मोबाइल ऐप मिलाएगा आपके सच्चे दोस्त से!

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आजकल हर चीज़ के लिए, हर काम के लिए मोबाइल ऐप आ गए हैं. डेटिंग के लिए ऐप का इस्तेमाल भी ख़ूब हो रहा है. और अब तो तमाम डेटिंग ऐप्स पर दोस्त बनाने के विकल्प भी मुहैया कराए जा रहे हैं.

जैसे कि बंबल नाम के ऐप पर आजकल बेस्ट फ्रेंड फॉरेवर का विकल्प है. इसके ज़रिए आप प्लैटोनिक दोस्त तलाश सकते हैं. बंबल ने अपने ऐप में ये फ़ीचर इसी साल मार्च महीने में जोड़ा था. इसके ज़रिए प्लैटोनिक दोस्त तलाश रही महिलाओं की मदद करने की कोशिश की गई है.

सिर्फ़ बंबल ही क्यों, 'हे विना' नाम से तो एक ऐप ही महिलाओं को प्लैटोनिक दोस्त तलाशने के लिए लॉन्च किया गया. इसी तरह अप्रैल में बाज़ार में 'पटूक' नाम का ऐप आया. इसकी ख़ूबी ये है कि इसमें आप अपने दोस्त में जो ख़ूबियां तलाश रहे हैं, उनके लिए सामने वाले को नंबर दे सकते हैं. यहां तक कि मशहूर डेटिंग ऐप टिंडर पर भी दोस्त बनाने के लिए टिंडर सोशल नाम से विकल्प मुहैया कराया गया है.

पर, सवाल ये है कि क्या ये ऐप आपको सही दोस्त तलाशने में मदद कर पाएंगे. क्या तकनीक की मदद से हम दोस्ती की नई परिभाषा गढ़ सकेंगे?

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ये रिपोर्ट तैयार करने वाली बीबीसी संवाददाता टिफैनी वेन ने इन ऐप के ज़रिए दोस्त बनाने की कोशिश की. टिफैनी इन दिनों इसराइल की राजधानी तेल अवीव में रहती हैं. उन्होंने तीन दिनों में बीस ऐसी महिलाएं अपने मोबाइल ऐप पर तलाशीं, जिनसे वो दोस्ती कर सकती थीं. ये सभी सौ मील के दायरे में रहती थीं. हालांकि उनकी दोस्ती की ज़रूरत के पैमाने पर इनमें से एक भी खरी नहीं उतरती थी. फिर भी उन्होंने कुछ से जुड़ने में दिलचस्पी दिखाई. मगर, इनमें से एक ने भी उनको जवाब नहीं दिया. टिफैनी सोचने लगीं कि आख़िर कोई उनसे दोस्ती क्यों नहीं करना चाहता?

आख़िरकार, टिफैनी को 26 साल की एक महिला ने जवाब दिया. ये उसी यूनिवर्सिटी में पढ़ रही थी, जहां टिफैनी ने पढ़ाई की थी. अब दिक़्क़त ये थी कि बंबल की शर्त थी कि आप जिसमें दिलचस्पी ले रहे हैं उससे चौबीस घंटे के अंदर चैट शुरू कर दीजिए. वरना वो ग़ायब हो जाएगा.

टिफैनी को समझ ही नहीं आ रहा था कि वो इस ऐप साथी से कहां से बात शुरू करें. उन्होंने अपनी दोस्त डेब्रा से मदद मांगी. पूछा कि क्या मैं उसको ड्रिंक के लिए न्योता दूं. या फिर कोई कहानी गढ़ दूं? डेब्रा भी टिफैनी की कोई ख़ास मदद नहीं कर पाईं. उन्होंने कहा कि सिर्फ़ हाय कहकर बात शुरू करके देखो.

तमाम रिसर्च ये कहते हैं कि दोस्तों से अच्छे रिश्ते, आपकी ज़िंदगी को बेहतर बनाते हैं. ख़ास तौर से अमरीका और ब्रिटेन जैसे देशों में. यहां पर दोस्ती की बुनियाद पर आपकी ख़ुशी की भविष्यवाणी की जा सकती है. अमरीका की नॉर्दर्न एरिज़ोना यूनिवर्सिटी के मेलिक्श डेमिर ने इस बारे में क़िताब लिखी है. वो कहते हैं कि उम्र के हर दौर में अच्छी दोस्ती, दोस्ती से संतुष्टि, नज़दीकी और दोस्तों का सहयोग आपकी ख़ुशी महसूस करने का लेवल तय करता है.

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दोस्त, एक साथी की तरह आपकी तमाम तरीक़ों से मदद करते हैं. जैसे वो आपकी सोच को मज़बूत करते हैं. हमारे फ़ैसले लेने की आज़ादी का समर्थन करते हैं. हमें क़ाबिल महसूस करने में मददगार होते हैं. वो ये एहसास दिलाते हैं कि हम दूसरों की ज़िंदगी के लिए भी अहम हैं. कुल मिलाकर दोस्त हमारी तमाम मानसिक ज़रूरतों को पूरा करते हैं. उनकी मौजूदगी में हम उत्साह महसूस करते हैं. उनकी मदद से हमें ज़्यादा दर्द बर्दाश्त करने की ताक़त मिलती है.

वैसे तो दोस्तों की तादाद ज़ितनी ज़्यादा हो उतना बेहतर. मगर जानकार कहते हैं कि कुछ अच्छे, भरोसेमंद दोस्त होना ज़्यादा बेहतर है. बनिस्बत इस बात के कि आपके ढेर सारे दोस्त हों.

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिक रॉबिन डनबार कहते हैं कि हम एक ख़ास तादाद तक ही अच्छे दोस्त बना सकते हैं. क्योंकि बहुत सारे लोगों से दोस्ती हम निभा नहीं सकते. डनबार कहते हैं कि कोई भी इंसान ज़्यादा से ज़्यादा डेढ़ सौ दोस्त बना सकता है. ट्विटर पर भी हम सौ दो सौ लोगों से ही बात करते हैं.

अच्छी बात ये है कि ज़्यादातर लोग अपने दोस्तों की संख्या से संतुष्ट हैं. 2004 के गैलप पोल के मुताबिक़, हर अमरीकी के औसतन नौ क़रीबी दोस्त होते हैं. एक और रिसर्च बताता है कि इंटरनेट के बढ़ते इस्तेमाल के साथ ही दोस्तों की तादाद भी बढ़ती जा रही है.

हालांकि ये बात सब पर लागू नहीं होती. ब्रिटेन में हुए एक सर्वे के मुताबिक़ हर दसवां आदमी इस बात से दुखी है कि उसका कोई क़रीबी दोस्त नहीं है.

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एक मसला और भी है. उम्र बढ़ने के साथ-साथ दोस्ती निभाने में दिक़्क़तें पेश आती हैं. जब तक हम वयस्क होते हैं, तब तक हमारे दोस्तों की तादाद बढ़ती रहती है. मगर उसके बाद दोस्त घटने लगते हैं. इसकी वजह साफ़ है. शादी, घर-गृहस्थी का बोझ, बच्चों की परवरिश का ज़िम्मा, सब मिलाकर इंसान अपनी निजी ज़िंदगी में इतना मसरूफ़ हो जाता है कि उसके पास दोस्तों को देने के लिए वक़्त ही नहीं होता. 2015 में हुए एक सर्वे के मुताबिक़, शादी की वजह से औसतन हर इंसान दो दोस्त खो बैठता है.

आज ग्लोबलाइज़ेशन के दौर में लोग अपने शहरों से निकलकर दूसरे शहर में, दूसरे देशों में जाकर बस रहे हैं. ऐसे में हम अपने दोस्तों से दूर हो जाते हैं. तकनीक की मदद से हम पुराने दोस्तों से तो जुड़े रहते हैं. मगर नए माहौल में दोस्तों की कमी खलती है.

सवाल ये भी है कि क्या हमारे दोस्त बनाने का तरीक़ा बदल गया है? ब्रिटेन में विक्टोरिया युग में ऊंचे तबक़े के लोग प्राइवेट स्कूलों, यूनिवर्सिटी और अपनी पेशेवर ज़िंदगी में नए दोस्त बनाते थे. कुछ लोग सियासी दुनिया में दोस्ती गांठते थे. अपने दर्जे से बाहर के लोगों से सिर्फ़ परिचय होता था, दोस्ती नहीं. नज़दीकी दोस्त सिर्फ़ दस-बारह हुआ करते थे.

पचास के दशक में हुए एक रिसर्च के मुताबिक़, साथ रहने से, बार-बार मिलते रहने से दोस्ती मज़बूत होती है. इसीलिए कॉलेज के दिनों में पक्की दोस्तियां होती हैं.

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अमरीका के मेसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी) में इस बारे में रिसर्च हुई थी. इसमें पता चला कि हॉस्टल में पास के कमरे में रहने वालों से ज़्यादा दोस्ती हो जाती है. पास वाले कमरे के लोगों से दोस्ती होने का चांस 41 फ़ीसद होता है. तो दो कमरे छोड़कर रहने वालों से दोस्ती की संभावना महज़ 22 फ़ीसद रह जाती है. वहीं तीन कमरे छोड़कर रहने वालों से दोस्ती की उम्मीद महज़ 16 फ़ीसद रह जाती है.

आज के दिनों में तमाम सोशल मीडिया के ज़रिए भी दोस्त बन रहे हैं. जैसे फ़ेसबुक से. इनसे भी हमारी ज़िंदगी में ख़ुशी आ रही है. लेकिन आज भी लोग असल ज़िंदगी की दोस्ती को ज़्यादा अहमियत देते हैं. हालांकि आपकी असल ज़िंदगी के दोस्त, ऑनलाइन दोस्तों से कम होते हैं. मगर उनसे ही आपकी ज़िंदगी ज़्यादा बेहतर होती है.

हालांकि फ़ेसबुक और दूसरे सोशल मीडिया की मदद से हम बहुत से लोगों के संपर्क में रहते हैं. आमतौर पर फ़ेसबुक फ्रैंड, असल ज़िंदगी के सच्चे दोस्तों में नहीं तब्दील हो पाते.

रॉबिन डनबार के किए एक रिसर्च के मुताबिक़, फ़ेसबुक दोस्तों में सिर्फ़ एक चौथाई ही ऐसे होते हैं जिन्हें लोग क़ाबिले-ऐतबार दोस्त मानते हैं. जबकि औसतन 14 फ़ेसबुक दोस्तों को लोग क़रीबी मानते हैं.

यही वजह है कि आज बंबल जैसे ऐप, आपकी दोस्त तलाशने में मदद करना चाहते हैं. ऐप के ज़रिए किसी को मैसेज करना अजीब लगता है. मगर, ये तो दोस्त तलाशने का एक ज़रिया भर है. कुछ मैसेज के बाद, आप नए दोस्त को मिलने, साथ बैठकर गपशप करने का ऑफ़र ज़रूर करेंगे. फिर ऐप की ज़रूरत नहीं रहेगी.

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जैसे टिफैनी की बंबल पर मिली इकलौती दोस्त ताल ने उन्हें ख़ुद ही मिलने का न्योता दे दिया. कुछ दिनों बाद वो मिले. एक दूसरे से जमकर बातें कीं. ताल, अभी सोशल वर्क पर अपनी पढ़ाई पूरी करने में लगी हैं. उनके कई दोस्त शहर से बाहर चले गए हैं. इसीलिए वो अकेलापन महसूस कर रही थीं. इसीलिए वो बंबल के ज़रिए बीएफ़फ तलाश रही थीं.

वैसे ऐप के ज़रिए बने दोस्तों से मिलने में ख़तरे भी हैं. आपको सामने वाले के बारे में पता नहीं होता कि वो झूठ बोल रहा है या सच. आजकल तो बहुत से ऐसे मामले सामने आ रहे हैं जिसमें सोशल मीडिया में झूठ बोलकर दोस्ती गांठी जा रही है. वैसे नई नस्ल तो ऑनलाइन दोस्ती को असल ज़िंदगी की दोस्ती में बदलने की उस्ताद हो चुकी है.

आज ब्रिटेन में औसतन एक तिहाई किशोर, ऑनलाइन दोस्तों से असल ज़िंदगी में मिलते हैं. उन्हें अपना दोस्त बनाते हैं.

इसीलिए बंबल जैसे सोशल ऐप का चलन बढ़ रहा है. वैसे बहुत से लोग ऐसे भी होते हैं, जो ऑनलाइन दोस्ती पर कतई ऐतबार नहीं करते. हां, नए शहर में जाने के बाद शायद वो नए लोगों से बात करना, मिलना पसंद करें. इस काम में बंबल जैसे ऐप मददगार होंगे.

(अंग्रेजी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ्यूचर पर उपलब्ध है.)

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