फ़ुटबॉल के दीवानों के बीच क्रिकेट

  • 10 जून 2016
जर्मनी में क्रिकेट इमेज कॉपीरइट AFP

देर शाम की धूप के बीच इंतज़ार करता तेज़ गेंदबाज़, एकदम स्थिर, इरादा रूपरेखा बनाने की. अचानक थोड़ी दूर की तेज़ दौड़, कलाई घुमाते हुए गेंद को कड़क और तेज़ी से डालते, हरे के बीच गहरा लाल रंग का धब्बा.

यॉर्कशायर के किसी सुगंधित गर्मी की शाम में ऐसा दृष्य तो आप उम्मीद कर सकते हैं. या कोलकाता की नम गर्मी में फ्लडलाइट के नीचे मैदान का ये दृष्य हो सकता है.

लेकिन ये जर्मनी है, फुटबॉल का दीवाना, जर्मनी. जहां ज्यादातर लोगों ने कभी क्रिकेट के बारे में सुना तक नहीं है, और जो जानते भी हैं वो उसे महज़ मनोरंजन के लिए खेला जाने वाला एक अनोखा खेल मानते हैं.

जर्मनी की अपनी एक राष्ट्रीय टीम भी है, लेकिन यह वास्तव में अपनी शानदार सफलता के लिए नहीं जाना जाता है.

इसके बावजूद, धूलभरी बंजर ज़मीन पर, त्याग दिए गए खेल के मैदानों या उधार मांगे हुए फुटबॉल मैदानों पर, बैट से टकराते चमड़े की आवाज़ गूंजती है.

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पिछले साल जर्मनी में शरण लेने वाले हज़ारों पाकिस्तानी और अफ़ग़ान युवक इस खेल और उसके उत्साह को अपने साथ यहां लाए हैं.

जर्मन चांस्लर एंगेला मर्केल ने कहा था कि शरणार्थी संकट उनके देश को बदल देगा लेकिन उनके दिमाग में शायद ही ये बात आई होगी.

2012 में 1500 खिलाड़ी और जर्मन क्रिकेट फेडरेशन में दर्ज 70 टीमें थीं. आज 220 टीमों के लिए पांच हज़ार क्रिकेटर खेलते हैं.

फेडरेशन के मैनेजर ब्रायन मैंटल के मुताबिक़ ये पागलपन बढ़ रहा है. हर रोज़ उनके पास शरणार्थियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं से पूछताछ की जाती है जो नए टीमें बनाने के लिए बेहद उत्सुक हैं.

उनके मुताबिक़ जर्मनी प्रवासी संकट से अभिभूत हो गया है.

"वो शरणार्थियों को जर्मन की शिक्षा नहीं दे सकते, उन्हें स्कूल की सुविधा नहीं दे सकते. इसलिए ये लोग कुछ नहीं करते और अपने घर में बैठे रहते हैं."

नए क्लबों में से एक पूर्वी शहर बाओटज़ेन में है.

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क्लब के संस्थापक और कोच अहमद इर्शाद कहते हैं, "उन्होंने कहा ये जर्मनी है, कोई यहां क्रिकेट नहीं खेलता."

"ये वास्तव में अजीब था और वाक़ई उन लोगों के लिए नई चीज़ थी. मैंने अपना सर्वश्रेष्ठ दिया, मैंने उन्हें समझाने की कोशिश की और दोबारा कोशिश की और फिर मैं उन्हें समझाने में कामयाब हो गया.

अभी के लिए, बाओटज़ेन फुटबॉल क्लब ने उन्हें प्रैक्टिस के लिेए मैदान दी है.

गोल पोस्ट के पास बैठे, जर्मन छात्रों को एक ग्रुप आश्चर्यचकित होकर एक युवा पाकिस्तानी की बातें सुन रहे हैं जो उन्हें खेल के नियमों के बारे में समझा रहा है.

जब मैंने वहां बैठी एक लड़की से पूछा कि क्या वो इसे समझ रही हैं तो वो हंसकर अपना सिर हिला देती हैं.

"जर्मनी में पहले ऐसा कुछ नहीं था. लेकिन हम इस खेल और दूसरी संस्कृतियों के बारे में कुछ सीख सकते हैं. हम उसे अपनी संस्कृति के साथ जोड़ सकते हैं और सभी, सब लोगों से सीखते हैं."

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गौरतलब है कि ये क्लब बाओटज़ेन में फल-फूल रहा है. साल के शुरुआत में ये शहर कुछ वक्त के लिए कुख्यात हो गया था जब एक शरणार्थी ठिकाने को जानबूझकर आगजनी के हवाले कर दिया गया था. कुछ स्थानीय लोग इसे जलते देख चिल्लाते और तालियां बताते रहे.

आज यहां दो हज़ार शरणार्थी रहते हैं.

ज्यादातर क्रिकेट टीमों के दफ्तर शहर के बाहरी इलाके़ के एक पुराने होटल में है.

जब मैं इन क्रिकेटरों से मिलता हूं तो वो जश्न के मूड में दिखते हैं. कम चीज़ों से सुसज्जित बेडरूम में खिलाड़ियों की भीड़ देखी जा सकती है और साथ ही देखा जा सकता है कमरे के एक मेज़ पर गर्व के साथ रखा एक गोल्डन ट्रॉफी.

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उसके बग़ल में एक स्थानीय अख़बार खुला पड़ा है, जिसमें टीम के बारे में एक रिपोर्ट छपी है उनके हाल के स्थानीय लीग में मिली जीत के बारे में.

उनमें से एक खिलाड़ी सनी कहते हैं, "अगर मैं जर्मनी के लिए कुछ कर सकता हूं तो मैं उनके लिए क्रिकेट खेलूंगा और मैं उन्हें हमारे रगों में दौड़ते इस खेल को दिखाऊंगा. फुटबॉल में जर्मनी सर्वश्रेष्ठ हो गया है और क्रिकेट में भी ये सर्वश्रेष्ठ होगा."

सनी कहते हैं, "एकता पैदा करने का सबसे अच्छा तरीक़ा खेल है. हमारे यहां मुस्लिम, ईसाई खिलाड़ी हैं और मैं एक सिख परिवार से ताल्लुक़ रखता हूं. जब हम साथ मिलकर खेलते हैं तो हम सबकुछ भूल जाते हैं."

हर ट्रेनिंग सेशन से पहले सनी और दूसरे साथी खिलाड़ी गेंदबाज़ों को फिसलकर गिरने से बचाने के लिए हरी चटाई बिछाते हैं

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वो दान के क्रिकेट किट और अस्थायी उपकरणों से काम चलाते हैं. कई नए टीमों को यूके क्रिकेटिंग चैरिटी, द लॉर्ड्स टैवनर्स से दान भी मिले हैं. लेकिन मांगों को पूरा करने के लिए ये पर्याप्त नहीं है.

मैच शुरू होता है. बल्लेबाज़ आगे बढ़ता है और बॉल आंखों से ओझल हो जाती है.

कोच अहमद बॉल के गायब होने की दिशा में देखते हुए आहें भरते हैं और फिर कहते हैं, "हमें नेट्स की ज़रूरत है."

"हमें बार-बार बॉल बदलने पड़ते हैं. हमारे पास पर्याप्त उपकरण नहीं हैं लेकिन लड़कों के पास हुनर है, और वो खेलना चाहते हैं."

उनके बल्ले भले ही टूटे हों और विकेट बेकार. लेकिन अहमद हंसते हैं. कम से कम ये लोग क्रिकेट तो खेल रहे हैं.

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