शैम्पेन है 'फ्रेंड ऑफ़ गुड टाइम्स'

  • 6 जून 2016
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पूरी दुनिया इस वक़्त बेहद ख़ुश है. हमारी इस बात पर हैरान रह गए न आप. सोचा होगा कि आख़िर हमें कैसे मालूम कि दुनिया इस वक़्त बेहद ख़ुश है.

ये सवाल भी ज़ेहन में आया होगा कि दुनिया कितनी ख़ुश है, इस बात का पता कैसे लगाया जा सकता है? इस सवाल का जवाब बेहद दिलचस्प है.

दुनिया की ख़ुशी का पैमाना है शैम्पेन की सेल. दुनिया भर में कितनी शैम्पेन बिकी, इससे पता चल जाता है कि लोग कितने ख़ुश हैं.

जैसा कि चचा ग़ालिब ने कहा था, 'इक ब्रहमण ने कहा है कि ये साल अच्छा है', वैसी ही बात आज शैम्पेन के कारोबार से जुड़े लोग कह रहे हैं.

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और उम्मीद ये है कि ये अच्छा वक़्त अभी रहने वाला है. इस साल पूरी दुनिया में क़रीब साढ़े पांच अरब डॉलर की शैम्पेन बिकी. शैम्पेन बनाने वाले ये मानते हैं कि इसकी सेल और बढ़ने वाली है.

बरसों से शैम्पेन की सेल को ही दुनिया की ख़ुशी का पैमाना माना जाता रहा है. जब लोग इसे ज़्यादा ख़रीदते हैं, तो, ये माना जाता है कि लोगों के पास पैसे हैं. इसीलिए वो इसे महंगे शौक़ पर ख़र्च करने को तैयार हैं.

इससे ये भी ज़ाहिर होता है कि वो शेयर बाज़ार या रियल एस्टेट में निवेश करने को राज़ी हैं.

इससे पहले शैम्पेन की बिक्री के लिहाज़ से साल 2007 बहुत अच्छा था. यानी 2008 की मंदी से पहले का साल. उस साल पांच अरब डॉलर से कुछ ज़्यादा शैम्पेन बिकी थी.

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उसके बाद मंदी आ गई. उस दौर में यूं लगता था कि किसी का दिल शैम्पेन की बोतल खोलने को नहीं होता था.

शैम्पेन की बिक्री और फिर बार में इसका बिल, दोनों अक्सर सुर्ख़ियां बटोरते हैं. इससे दुनिया की अर्थव्यवस्था का हाल पता चलता है.

आठ साल की मंदी के बाद एक बार फिर शैम्पेन के ख़रीददार बढ़ रहे हैं. अब इसका अगला क़दम होगा ये कि शैम्पेन के दाम बढ़ेंगे.

जैसे-जैसे मध्यम दर्जे के लोग शैम्पेन का शौक़ पालेंगे, बिक्री और दाम बढ़ने तय ही हैं.

फ्रांस के पूर्व राजनयिक विंसेंट पेरिन कहते हैं कि जीडीपी और लोगों की आमदनी का शैम्पेन की बिक्री से गहरा ताल्लुक़ रहा है. विंसेंट इन दिनों शैम्पेन बनाने वालों के संगठन के प्रबंध निदेशक हैं.

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हाल में इटली और स्पेन की अर्थव्यवस्था में तेज़ी से सुधार दिखा है. इसी तरह उत्तरी यूरोपीय देशों के बेहतर होते हालात से शैम्पेन की बिक्री यूरोप में भी बढ़ रही है.

इसी तरह एशियाई देशों में भी शैम्पेन की खपत बढ़ रही है. ताइवान में 2014 के मुक़ाबले 2015 में शैम्पेन की सेल 29 फ़ीसद तक बढ़ गई.

इसी तरह उत्तर कोरिया में शैम्पेन की बिक्री में 31 फ़ीसद का इज़ाफ़ा देखा गया. सस्ते यूरो और बेहतर डिस्ट्रीब्यूशन की वजह से इसकी बिक्री बढ़ाने में मदद मिल रही है.

वैसे शराब का सबसे बड़ा बाज़ार चीन, शैम्पेन में ज़्यादा दिलचस्पी नहीं दिखा रहा है. वहां के लोगों की पहली पसंद अभी भी वाइन ही है.

वैसे शैम्पेन का कारोबार असीमित रूप से नहीं बढ़ सकता. इसके उत्पादन पर एक पाबंदी लागू होती है. जिसके मुताबिक़ हर साल इसकी पैंतीस करोड़ बोतलों का ही उत्पादन किया जा सकता है.

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वैसे पिछले कुछ सालों में शैम्पेन का उत्पादन 30 से 31.5 करोड़ बोतलों के बीच रहा है.

हालांकि उत्पादन बढ़ाने की कोशिशें की जा रही हैं. फ्रांस में एक ख़ास इलाक़े में शैम्पेन बनाई जाती है. इस इलाक़े को 1927 में बने एक क़ानून के ज़रिए तय किया जाता है.

लेकिन अब इसमें बदलाव करके चालीस नए गांव शैम्पेन का उत्पादन करने वाले इलाक़े में जोड़े जा रहे हैं. ऐसा 2018 से 2020 के बीच होगा.

जानकार कहते हैं कि इससे शैम्पेन का उत्पादन बढ़ेगा. इससे अंगूर के बाग़ीचों वाली ज़मीन की क़ीमतें भी बढ़ेंगी.

शैम्पेन परोसने वाले बार के टेंडर्स को भी बहुत उम्मीदें हैं. उन्हें लगता है कि शैम्पेन की बिक्री में इज़ाफ़ा होना तय है. लोग इसे ख़ूब पसंद कर रहे हैं. इसे पीने वालों का औसत धीरे-धीरे बढ़ रहा है.

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शैम्पेन परोसने वाले लंदन के प्रमुख बार चेन, 'शैम्पेन ऐट सियर्सीज़' के प्रमुख जोएल क्लास्चर कहते हैं कि शैम्पेन की बिक्री अक्सर अर्थव्यवस्था के मूड के हिसाब से चलती है.

बर्लिन में शैम्पेन के कॉकटेल बार रीनगोल्ड के मालिक डेविड वीडमैन कहते हैं कि शैम्पेन के शौक़ीन मंदी के बाद ज़्यादा समझदार हो गए हैं. वो आजकल शैम्पेन के बारे में ब्लॉग पढ़ते हैं.

शैम्पेन फ़ोरम पर इसके बारे में चर्चा करते हैं. फिर कहीं बार में आकर शैम्पेन ऑर्डर करते हैं. वो कुछ ख़ास, अलग चीज़ चाहते हैं. जो उन्हें कहीं और नहीं मिलती. डेविड कहते हैं कि इसी वजह से आज वो अपने बार में शैम्पेन ज़्यादा परोसते हैं.

ये तय है कि आज लोग ज़्यादा शैम्पेन पीने लगे हैं. और शैम्पेन के कारोबारी यही तो चाहते हैं. सब लोग शैम्पेन पिएं. सब ख़ुश रहें. पैसे लुटाएं और दुनिया का कारोबार चलता रहे.

(अंग्रेजी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी कैपिटल पर उपलब्ध है.)

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