फेसबुक हम पर थोप रहा है अपनी राय!

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आज सॉफ्टवेयर का ज़माना है. वो हमें बताता है कि हमें क्या करना चाहिए. हमें क्या खाना चाहिए? क्या पहनना चाहिए? क्या ख़रीदना चाहिए? क्या पढ़ना चाहिए? यहां तक कि हमें क्या सोचना चाहिए, ये भी हमें आज सॉफ्टवेयर बता रहे हैं.

मगर, तकनीक के इस दौर में एक पुराने दौर सा विवाद उठ खड़ा हुआ है. कुछ लोग, हमें ये बता रहे हैं कि ख़बर क्या है. ये हमें बता ज़रूर रहे हैं, मगर इनकी कोई जवाबदेही नहीं तय है. पता चला है कि फ़ेसबुक पेज पर जो आप ट्रेंडिंग टॉपिक नाम की जानकारी देखते हैं, असल में उसे कुछ इंसान हमारे आपके लिए तय कर रहे हैं.

आरोप ये है कि इस तरह से फ़ेसबुक, कुछ लोगों की राय हमारे ऊपर थोप रहा है. दिलचस्प बात ये है कि जब अक्सर लोग ये शिकायत करते हैं कि इंसान की जगह मशीनें ले रही हैं तो, आज फ़ेसबुक पर ये इल्ज़ाम है कि वो इस काम के लिए किसी सॉफ्टवेयर के बजाय इंसानों की मदद ले रहा है.

फ़ेसबुक पर सबसे संगीन आरोप ये है कि वो रुढ़िवादी, कट्टरपंथी विचारों को दबा रहा है. जब भी ट्रेंडिंग न्यूज़ या टॉपिक चुना जाता है, वो कट्टरपंथ के विरोधी होते हैं. यानी फ़ेसबुक पर ट्रेंडिंग टॉपिक चुनने वाले एक ख़ास विचारधारा को हमारे ऊपर थोप रहे हैं.

हालांकि फ़ेसबुक ने इस आरोप को सरासर ग़लत बताया है. फ़ेसबुक के इस भेदभाव को गिज़्मोडो नाम की वेबसाइट ने इसी साल मार्च में पकड़ा था.

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गिज़्मोडो का कहना था कि इंसानों के ट्रेंडिंग टॉपिक चुनने में हमेशा ये ख़तरा रहता है कि उनकी अपनी राय, चुनाव में शामिल हो जाती है. दूसरी बात ये कि ये चुनाव करने वाले हर तरह की जवाबदेही से आज़ाद हैं.

बड़ा सवाल ये है कि फ़ेसबुक जैसा लोकप्रिय सोशल माध्यम, आज कुछ लोगों को ये हक़ दे रहा है कि वो हमारे लिए चुनाव करें. हमें बताएं कि कौन सी ख़बर में दिलचस्पी लें.

हमारे बदले ये चुनाव करने की ज़िम्मेदारी हमने उन्हें नहीं सौंपी. वो ख़ुद ये काम कर रहे हैं. सो उनकी कोई जवाबदेही नहीं है. अब अगर फ़ेसबुक या कोई और सोशल माध्यम हमारे लिए ख़बर चुनेंगे, हमें चुनिंदा जानकारी देंगे. तो, हमें ये पता होना चाहिए कि आख़िर ये चुनाव करने का पैमाना क्या है.

ये बहुत अहम बात है. क्योंकि जो चुनिंदा जानकारी हमें इन माध्यमों से मिलती है उसी के आधार पर हम अपनी राय क़ायम करते हैं. अपने फ़ैसले करते हैं. किसी ख़ास विचारधारा से जुड़ी जानकारी बार-बार मिलने पर हमारा झुकाव उस तरह हो सकता है. हमारी राय बदल सकती है. हमारा बर्ताव बदल सकता है. ये बेहद गंभीर मसला है.

इसकी गंभीरता समझने के लिए एक मिसाल को समझिए. अक्सर सरकारें लोगों की राय को धीरे-धीरे धक्का देती हैं. सीधे से कोई बात नहीं कही जाती. घुमा-फिराकर सरकार की किसी ख़ास नीति के बारे में लोगों की राय बदलने की कोशिश होती है. लोगों को अंगदान करने के लिए राज़ी करने के लिए जो तरीक़ा अपनाया जाता है वो इसकी सबसे अच्छी मिसाल है. लोगों को दान करने की हामी भरने का अधिकार देने के बजाय सरकारें ये कहती हैं कि वो चाहें तो दान नहीं कर सकते हैं. इस तरह से ज़्यादा लोग अंग दान के लिए राज़ी हो जाते हैं.

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अब लोगों को उकसाने की इस नीति के बारे में ख़राब बात क्या है. जानकार कहते हैं कि कि लोगों के पास जानकारी के आधार पर फ़ैसला लेने का विकल्प नहीं होता. उन्हें बस हां या ना का विकल्प दिया जाता है.

लेखक निक हार्कावे कहते हैं कि लोगों की राय के आधार पर नीति बनाने के बजाय होता ये है कि नीति बनाकर फिर उसमें लोगों की राय फिट कर दी जाती है.

किसी चीज़ का चुनाव, एक बहुत बड़ी क़ाबिलियत है. एक आदत है. इसके लिए लोग अपने दिमाग़ पर ज़ोर डालते हैं. लगातार कोशिश करते रहने से ही हममें फ़ैसला लेने की क़ूवत आती है.

जब हम ऑनलाइन होते हैं, हम पर लगातार दबाव बनता है, चुनाव करने का. क्या देखें, क्या पढ़ें, क्या ख़रीदें, क्या खाएं. अब जो सॉफ्टवेयर हमें ये चुनाव करने के लिए उकसाते हैं, उन्हें कुछ इंजीनियर बनाते हैं. ये सॉफ्टवेयर डेवेलप करते वक़्त, वो अपनी ख़ास सोच को हम पर थोप सकते हैं.

अपनी राय हम पर थोपने का काम सिर्फ़ फ़ेसबुक नहीं कर रहा है. नई-नई तकनीक हमें, दिनों-दिन चुनाव करने के लिए उकसाती रहती है. गूगल हो या अमेज़न, या फिर एपल. सभी कंपनियां आपके बारे में, आपकी दिलचस्पियों के बारे में जानकारी जमा करती हैं. फिर विकल्पों की बमबारी करके आपको चुनाव के लिए मजबूर करती हैं.

ये फ़ैसले करते वक़्त आपको किसी भी चीज़ के बारे में पूरी जानकारी नहीं होती. फिर आप किसी ख़ास चीज़ की तरफ़दारी करने लगते हैं.

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लुसियानो फ्लोरिडी तकनीक की दुनिया के दार्शनिक माने जाते हैं. वो कहते हैं कि ऐसा सॉफ्टवेयर बनाने की ज़रूरत है, जो बिना किसी भेदभाव के आपको पूरी जानकारी दे. तब आप सोच-समझकर कोई फ़ैसला लें. फ्लोरिडी कहते हैं कि सॉफ्टवेयर को सिर्फ़ जानकारी देनी चाहिए. उसे हमें कोई फ़ैसला लेने को, कोई चुनाव करने को मजबूर नहीं करना चाहिए.

असल में लोग क्या चाहते हैं और उनके लिए क्या सही होगा, ये दोनों ही अलग बाते हैं. अब आपको क्या कपड़े पसंद हैं और आपकी नेट सर्फ़िंग के दौरान कौन से कपड़ों के विज्ञापन आपकी स्क्रीन पर लटके दिखेंगे, इन दोनों बातों में बड़ा फ़र्क़ होता है. ये कई बार भेदभाव भरा होता है. आपको तो सिर्फ़ सही जानकारी होनी चाहिए. कौन सा कपड़ा ख़रीदना है, ये फ़ैसला करने का अधिकार सिर्फ़ आपका है. बार-बार स्क्रीन पर विज्ञापन थोपकर, कंपनियां आपको अपने प्रोडक्ट ख़रीदने के लिए एक तरह से उकसाती रहती हैं. ये आपकी फ़ैसला लेने की आज़ादी पर हमला है.

आपको सही जानकारी मिले और आप सही फ़ैसला ले सकें, इसके लिए सबसे अच्छा होगा कि सॉफ्टवेयर और इंसान मिलकर आपकी मदद करें. कंपनियों को इस तालमेल पर ज़ोर देना चाहिए.

मगर, दिक़्क़त फिर वही होगी. सॉफ्टवेयर डेवेलपर्स भी तो इंसान ही होंगे. उनकी भी ख़ास राय होगी. अपनी विचारधारा या पसंद को वो सॉफ्टवेयर के ज़रिए हम पर थोप सकते हैं.

कुल मिलाकर ये कहें कि इंसान के भेदभाव भरे ख़यालों से बचवा मुश्किल है, तो ग़लत नहीं होगा.

(अंग्रेजी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ्यूचर पर उपलब्ध है.)

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