बच कर रहना इन नंबरों से !

  • 25 मई 2016
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क्या आपको पता है कि कुछ अंकों को दूसरे से साझा करने पर पाबंदी है? चौंक गए न! आप ये सोच रहे होंगे कि अंकों पर भला कोई कैसे पाबंदी लगा सकता है? पर ये बात सही है.

दुनिया में कुछ ऐसे नंबर्स हैं, जिन्हें, बिना इजाज़त या बिना पैसे दिए इस्तेमाल करने और शेयर करने पर रोक लगी है. अगर आप ऐसा करते हैं तो क़ानूनन जुर्म करते हैं. इसके लिए आप पर जुर्माना भी हो सकता है और आपको जेल की हवा भी खानी पड़ सकती है.

वैसे ये अंक सामान्य नहीं हैं. ख़ास तरह के और लंबी सीरिज़ के नंबर होते हैं. असल में ये किसी ख़ास प्रोग्राम के, फ़िल्म के कंप्यूटर कोड होते हैं. इन कोड्स का कुछ कंपनियों के पास कॉपीराइट होता है. उनकी इजाज़त के बग़ैर, या फिर उन्हें पैसे दिए बग़ैर आप इन्हें इस्तेमाल नहीं कर सकते.

अगर आपने पैसे देकर ख़ास कोड हासिल कर भी लिया है तो उसे दूसरों से मुफ़्त में साझा करना भी कई बार ग़ैरक़ानूनी होता है.

क्या आप अंकों के मकड़जाल में उलझा हुआ महसूस कर रहे हैं? चलिए बात को समझने के लिए वक़्त का पहिया थोड़ा पीछे घुमाते हैं.

बात 1999 की है. नॉर्वे के एक लड़के, जॉन योहानसेन ने अपने दो साथियों के साथ मिलकर एक कंप्यूटर प्रोग्राम तैयार किया था. इस कंप्यूटर प्रोग्राम का नाम DeCSS था. इसकी मदद से जॉन और उनके साथियों ने ताज़ा-ताज़ा रिलीज़ हुई हॉलीवुड फ़िल्म 'द मैट्रिक्स' को डाउनलोड कर लिया.

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जॉन के कंप्यूटर प्रोग्राम DeCSS की ख़ूबी ये थी कि इसकी मदद से लोग ऐसी ही डीवीडी में सेंध लगाकर उसे डाउनलोड कर सकते थे. इसके लिए उन्हें न कंपनी की इजाज़त की ज़रूरत थी, न पैसे ख़र्च करने की.

अगर इस कार्यक्रम का बहुत से लोग इस्तेमाल करने लगते, तो फ़िल्म की डीवीडी बेचने वाली कंपनी को तगड़ा झटका लगना तय था. इसीलिए जब कंपनी को जॉन के कंप्यूटर प्रोग्राम DeCSS के बारे में पता चला तो उसने जॉन पर कॉपीराइट के उल्लंघन का मुक़दमा कर दिया. हालांकि जॉन तो बच निकले. पर उनके कंप्यूटर प्रोग्राम से नई बहस छि़ड़ गई. बहस ये थी कि क्या कुछ अंकों के इस्तेमाल पर पाबंदी लगाई जा सकती है?

आप पूछेंगे कि किसी कंप्यूटर प्रोग्राम का अंकों से क्या ताल्लुक़? असल में हर कंप्यूटर प्रोग्राम कुछ ख़ास अंकों का कोड होता है. अब जिस भी कंपनी ने ये कोड तैयार किया है, उसका इस पर कॉपीराइट होता है. उसकी इजाज़त के बग़ैर वो ख़ास कोड या नंबर इस्तेमाल करना ग़ैरक़ानूनी है.

मगर इसके विरोधी लोगों का कहना है कि किसी नंबर पर किसी का हक़ कैसे हो सकता है? वो तो सबके इस्तेमाल के लिए हैं. अगर किसी ने उन ख़ास अंकों में अपना प्रोग्राम कोड कर दिया है तो उसके लिए दूसरों के उस ख़ास नंबर्स के इस्तेमाल करने पर पाबंदी क्यों लगे?

जब जॉन के DeCSS प्रोग्राम पर कंपनियों ने शिकंजा कसना शुरू किया. तो अंकों के इस्तेमाल की आज़ादी के समर्थकों ने इसे ज़ोर-शोर से इंटरनेट पर शेयर करना शुरू कर दिया. इसकी कई कॉपी बन गईं. किसी ने गानों की शक्ल में कॉपी किया तो किसी ने नंबर्स की शक्ल में.

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विरोध करने वालों का कहना था कि किसी ख़ास विचार पर रोक नहीं लगाई जा सकती.

इस पूरे मसले पर नज़र रखने वाले अमरीकी एक्सपर्ट डेव टोर्ट्ज़की कहते हैं कि दुनिया भर के कंप्यूटर प्रोग्रामर्स ने इस मामले में ख़ूब दिलचस्पी ली. उस दौर में किसी ख़ास कोड पर पाबंदी लगाने का ये पहला बड़ा मामला था.

कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के इंजीनियर फिल कार्मोडी ने तो विरोध जताने के लिए DeCSS प्रोग्राम को ही नए कंप्यूटर कोड की शक्ल में ढाल दिया. ये 1905 अंकों का एक पूर्णांक था. फिल का ये कोड कुछ ज़्यादा ही लंबा था. लेकिन कंप्यूटर और अंकों के इतिहास में ये एक बहुत बड़ा पड़ाव था. अब इस अंक पर कोई अदालत या कोई क़ानून पाबंदी नहीं लगा सकता था.

हालांकि बाद में फिल कार्मोडी ने ख़ुद लिखा कि किसी ख़ास कोड की मदद से बिना पैसे दिए किसी डीवीडी को डाउनलोड करना या इस्तेमाल करना ग़ैरक़ानूनी है. लेकिन, जिस तरह अमरीकी क़ानून लागू किया जा रहा है वो भी ग़लत है. क्योंकि ये क़ानून आम लोगों के लिए नहीं, बड़ी कंपनियों का मददगार है.

DeCSS कार्यक्रम के हवाले से विरोध की मुहिम में शामिल थे एक और कंप्यूटर प्रोग्राम, सेथ शोएन. वो इलेक्ट्रॉनिक फ्रंटियर फाउंडेशन में काम करते हैं. उन्होंने हैकू भाषा में DeCSS प्रोग्राम का गीत तैयार किया था.

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वो कहते हैं कि फिल कार्मोडी की कोशिश क़ाबिले तारीफ़ थी. अगर जॉन योहानसन का DeCSS प्रोग्राम उन्होंने अंकों में कोड कर लिया. तो, इसका मतलब वो प्रक्रिया क़ुदरती तौर पर हो रही थी, तभी तो उसे अंकों में ढाला जा सका.

वैसे कार्मोडी के इस कारनामे से पहले ही कुछ पूर्णांकों के ग़ैरक़ानूनी होने की चर्चा कंप्यूटर की दुनिया में चल रही थी. क़ानून के प्रोफ़ेसर इबेन मोग्लेन कहते हैं कि कोई भी कंप्यूटर फ़ाइल, अंकों में ही लिखी जाती है. इन्हें बाइनरी नंबर कहते हैं. एक और ज़ीरो के ये समूह मिलकर एक ख़ास पूर्णांक बनते हैं.

जैसे कि कोई बहुत बड़ा नंबर, माइक्रोसॉफ्ट वर्ड का कोड हो सकता है. इस पर माइक्रोसॉफ्ट का कॉपीराइट है. अगर आप ये नंबर इस्तेमाल करते हो, दूसरों में बांटते हो तो आपको सज़ा हो सकती है.

DeCSS एपिसोड के कुछ साल बाद कंप्यूटर की दुनिया में कुछ और ऐसे मामले सामने आए. इक्कीसवीं सदी की शुरुआत में ही कुछ हाई डेफिनिशन डीवीडी और ब्लू रे डिस्क के कोड सार्वजनिक कर दिए गए. इसे अंको के शॉर्ट कोड में लिखकर लोगों ने ख़ूब शेयर किया. कई लोगों ने तो इसक टैटू भी गुदवा लिए थे.

अमरीकी संस्थाओं, मोशन पिक्चर्स एसोसिएशन ऑफ अमेरिका और एक्सेस कंटेंट सिस्टम लाइसेंसिंग एडमिनिस्ट्रेटर ने लोगों से अपील की कि वो ये कोड न शेयर करे. मगर लोगों ने ये अपील अनसुनी कर दी.

इस मुहिम की अगुवा थी डिग नाम की एक वेबसाइट. उस वेबसाइट ने भी ये ख़ास कोड हटाने से इनकार कर दिया. और कहा कि वो इससे पैदा हुई क़ानूनी चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार है. आज भी ये कोड खुले तौर पर उपलब्ध हैं.

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वैसे कई बार अंकों पर पाबंदी सिर्फ़ कंप्यूटर के कोड की वजह से नहीं लगती. इसकी और वजहें भी हो सकती हैं.

जैसे कि अमरीका के कई स्कूलों में कुछ ख़ास नंबर लिखे कपड़े पहनने पर रोक है. कोलोराडो में एक स्कूल अधीक्षक ने इसकी वजह बताई, उन्होंने कहा कि 18, 81, 13, 31, 14 और 41 नंबरों का ताल्लुक़ कुछ आपराधिक संगठनों से है. कई गैंग इन नंबरों से अपनी पहचान बनाते हैं. बच्चों का इन अपराधियों की तरफ़ झुकाव न हो जाए, इसलिए ये नंबर लिखे कपड़े पहनने पर रोक है.

इसी तरह चीन में तियानमेन स्क्वॉयर में 1989 में हुई घटना के चलते 4 जून 1989 अंकों को इंटरनेट पर सर्च करने पर रोक लगी हुई है. जबकि ये अंक और बातें भी ज़ाहिर कर सकते हैं.

एक तरह से इन अंकों को ख़ास तरह से लिखकर इस्तेमाल करने पर रोक है. मगर, रोक तो फिर भी है. क़ानून के जानकार, इन पाबंदियों को जायज़ ठहराते हैं.

आज कंप्यूटर हमारी ज़िंदगी का अहम हिस्सा बन गए हैं. तो अंकों के इस्तेमाल और उन पर पाबंदी का ये विवाद फिलहाल सुलझने के आसार नहीं हैं.

आज आतंकी वारदातों के चलते कुछ नेता, संदेशों के एनक्रिप्शन को ख़त्म करने की बात कर रहे हैं. वहीं एनक्रिप्शन के हामी लोग इसे लोगों की प्राइवेसी में दखल मानते हैं. एनक्रिप्शन ठीक वही चीज़ है, जैसे कि 'द मैट्रिक्स' फिल्म की डीवीडी का वो कोड जो जॉन योहानसन ने तोड़ा था DeCSS की मदद से.

विकीपीडिया के संस्थापक जिम्मी वेल्स कहते हैं कि अंकों पर पाबंदी हास्यास्पद है. वहीं वक़ीलों और अफसरों की नज़र में ये ज़रूरी है. वजह ये कि बहुत सी चीज़ें हैं जो अब नंबर्स में सिमट जाती हैं.

लेकिन अंकों का खेल ऐसा है कि इन पर पूरी तरह से पाबंदी लगाना नामुमकिन है. आख़िर गणित पढ़ने और गणित करने से कौन किसे रोक सकता है?

(अंग्रेजी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ़्यूचर पर उपलब्ध है.)

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