माउंट एवरेस्ट पर होने वाली मौतों का रहस्य

  • 2 जून 2016

पहाड़ों की ख़ूबसूरती किसको नहीं लुभाती. ऊंची-ऊंची चोटियां. चारों तरफ़ बर्फ़ ही बर्फ़. यूं लगता है जैसे कोई संन्यासी धूनी रमाए बैठा है. पहाड़ों का ये शांत माहौल लोगों को अपनी तरफ़ खींचता है. इनकी ऊंची चोटियां चुनौती देती सी लगती हैं.

इन चोटियों को फ़तह करने का बहुत से लोगों को जुनून होता है. मगर, पहाड़ इन लोगों के जुनून का भी इम्तिहान लेते हैं. ग़लतियां होने पर सख़्त सज़ा देते हैं. कई बार तो ये मौत की सज़ा भी देते हैं.

अभी पिछले महीने की ही तो बात है. भारतीय पर्वतारोहियों की एक टीम एवरेस्ट को फ़तह करने के लिए गई थी. कुछ ने दुनिया की इस सबसे ऊंची चोटी पर तिरंगा फहराने का गौरव भी हासिल किया.

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मगर ये ख़ुशी ज़्यादा देर तक नहीं मनाई जा सकी. क्योंकि ख़तरनाक पहाड़ से उतरते वक़्त एक भारतीय सुभाष पाल की मौत हो गई. जबकि तीन लोग लापता हो गए. वैसे ये पहला वाक़्या नहीं था जब एवरेस्ट ने किसी जुनूनी को मौत की सज़ा दी थी.

एवरेस्ट की चढ़ाई करने वालों को मालूम है कि इसकी चढ़ाई के रास्ते में बिखरी पड़ी हैं लाशें. क्योंकि पहाड़, मौत की सज़ा देने के बाद भी इन लाशों को आसानी से नहीं छोड़ते. बरसों-बरस ये मुर्दा इंसान, बर्फ़ीली दरारों, चट्टानों के बीच पड़े रहते हैं.

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अभी कुछ वक़्त पहले ही हमने आपको एवरेस्ट पर पड़ी सबसे चर्चित लाश का क़िस्सा सुनाया था. ये भी एक भारतीय जवान ही था, जो एवरेस्ट फ़तह करने गया था, मगर अपनी जान गंवा बैठा था. ये लाश ग्रीन बूट्स के नाम से मशहूर है.

आंकड़े बताते हैं कि एवरेस्ट पर ऐसी दो सौ से ज़्यादा लाशें पड़ी हुई हैं. बरसों से इनका कोई नामलेवा नहीं. मगर इंसान का इस चोटी को जीतने का जुनून कम नहीं हुआ है. कई बार तो चढ़ाई करने वाले इन लाशों पर पैर रखकर ऊपर चढ़ने या नीचे उतरने का सफ़र तय करते हैं. इतनी ऊंचाई से कोई भी लाश उठाकर लाना मुमकिन नहीं होता. और बर्फ़ीले माहौल में रहने की वजह से ये जल्दी से ख़त्म भी नहीं होतीं.

पिछले ही महीने चार और पर्वतारोही, एवरेस्ट पर चढ़ने में जान गंवा बैठे. इनमें भारत के सुभाष पाल के अलावा, हॉलैंड के एरिक एरी आर्नॉल्ड और ऑस्ट्रेलिया की मारिया स्ट्राइडम शामिल हैं. इनके अलावा सुभाष पाल की टीम के कई साथी लापता हैं.

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असल में एवरेस्ट पर इंसान ने इतनी बार जीत हासिल की है कि इसे फिर से जीतने के जुनून में लोग इन लाशों को भूल जाते हैं. उन्हें याद नहीं रहता कि ये पहाड़ ग़लती करने पर मौत की सज़ा देता है.

बहुत से पर्वतारोही, यहां अक्सर आने वाले बर्फ़ीले तूफ़ान का शिकार होते हैं. कई लोग इतनी ऊंचाई पर जाकर सोचने-समझने की ताक़त गंवा बैठते हैं. और वहां पर ऐसी ग़लतियां करते हैं, जिनकी क़ीमत जान गंवाकर चुकानी पड़ती है.

सबसे ज़्यादा मौतें, एवरेस्ट की चोटी के क़रीब के हिस्से में होती हैं. ये इलाक़ा 'डेथ ज़ोन' के नाम से बदनाम है. लोग अक्सर चढ़ाई की तैयारी करते वक़्त ग़लतियां करके जान गंवाते हैं. वैसे एवरेस्ट पर मरने वालों की बड़ी तादाद जीत हासिल करके लौट रहे लोगों की भी है.

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कई बार तो मौत का आंकड़ा इतना बढ़ जाता है कि नेपाल की सरकार चढ़ाई के अभियानों पर रोक लगा देती है. मगर, जल्द ही लोग सब-कुछ भूल जाते हैं. और नए सिरे से इस ऊंची चोटी पर चढ़ने की तैयारी शुरू कर देते हैं.

इस काम में इतना पैसा मिलता है. इतनी शोहरत मिलती है कि लोग अपनी ज़िंदगी को भी दांव पर लगाने से नहीं हिचकते.

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