'एनएसजी से भारत का रुतबा बढ़ेगा, मिलेगा कुछ नहीं'

  • 8 जून 2016
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नरेंद्र मोदी स्विट्ज़रलैंड के बाद अमरीका तो गए हैं, लेकिन मुझे नहीं लगता कि अमरीका में नरेंद्र मोदी का मुख्य एजेंडा सिर्फ न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप (एनएसजी) की सदस्यता हासिल करने का प्रयास करना ही है.

नरेंद्र मोदी कैसे ये सोच सकते हैं कि इस बार वो भारत को एनएसजी का मेंबर बनवाने में क़ामयाब होंगे. चीन के अलावा परमाणु अप्रसार संधि पर दस्तख़त करनेवाले ऐसे कई देश हैं जैसे ऑस्ट्रिया, न्यूज़ीलैंड, आयरलैंड और दूसरे कई अन्य देश जो चाहते हैं कि भारत और कोशिश करे तभी उसे एनएसजी का सदस्य बनाया जाए.

दूसरी अहम बात ये है कि इस वक्त भारत अपने राजनयिकों को क्यों इधर-उधर भेज रहा है, ये कोशिश करने के लिए ताकि भारत तुरंत एनएसजी का मेंबर बन जाए. मेरे ख़्याल से इसकी वजह ये है कि बराक ओबामा अमरीका के राष्ट्रपति हैं लेकिन कुछ महीनों बाद वो राष्ट्रपति नहीं रहेंगे.

अमरीका ने भारत को वादा किया था कि वो भारत को सभी परमाणु निर्यात व्यवस्था का सदस्य बना देगा, उसमें भारत की मदद करेगा. जबकि ये बात पूरी तरह से अमरीका के हाथ में नहीं है.

पिछली बार जब जॉर्ज बुश ने चीन से फ़ोन पर बात की थी और कहा था कि भारत को अपवाद के रूप में एनएसजी की सदस्यता दे दी जानी चाहिए. लेकिन उस समय यह चर्चा चल रही थी कि भारत अप्रसार की शर्तों पर सहमत होगा या नहीं?

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लेकिन भारत ने अभी तक एनपीटी पर हस्ताक्षर नहीं किया है. अब उनके सामने सवाल ये उठता है कि नियम बनाने वाले ग्रुप यानी एनएसजी की सदस्यता भारत को इस वक्त क्यों दी जाए. भारत को इसके लिए अभी और प्रयास करने की ज़रूरत होगी.

जहां तक चीन के विरोध का सवाल है तो चीन सैद्धांतिक रूप से भारत को एनएसजी का सदस्य बनाए जाने का विरोध नहीं करता. वो सिर्फ़ ये कहता है कि किसी भी नए सदस्य को ग्रुप में शामिल करने के लिए एक सर्वमान्य नियम बने. चीन ये कह रहा है कि पाकिस्तान को भी एनएसजी का मेंबर बनाया जाना चाहिए.

दिलचस्प बात ये है कि जब भारत ने एनएसजी की सदस्यता के लिए आवेदन किया है तो उसी समय पाकिस्तान ने भी यही क़दम उठाया है. ऐसे में अमरीका के सामने दुविधा होगी कि वो भारत का समर्थन और पाकिस्तान का विरोध कैसे करे. अगर वो ऐसा करता है तो चीन सवाल उठा सकता है.

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दरअसल पाकिस्तान ये जानता है कि उसका आवेदन स्वीकार नहीं होगा. लेकिन उससे भी बड़ा सवाल ये है कि ये दोनों देश आख़िर इस वक़्त न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप के मेंबर क्यों बनना चाहते हैं. कोई ऐसा बड़ा कारण नज़र नहीं आता. भारत को अपने परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के लिए यूरेनियम हासिल करने की सुविधा मिली हुई है.

भारत दरअसल एनएसजी की सदस्यता सिर्फ़ इसलिए चाहता है ताकि वो अन्य सदस्य देशों के साथ मिलकर परमाणु मसलों पर नियम बना सके. तो ये एक स्टेटस और प्रतिष्ठा की बात है ना कि इसकी कोई ज़रूरत है क्योंकि भारत को साल 2008 में ही परमाणु पदार्थों के आयात के लिए सहूलियत मिली हुई है.

अगर भारत को एनएसजी की सदस्यता मिल जाती है तो सबसे बड़ा फ़ायदा उसे ये होगा कि उसका रूतबा बढ़ जाएगा. ये न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप वर्ष 1974 में भारत के परमाणु परीक्षण के बाद ही साल 1975 में बना था. यानी जिस क्लब की शुरुआत भारत का विरोध करने के लिए हुई थी, अगर भारत उसका मेंबर बन जाता है तो ये उसके लिए एक बड़ी उपलब्धि होगी.

साथ ही भारत ये चाहता है कि उसे एक परमाणु हथियार संपन्न देश माना जाए. सिर्फ़ परमाणु अप्रसार संधि ये कहती है कौन देश परमाणु हथियार संपन्न है और कौन नहीं.

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भारत ने एनपीटी पर दस्तख़त नहीं किए हैं और वो उसके तहत ग़ैर परमाणु हथियार संपन्न देश की श्रेणी में आता है. ऐसे में अगर भारत को एनपीटी पर दस्तख़त करना हो तो उसे एक ग़ैर परमाणु हथियार संपन्न देश के रूप में हस्ताक्षर करना होगा जो कि उसे मंज़ूर नहीं है.

ऐसे में सवाल उठता है कि एनपीटी क्या भारत को परमाणु हथियार संपन्न देश का दर्जा देगी. मेरे ख़्याल से ऐसा नहीं होगा क्योंकि तब एनपीटी पर हस्ताक्षर करनेवाले सभी देश इसका विरोध कर सकते हैं.

ऐसे में अगर भारत एनएसजी का सदस्य बनता है तो फ़ायदा सिर्फ़ इतना है कि वैश्विक स्तर पर उसकी प्रतिष्ठा बढ़ेगी और वो कह सकेगा कि हम विश्व शक्ति हैं.

स्विट्ज़रलैंड ने जो सैद्धांतिक समर्थन दिया है, उसके पीछे उसकी मंशा ये है कि वो सुरक्षा परिषद में तुरंत अस्थाई सदस्यता हासिल करना चाहता है और भारत भी ऐसा ही चाहता है. इसीलिए दोनों एक-दूसरे का समर्थन कर रहे हैं. लेकिन बाकी देशों के साथ तो ऐसी बात नहीं है.

इसीलिए मुझे लगता है भारत को एनएसजी की सदस्यता मिलने पर ऐसा नहीं होनेवाला है कि भारत को कोई बड़ी डील मिल जाएगी या फिर कोई बाहर लाइन लगाकर खड़ा है कि हमें परमाणु हथियार और परमाणु तकनीक दे दो. अगर ऐसा होता है तो इससे भारत की केवल प्रतिष्ठा बढ़ेगी और कोई फ़ायदा नहीं होगा.

(बीबीसी संवाददाता अमरेश द्विवेदी से बातचीत पर आधारित)

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