जब मन ही अंधा हो तो क्या करें...

  • 1 जून 2016
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जब आपके ज़ेहन में किसी इंसान या किसी जगह का ख़्याल आता है, तो, फ़ौरन ही दिमाग़ उसका तसव्वुर कर लेता है. किसी इंसान का ख़्याल आने पर उसकी सूरत, उसकी आंखों का रंग, बालों का स्टाइल, सबकी तस्वीर दिमाग़ में आ जाती है.

मगर, क्या आपको मालूम है कि कुछ लोग ऐसा नहीं कर सकते? किसी जगह या इंसान का नाम लेने पर उनका ज़ेहन कोई तस्वीर नहीं याद कर पाता, न अपने तसव्वुर में ही ये लोग कोई तस्वीर गढ़ पाते हैं. हैरान रह गए न! हो सकता है कुछ पलों के लिए आप यक़ीन ही न करें. मगर है ये सौ फ़ीसद सच.

दुनिया में ऐसे बहुत से लोग हैं, जिनका दिमाग़ कोई तस्वीर नहीं गढ़ पाता. ये एक बीमारी है. इसका नाम है 'एफैन्टासिया'. असल में ये इंसान की कल्पनाशीलता, हमारे तसव्वुर की क़ाबिलियत की कमी होती है.

यूं तो इस बीमारी का पता उन्नीसवीं सदी में ही चल गया था. 1880 में इस बीमारी की खोज हुई थी. लेकिन, हाल के दिनों में वैज्ञानिकों ने इस बीमारी को समझने में फिर से दिलचस्पी दिखाई है. वो इससे होने वाले नफे-नुक़सान को समझने की कोशिश कर रहे हैं. ताकि इसका इंसानियत के हित में इस्तेमाल कर सकें. इसकी मदद से कुछ बीमारियों जैसे किसी बुरी लत, फ़िक्र करने की आदत से निपटने के तरीक़े भी तलाशे जा रहे हैं.

'एफैन्टासिया' की तरफ़ लोगों का ध्यान खींचा ब्रिटेन की एक्सटर यूनिवर्सिटी में हुए एक रिसर्च ने. ये तजुर्बा पिछले ही साल एडम ज़ेमन और उनके साथियों ने किया था. ये उन लोगों पर किया गया जिनके दिमाग़ कोई तस्वीर नहीं गढ़ पाते.

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इसकी सबसे अच्छी मिसाल हैं फिलिप नाम के शख़्स. उनके दिमाग़ में कोई भी बात आए, मगर उससे जुड़ी कोई तस्वीर नहीं बनती. दिलचस्प बात ये है कि जब फिलिप सो रहे होते हैं तो उनके ख़्वाब किसी आम इंसान जैसे ही होते हैं. जिसमें कुछ लोग होते हैं, कुछ जगहें होती हैं. लेकिन, जब फिलिप जाग रहे होते हैं तो उनके दिमाग़ में कोई तस्वीर नहीं बनती. वो जब आंखें बंद करते हैं तो उन्हें सिर्फ़ अपनी पलकें दिखाई पड़ती हैं. और कुछ भी नहीं. वो ये जानकर हैरान हैं कि लोग जब किसी के बारे में सोचते हैं तो दिमाग़ में एक तस्वीर बन जाती है.

अब अगर आप आम इंसान हैं किसी का ख़्याल आते ही कोई तस्वीर ज़ेहन में उभर आती है, तो आपके लिए ये समझना मुश्किल है कि 'एफैन्टासिया' के मरीज़ कैसा महसूस करते हैं.

मान लीजिए कि आपको कहा जाए कि आप शांति की कल्पना कीजिए. अब अमन कोई शख़्स तो है नहीं, जो उसका तसव्वुर कर लें. फिर वो कोई चीज़ भी नहीं. वो तो महज़ एक ख़ास तरह का माहौल है. ऐसी सूरत में अमन का तसव्वुर आप करेंगे तो आपका दिमाग़ पहले तो कोई तस्वीर ही नहीं गढ़ पाएगा और कुछ सोचा भी तो शांति के प्रतीक माने जाने वाले सफ़ेद कबूतर का ख़याल ज़ेहन में आएगा.

फिलिप जैसे 'एफैन्टासिया' के बीमार लोग ऐसे हालात से रोज़ गुज़रते हैं. फिलिप को ये तो मालूम है कि किसी इंसान का चेहरा कैसा दिखता है. लेकिन किसी ख़ास इंसान का चेहरा उन्हें नहीं याद आता.

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मसलन वो अपने पिता का ख़्याल करते हैं तो भी उनका चेहरा नहीं याद कर पाते. उन्हें ये तो याद है कि उनकी आंखें नीली थीं. या उनकी नाक का साइज़ क्या था. मगर इससे ज़्यादा फिलिप के ज़ेहन में कुछ नहीं आता.

दो लोगों के बीच में फ़र्क़ करने के लिए हमें उनके चेहरे की अपनी कल्पना से ही माप लेनी पड़ती है. लेकिन आपका दिमाग़ कैसा चल रहा है, ये पता लगाना मुश्किल काम है.

इस बारे में ऑस्ट्रेलिया की न्यू साउथ वेल्श यूनिवर्सिटी के जोएल पियर्सन ने रिसर्च की है. वो लोगों के तसव्वुर को नाप सकते हैं. पियर्सन उनके ख़्याल बदल भी सकते हैं.

इसके लिए वो किसी को दो एकदम अलग तस्वीरें दिखाते हैं. एक तस्वीर दाहिनी आंख से तो दूसरी बांयीं आंख से. इसके बाद वो लोगों से कहते हैं कि दोनों आंखों से एक साथ दोनों तस्वीरें देखें. अब किसी का दिमाग़ दोनों तस्वीरों को एकबारगी जोड़कर तो नहीं देख पाएगा. इसीलिए पूरे सीन पर एक तस्वीर हावी हो जाती है.

आप लोगों की कल्पना में इस तरह हेर-फेर कर सकते हैं कि कोई ख़ास तस्वीर पहले दिखा सकते हैं. इससे, पहले दिखाई गई तस्वीर हावी हो जाती है आपके दिमाग़ पर.

फिर जब आपको दोनों में से किसी एक तस्वीर का तसव्वुर करने को कहा जाता है, तो, अक्सर पहली तस्वीर ही लोग याद करते हैं.

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फिलिप को अपनी बीमारी का एहसास एक कार्यक्रम सुनते हुए हुआ. उन्हें अंदाज़ा हुआ कि उन्होंने बहुत लोगों से अलग ज़िंदगी जी है. पहले तो उन्हें यक़ीन नहीं हुआ. तो उन्होंने अपनी बेटी से पूछा कि बताओ सेब का रंग कैसा होता है? बेटी ने फौरन कहा-हरा. फिलिप को तगड़ा झटका लगा.

इस झटके से उनकी ज़िंदगी के कई अनसुलझे पहलू एक झटके में सुलझ गए. फिलिप की याददाश्त हमेशा से कमज़ोर थी. उन्हें लोगों के नाम और चेहरे याद नहीं रहते थे. लेकिन, अब उन्हें समझ में आ रहा है कि इसकी वजह क्या थी.

दूसरे लोग किसी नाम को सुनकर दिमाग़ में उसकी तस्वीर बना लेते थे. वहीं फिलिप के लिए ये काम करना मुश्किल था क्योंकि वो दिमाग़ में किसी की कोई तस्वीर ही नहीं बना पाते थे.

अक्सर फिलिप को कार पार्किंग में अपनी कार खोजने में परेशानी होती थी. क्योंकि जहां भी वो गाड़ी खड़ी करते थे, उस जगह को भूल जाते थे. फिर घंटों गाड़ी को खोजते रहते थे. क्योंकि उस जगह की कोई तस्वीर ही फिलिप के ज़ेहन में नहीं होती थी. इससे निपटने के लिए उन्होंने कार पार्क करने के बाद उस ख़ास जगह की तस्वीर लेनी शुरू कर दी. वो आस-पास की दुकानों के नाम भी नोट कर लेते थे. ताकि बाद में कार खोजने में परेशानी न हो.

हमारे दिमाग़ का जो हिस्सा किसी चेहरे को या किसी जगह को याद रखता है, उसे 'विज़ुअल कोर्टेक्स' कहते हैं. इसका साइज़ ही हमारी कल्पनाशीलता की ताक़त तय करता है. अगर दिमाग़ का ये हिस्सा कम एक्टिव होता है तो हम ज़्यादा बेहतर तसव्वुर कर पाते हैं.

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जोएल पियर्सन और उनकी टीम ने दिमाग़ के इस हिस्से के काम करने के तरीक़े को अच्छे से समझा है. वो अब इसे थोड़ा सा स्टिमुलेशन देकर, किसी के कल्पना करने की ताक़त में तब्दीली भी ला सकते हैं.

अगर वो ऐसा करने में बार बार कामयाब होते हैं तो इससे 'एफैन्टासिया' के मरीज़ों की मदद हो सकेगी. इसमें वो फिक्र की आदत, किसी बुरी लत, या तनाव जैसी बीमारियों से लड़ने की नई उम्मीद भी देख रहे हैं. ये सभी परेशानियां, दिमाग़ में कुछ ख़ास तस्वीरों के बार-बार आने से बढ़ती जाती हैं. तो अगर, किसी के दिमाग़ पर असर डालकर, बुरी तस्वीरों का ख़याल ज़ेहन से निकाला जा सके. तो, बीमारी भी दूर हो जाएगी.

पियर्सन कहते हैं कि इसके उलट कुछ लोगों की तसव्वुर करने की कूवत इसी तकनीक से बढ़ाई भी जा सकती है. इससे लोगों की याददाश्त भी बेहतर हो सकती है. क्योंकि हर बात से एक तस्वीर को जोड़ने से हमारा दिमाग़ उन्हें आसानी से याद रखता है. अगर वो ज़्यादा से ज़्यादा तस्वीरों का ख़याल दिमाग़ में ला सकेगा तो उसकी याददाश्त भी बेहतर होगी. फिर उसे फैसले लेने में भी आसानी होगी. इससे मुक़दमों में गवाही देने के काम से लेकर पढ़ाई तक कई काम बेहतर ढंग से किए जा सकेंगे.

अब सवाल ये उठता है कि दिमाग़ में किसी बात से जुड़ी तस्वीर का ख़याल आना इतनी बड़ी बात है. तो, जो लोग 'एफैन्टासिया' के शिकार हैं, उनकी गुज़र कैसे होगी? जैसे फिलिप को ही लीजिए. क्या उनकी परेशानी और बढ़ जाने वाली है?

पियर्सन कहते हैं कि 'एफैन्टासिया' के मरीज़, बेहतर काम करते हैं. वो किसी बात को, किसी इंसान को या किसी जगह को तस्वीर से जोड़कर नहीं देखते. वो और तरीक़े अपनाते हैं. जैसे जगह की दूरी का अंदाज़ा लगाकर, किसी शहर के बारे में सोचते हैं. कहने का मतलब ये कि वो बिना तस्वीर गढ़े, दूसरे तरीक़ों की मदद से अपनी मुश्किलों का हल ढूंढते हैं.

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पियर्सन कहते हैं कि अगर आप किसी इंसान का या फिर किसी जगह का तसव्वुर कर लेते हैं तो उनकी मदद से काम कर लेंगे. अगर कोई ऐसा नहीं कर पाता तो वो दूसरे तरीक़ों से अपना काम चलाता है.

फिलिप इस बात पर रज़ामंद हैं. वो लोगों की आवाज़ की नक़ल कर लेते हैं. किसी भी तरह की आवाज़ निकाल लेते हैं. उन्हें लगता है कि क़ुदरत ने उनसे एक ख़ूबी छीनी तो दूसरी नेमत बख़्शी है.

'एफैन्टासिया' के कुछ और मरीज़ों से ऑनलाइन संपर्क साधने पर मिली जुली राय सामने आई. एक ने कहा कि इस बीमारी की वजह से वो आज में जीते हैं. क्योंकि कल की प्लानिंग ही नहीं कर सकते. कुछ और लोगों ने भी इस बात पर हामी भरी. एक ने कहा कि चूंकि वो किसी ख़ास पल को दोबारा नहीं जी सकता. इसलिए वो हर पल की अहमियत समझ कर उसे अच्छे से गुज़ारने की कोशिश करता है.

फिलिप भी ये बात मानते हैं. वो कहते हैं कि वो किसी मसले का फ़ौरी हल खोजने में यक़ीन रखते हैं. लंबी-चौड़ी प्लानिंग उनके बस की बात नहीं. क्योंकि ये काम तसव्वुर से होगा. ज़ेहन में बिना तस्वीरें गढ़े, वो ये काम कर नहीं सकते.

कुछ और लोगों को भी लगता है कि 'एफैन्टासिया' की वजह से उन्हें किसी बुरे पल को दोबारा जीने को मजबूर नहीं होना होता. वो आज में जीते हैं. कल जो हुआ उसे भूलना वैसे भी अच्छा ही होता है.

जैसे हम ये कल्पना नहीं कर पाते कि अगर हमारे ख़्याल में कोई तस्वीर नहीं आ पाती है तो हमारी ज़िंदगी कैसी होगी? वैसे ही 'एफैन्टासिया' के मरीज़ ये सोचते हैं कि अगर वो कल्पना करने लगे, तसव्वुर में तस्वीरें बनाने लगे. तो उनकी ज़िंदगी कैसी होगी?

एक महिला ने कहा कि चूंकि वो कोई तस्वीर नहीं सोच पाती, सो वो हर चीज़ को लिखकर रखती है. ज़िंदगी के अहम लम्हों का हिसाब-क़िताब भी वो नोट करके रखती है. वो कहती हैं कि शब्द बहुत ख़ूबसूरत होते हैं. कोई तस्वीर उनकी जगह नहीं ले सकती. सोचिए कुछ भावों को लफ़्ज़ों के बजाय तस्वीरों में बयां किया जाए तो कैसा होगा? किसी बात को बयां करने का अंदाज़ ही एकदम अलग होगा.

फिलिप अभी इन सब बातों को समझ रहे हैं. उन्हें पता ही नहीं था कि लोग किसी बात या इंसान का ख़याल आने पर फ़ौरन उसकी तस्वीर गढ़ लेते हैं. किसी ने उन्हें ये बात बतायी ही नहीं.

है न चौंकाने वाली बात. कुछ लोगों के ज़ेहन में कोई तस्वीर ही नहीं बनती.

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