स्पेलिंग प्रतियोगिता में लगातार छा रहे हैं भारतीय

  • 31 मई 2016
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Image caption 2016 के विजेता निहार जंगा

अमरीका में 2016 स्क्रिप्स नेशनल स्पेलिंग बी प्रतियोगिता को भारतीय मूल के दो लड़कों, 11 साल के निहार जंगा और 13 साल के जयराम हथवार ने जीता.

पिछले हफ्ते आयोजित हुए इस प्रतियोगिता में जीतने वाले निहार टेक्सास के रहने वाले हैं जबकि जयराम न्यूयॉर्क से हैं.

राष्ट्रीय प्रतियोगिता के फाइनल में इस जोड़ी ने 25 राउंड तक लड़ाई लड़ी. इसका सीधा प्रसारण टीवी पर किया गया था.

दोनों को प्रतियोगिता का विजेता घोषित किया गया. इनाम के तौर हर विजेता को 40 हज़ार डॉलर के साथ कई अन्य इनाम भी दिए गए.

2015 में इस प्रतियोगिता के विजेता थे गोकुल वेंकटचेलम और वान्या शिवशंकर. वान्या की बड़ी बहन काव्या ने ये प्रतियोगिता 2009 में जीती थी.

2014 में विजेता अनसुन सुजोए और श्रीराम हथवार रहे. श्रीराम, इस साल के विजेता जयराम के बड़े भाई हैं.

वहीं 2013 में भारतीय मूल के अरविंद महानकाली, 2012 में स्निग्धा नंदिपति, 2011 में सुकन्या रॉय और 2010 में अनामिका वीरामनी रहे थे.

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Image caption 2016 के विजेता जयराम हथवार

इस प्रतियोगिता के प्रतिभागियों पर नज़र डालें तो इस साल फाइनल राउंड में जाने वाले 285 प्रतियोगियों में से 70 दक्षिण एशियाई नामों वाले थे.

अमरीका में पिछले नौ सालों के स्पेलिंग बी प्रतियोगिता जीतने के अलावा भारतीय मूल के अमरीकी बच्चों ने पिछले पांच नेशनल जियोग्राफिक बी प्रतियोगिताओं को भी जीता जिसमें लाखों अमरीकी बच्चों के भूगोल के ज्ञान को परखा गया.

2005 से इन दो प्रतियोगिताओं में भारतीय मूल के बच्चों के जीतने की औसत 80 से ज्यादा है.

लेकिन वो क्या कारण है कि अमरीकी स्कूली बच्चों में महज़ एक प्रतिशत से भी कम संख्या वाले इन बच्चों की जीत का दर इतना ज़बरदस्त है?

पेनसिल्वेनिया यूनिवर्सिटी के देवेश कपूर और कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी-सांताक्रूज के निरविकार सिंह के साथ संजय चक्रवर्ती की एक रिसर्च इस विषय पर कुछ रौशनी डालती है.

सबसे पहले देखना ये है कि स्कूल और कॉलेजों में बच्चों के लिए आयोजित दूसरी प्रतियोगिताओं में भारतीय मूल के अमरीकी बच्चे कैसे परफॉर्म करते हैं.

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शैक्षिक प्रतियोगिताओं, ख़ासकर गणित और विज्ञान से जुड़े प्रतियोगिताओं में भारतीय मूल के अमरीकी बच्चे बहुत अच्छा प्रदर्शन करते हैं लेकिन स्पेलिंग और जियोग्राफिक बी के शानदार प्रदर्शन के बराबर नहीं, लेकिन अपनी जनसंख्या के दर से 5 से 20 गुना.

इन प्रतियोगिताओं में शामिल है सीमेंस विज्ञान प्रतियोगिता, इंटेल साइंस टैलेंट सर्च, मैथकाउंट्स और यूएस प्रेसिडेंशियल, रोड्स, ट्रूमैन, चर्चिल और मार्शल स्कॉलरशिप.

लेकिन म्यूज़िक और एथलेटिक्स के क्षेत्र में उनकी भागेदारी ना के बराबर है.

उदाहरण के तौर पर 2013 के ऑल नेशनल ऑनर एनसेंबल में ऑर्केस्ट्रा में 45 फीसदी म्यूज़िशियन्स और बैंड में 13 फीसदी एशियाई मूल के अमरीकी थे जबकि महज़ दो और एक फीसदी क्रमश: भारतीय मूल के अमरीकियों ने ही इसमें हिस्सा लिया.

एथलेटिक्स और टीम के खेलों में भारतीय मूल के अमरीकी हाई स्कूल के स्तर पर बढ़-चढ़कर भाग लेते हैं लेकिन कॉलेज और पेशेवर खेलों से ये लगभग नदारद हैं.

कोई भी भारतीय मूल के अमरीकी ने पेशेवर खेल लीग जैसे अमरीकन फुटबॉल, बेसबॉल, बास्केटबॉल या आइस हॉकी ने भाग तक नहीं लिया.

बेसबॉल में भी दूर-दूर तक कोई उभरती प्रतिभा टॉप के 100 हाई स्कूल में नहीं है.

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इस खाई को समझना संभव है.

म्यूज़िक के क्षेत्र में ऐसा संभव है कि भारतीय मूल के अमरीकी माता-पिता अपने पारंपरिक म्यूज़िक पर ही फोकस करना चाहते हैं.

क्रिकेट के अलावा भारत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दूसरे खेलों में बहुत कम हिस्सा लेता है इसलिए ऐसा सोचना कि भारतीय मूल के अमरीकी इससे कुछ बेहतर करेंगे थोड़ा मुश्किल लगता है.

लेकिन सबसे अहम कारण है कि जो लोग भारत से आकर अमरीका में बसे हैं उनमें से कइयों ने अत्यंत उच्च स्तरीय शिक्षा प्राप्त की है, एक तिहाई के पास स्नातकोत्तर डिग्रियां हैं जबकि एक तिहाई के पास कॉलेज डिग्रियां हैं.

करीब 90 फीसदी डिग्रियां तक़नीक़ी क्षेत्रों में है, बड़ा तबका इंजीनियरिंग के क्षेत्र में है.

अमरीका में रहने वाले भारतीय मूल के लोगों में एक तिहाई सूचना प्रौद्योगिकी और कंप्यूटर संबंधी नौकरियों से जुड़े हैं

कई भारतीय अलग-अलग व्यवसायों से जुड़े हैं जिनमें गैस स्टेशन, फास्ट फूड फ्रेंचाइजी और ख़ास तौर पर होटल-मोटल व्यवसाय शामिल हैं.

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इन प्रतियोगिताओं को जीतने वाले बच्चों के माता-पिता बेहद पढ़े-लिखे हैं और इसलिए वो शिक्षा को अहमियत देते हैं.

शायद सबसे महत्वपूर्ण बात है कि अगली पीढ़ी को यही मूल्य वो आगे बढ़ा रहे हैं.

सफलता के लिए आप्रवासी की भूख, व्यक्तिगत तौर पर और एक समुदाय के भी तौर पर.

मेहनत करने की लगन और ज़रूरत पड़ने पर अभाव भी झेलना, कुछ भी जो मुख्य धारा का हिस्सा बनने और एक शानदार उदाहरण बनने के लिए ज़रूरी है.

(संजय चक्रवर्ती, फिलाडेल्फिया के टेंपल यूनिवर्सिटी में शिक्षक हैं. वो पांच किताबों के लेखक हैं, सबसे हाल में उनका पहला उपन्यास द प्रोमोटर के लेखक हैं)

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