कोशिश करते हैं. कुछ लोग अपना ध्यान उस जगह से हटा लेते हैं, जहां पर उनके भावुक होने का डर होता है. और फिर जब हालात बदल जाते हैं तो वो लोग उसे नए नज़रिए से देखने की कोशिश करते हैं. या फिर बहुत से लोग अपने एहसास को ज़ाहिर ही नहीं होने देते. अपने दिल के भीतर दबाकर रखते हैं.

आम तौर पर ये कहा जाता है कि अगर आप अपने एहसासों पर इस तरह क़ाबू पान लेते हैं तो अच्छी बात है. इससे आपकी दिमाग़ी सेहत ठीक रहती है. उम्र बढ़ती है. आप करियर में भी काफ़ी कामयाब होते हैं.

मगर, मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि जज़्बातों को दबाना अच्छी बात नहीं. मान लीजिए कि आपके सालान एप्रेज़ल के वक़्त आपका बॉस आपके बारे में ख़राब बातें कहता है. आपको बुरा लगता है मगर आप चुप रह जाते हैं. तो ये अच्छी बात कैसे हो सकती है?

कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी की सुज़ैन श्वीज़र कहती हैं कि अपने एहसासों को दबाना ठीक उसी तरह है जैसे आप किसी ख़याल को दबाते हैं. मान लिया एक बार आप अपने जज़्बात दबाने में कामयाब हो गए. तो, अगली बार वो दोगुनी ताक़त से आपको परेशान करेगा.

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तमाम रिसर्च से ये बात सामने आई है कि अपने जज़्बातों को दबाने की आपको भारी क़ीमत चुकानी पड़ सकती है. स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के जेम्स ग्रॉस ने इस बारे में एक तजुर्बा किया. उन्होंने कुछ लोगों को एक भयानक फ़िल्म दिखाई. उन्हें कहा गया कि फ़िल्म देखने के दौरान वो अपने मनोभाव ज़ाहिर न होने दें. उन्हें दबा दें. इसी तरह कुछ लोगों को हंसी-मज़ाक़ वाली फ़िल्म दिखाई गई और उन्हें भी चुप रहकर फ़िल्म देखने को कहा गया.

ग्रॉस बताते हैं हंसी मज़ाक़ वाली फ़िल्म देखने वालों को ज़रा भी अच्छा नहीं महसूस हुआ. जबकि हल्की फुल्की फ़िल्म देखने के बाद उन्हें इस तरह का एहसास होना चाहिए था. वो अपने अच्छे जज़्बात दबा रहे थे. इससे उनके अंदर नेगेटिव फीलिंग आ गई.

अगर हम अपने जज़्बात दबाते हैं. उसे दिल में ही रखते हैं. तो इसके लिए हमें अच्छी ख़ासी मशक़्क़त करनी पड़ती है. इससे आपका ब्लड प्रेशर बढ़ता है. आपकी याददाश्त कमज़ोर होती है. फिर आप जिन लोगों से बात करते हैं, उन्हें अच्छा नहीं महसूस होता. सब कुछ बनावटी लगता है. आपसे बात करना सामने वाले को मुसीबत सा लगने लगता है.

तो फिर रूख़े मिज़ाज वाले अंग्रेज़ों की दिमाग़ी सेहत का क्या हाल होगा? अभी हाल में हुए एक सर्वे के मुताबिक़ अस्सी फ़ीसदी अंग्रेज़, मुश्किल वक़्त में भी अपने मन के भाव, ज़ाहिर नहीं करते. एक चौथाई ब्रितानी ये मानते हैं कि खुलकर अपने एहसास बयां करना कमज़ोरी की निशानी है.

आप ये सोचेंगे कि ऐसे देश में रहने वालों की दिमाग़ी हालत तो बुरी होगी. वो जल्दी मर जाते होंगे. एक दूसरे से नफ़रत करते होंगे.

ब्रिटेन की ही तरह पूर्वी एशियाई देशों में जज़्बातों को छुपाने का चलन है. जेम्स ग्रॉस कहते हैं कि अगर पूरे समाज में ही जज़्बात छुपाने का चलन है, तो इससे आपकी सेहत पर पड़ने वाला बुरा असर कम हो जाता है. क्योंकि आपके इर्द-गिर्द ऐसे ही लोग रहते हैं. उनसे जो बातचीत होती है, वो भी बनावटीपन के दायरे में ही आती है.

कई बार एहसास छुपाना फ़ायदेमंद भी होता है. जैसे किसी मुसीबत के वक़्त डर का इज़हार करने के बजाय बहादुरी ज़ाहिर करना, बेहतर होता है. तभी हम मुश्किल हालात का सामना कर पाते हैं. वरना सब लोग चीख पुकार मचाने लगेंगे तो ख़ौफ़ का माहौल बन जाएगा. ये नुक़सानदेह हो सकता है. हालात और बिगाड़ सकता है. अगर हम अपने आस-पास मज़बूत इरादे वाले लोगों को देखेंगे तो हमें भी हालात से लड़ने की ताक़त मिलेगी.

अब सवाल ये है कि हम किस नतीजे पहुंचते हैं?

नतीजा ये है कि अपने जज़्बातों को दबाना अच्छी बात नहीं. इससे आपकी सेहत पर बुरा असर पड़ा है. बेहतर होगा कि जो महसूस करते हैं खुलकर बयां करें. हां, मुश्किल वक़्त में धीरज से काम लेना बेहतर होगा. उस वक़्त अपने जज़्बातों को क़ाबू कर सकें, तो आपके लिए अच्छा होगा.

(अंग्रेज़ी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ़्यूचर पर उपलब्ध है.)

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