पाकिस्तान में हत्या 'प्राइवेट मैटर' है

पाकिस्तान में हिंसा के ख़िलाफ़ प्रदर्शन इमेज कॉपीरइट AFP

पाकिस्तान में अगर कोई जुर्म निहायत ही आसान है तो वह है किसी का 'क़त्ल' करना, क्योंकि पाकिस्तान में क़त्ल करना एक प्राइवेट (निजी) मामला है, पब्लिक नहीं.

पाकिस्तान में कुछ बदलाव के बाद चरमपंथियों के हाथों होने वाले क़त्ल को पब्लिक मर्डर की संज्ञा दी गई है, लेकिन वहाँ अभी भी परिवार में होने वाली हत्याएं या फिर आम लोगों की हत्या को निजी मामला ही माना जाता है.

इमेज कॉपीरइट AP

पाकिस्तान में कसास और दीयत कानून का हवाला देकर 'ऑनर किलिंग' से लेकर 'हत्या' तक के आरोपी बहुत आसानी से बरी हो जाते हैं, क्योंकि क़त्ल करने वाला अक्सर परिवार का ही कोई सदस्य या क़रीबी रिश्तेदार या जानकार होता है.

आपसी रंजिश और इज़्ज़त के मामले परिवार एक सदस्य को खो चुका होता है और दूसरे को खोना नहीं चाहता, इसलिए वो हत्या करने वाले को माफ़ कर देता है. इस तरह से हत्या जैसे बड़े अपराध को पारिवारिक मामला बना कर रफ़ा दफ़ा कर दिया जाता है.

इमेज कॉपीरइट

कसास और दीयत कानून को समाज में कबाइली समाज से लाया गया है. इस कानून के तहत इस्लाम में और कुरान-ए-मज़ीद में इस कानून के तहत एक रूप-रेखा तय कर दी है. इस गाइड लाइन को ऐसे तोड़ा-मरोड़ा गया है कि यही कानून बन गया.

जन-जीवन की तरक्की के साथ कानून में भी बदलाव और तरक्की ज़रूरी है. हम 20 वीं सदी में जी रहे हैं, तो कानून भी आज के हिसाब से होने चाहिए.

हम अगर 14वीं शताब्दी में जी नहीं सकते, तो हमारा कानून क्यों उस समय का हो?

इमेज कॉपीरइट AFP

अगर कानून नहीं बदला गया तो पाकिस्तान में जिस तरह से हत्या एक निजी मामला माना जा रहा है और हत्या की दर 100 से 200 फ़ीसदी तक बढ़ गए हैं, जबकि क़त्ल के मामले में महज़ पाँच फ़ीसदी लोगों को दोषी पाया जाता है.

पाकिस्तान में कानून को इस्लाम से जोड़ दिया जाता है और ऐसे में किसी भी कानून में बदलाव आसान नहीं रह जाता है.

कसास और दीयत कानून चूंकि संसद में बनाया गया कानून है, इसलिए इसे कुरान और सुन्नत की रोशनी में भी रखिए. इसे अरब कबाइली और संस्कृति से दूर रखें. हत्या कभी भी प्राइवेट मैटर नहीं है, हमें यह बात समझनी होगी.

आज परिवार सिकुड़ रहे हैं. अगर बदला लेने के लिए कराची में किसी की हत्या हो रही है और मारे गए व्यक्ति का कोई रिश्तेदार कराची में नहीं है, तो वह कभी भी निजी मामला नहीं हो सकता है.

(मिडलइसेक्स यूनिवर्सिटी के इस्लामिक कॉलेज में लॉ के प्रोफ़ेसर डॉक्टर ताहिर वास्ती से बीबीसी उर्दू की बातचीत पर आधारित)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार