मोदी देंगे अफ़ग़ानिस्तान को 'तोहफ़ा'

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भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चार जून से अफ़ग़ानिस्तान दौरे पर हैं और वहां 30 करोड़ अमरीकी डॉलर (क़रीब 2,000 करोड़ रुपए) की लागत से बनने वाले सलमा बांध परियोजना का उद्घाटन करेंगे.

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भारत और अफ़गानिस्तान के बीच रिश्ते लंबे समय से काफ़ी क़रीबी रहे हैं और भारत में नरेंद्र मोदी की सरकार के बाद भी इसमें कोई बदलाव नहीं आया है लेकिन इस रिश्ते से पाकिस्तान बहुत सहज नहीं है.

अफ़ग़ानिस्तान में जारी विकास कार्यों में भारत की अहम भूमिका की वजह से वहां भारत की काफी लोकप्रियता है.

भारत ने जो निर्माण कार्य अफ़ग़ानिस्तान में किए हैं, उनमें अब सलमा बांध का नाम भी जुड़ने वाला है.

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इस बांध की मदद से बिजली का उत्पादन किया जाएगा साथ ही साथ ये सिंचाई में भी मदद करेगा.

जनवरी में नरेंद्र मोदी ने अफ़ग़ानिस्तान में संसद भवन का उद्घाटन किया था.

इससे पहले भारत ने फुल-ए-खुमरी पॉवर लाइन का निर्माण किया था जिसकी मदद से काबुल को बिजली की आपूर्ति की जाती है.

भारत ने दक्षिण पश्चिम अफ़ग़ानिस्तान के शहर ज़ेरांज और ईरानी सीमा के नज़दीक स्थित शहर डेलाराम को जोड़ने वाले हाइवे के पुनर्निमाण में भी मदद की थी.

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हाल ही में भारत ने ईरान के साथ चाबहार बंदरगाह के निर्माण को लेकर समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं.

इस बंदरगाह की मदद से अफ़ग़ानिस्तान का सामान सीधे भारत तक पहुंच पाएगा. अब तक भारतीय चीज़ें पाकिस्तान के ज़रिए अफ़ग़ानिस्तान तक पहुंचती हैं.

तालिबान के सत्ता से बाहर होने के बाद भारत ने अफ़ग़ानिस्तान के पुनर्निमाण के लिए दो अरब अमरीकी डॉलर की मदद देने का वचन दिया था.

यह दक्षिण एशिया के किसी भी देश की तरफ़ से सबसे बड़ी पेशकश थी.

भारत सालाना एक हज़ार अफ़ग़ानी छात्रों को वजीफ़ा मुहैया कराता है और भारत में पढ़ने का ख़र्च उठाता है.

विशेषज्ञ भारत की इन कोशिशों को अफ़ग़ानिस्तान में 'सॉफ्ट पॉवर' के रूप में दख़ल के तौर पर देखते हैं.

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हालांकि अफ़गानिस्तान और भारत के बीच सुरक्षा मामले को लेकर बहुत क़रीबी नहीं नज़र आती है. अफ़ग़ानिस्तान चाहता है कि भारत उसे वायु सेना से जुड़े महत्वपूर्ण उपकरण मुहैया कराए लेकिन भारत ने अब तक सिर्फ़ चार फ़ौजी हैलिकॉप्टर ही मुहैया कराए हैं.

भारत और अफ़ग़ानिस्तान के बीच संबंधों में भौगोलिक स्थिति की बहुत बड़ी भूमिका है.

अफ़ग़ानिस्तान की सीमा भारत से नहीं मिलती है, लेकिन पड़ोसी देश पाकिस्तान की सीमा से यह सटा हुआ है.

विशेषज्ञों का कहना है कि यह भारत और पाकिस्तान के लिए मज़बूती और कमज़ोरी दोनों है.

चूंकि पाकिस्तान अफ़ग़ानिस्तान का बिल्कुल नज़दीक का पड़ोसी देश है इसलिए उसे इस बात का भौगोलिक फ़ायदा तो मिला हुआ है, लेकिन अफ़ग़ानिस्तान में पाकिस्तान उतना लोकप्रिय नहीं है.

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दूसरी ओर भारत वहां ज़रूर काफी लोकप्रिय है लेकिन साझेदारी में पहले दर्जे की हैसियत नहीं रखता है.

हालिया बीबीजी-गैलप सर्वे में भारत, अफ़ग़ानिस्तान में 62 अंकों के साथ सबसे लोकप्रिय साझेदार है, जबकि पाकिस्तान का स्थान 3.7 फीसदी के साथ नीचे आता है.

पाकिस्तान का स्थान इस सर्वे में इस्लामिक स्टेट से भी नीचे है. इस्लामिक स्टेट की रेटिंग इस सर्वे में 5.8 दर्ज की गई है.

अफ़ग़ानिस्तान के साथ पाकिस्तान के रिश्ते बहुत हद तक पाकिस्तानी फ़ौज के हाथों से नियंत्रित होते हैं.

पाकिस्तानी फ़ौज परंपरागत रूप से अफ़ग़ानिस्तान में 'रणनीतिक' तौर पर भारत के ख़िलाफ़ काम करती रही है.

बड़े पैमाने पर यह माना जाता है कि पाकिस्तान इस रणनीति के तहत अफ़ग़ानिस्तान में इस्लामी चरमपंथी समूहों मसलन तालिबान को बढ़ावा देता है.

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हालांकि इस रणनीति ने अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान दोनों देशों को नुक़सान पहुंचाया है और क्षेत्र में इस्लामी अतिवाद को बढ़ावा दिया है.

इसने पाकिस्तान को अफ़ग़ानिस्तान में अलोकप्रिय बनाया है.

अब जब मोदी सलमा बांध का उद्घाटन करने जा रहे हैं तो पाक-अफ़ग़ान संबंध के आसार बेहतर नज़र नहीं आ रहे हैं.

पाकिस्तान में अमरीकी ड्रोन हमले में तालिबान नेता मुल्ला अख़्तर मंसूर की मौत ने अफ़ग़ानिस्तान शांति प्रक्रिया को ठंडे बस्ते में डाल दिया है.

इस शांति प्रक्रिया में अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान, अमरीका और चीन शामिल थे.

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