दुख के साये में ढकेल रहा है सोशल मीडिया!

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क्या आप क्लिक करने के लिए बाध्य हो जाते हैं, आप अजनबियों की छुट्टि मनाते तस्वीरों से वाक़िफ़ हैं?

क्या आप अपने दिन की तुलना इस बात से करते हैं कि आपको कितने लाइक्स मिले, या लगातार नोटिफ़िकेशन की काल्पनिक घंटी आपको सुनाई देती है?

आप वाक़ई में अकेले नहीं हैं. हम अमूमन पूरे दिन में 150 बार अपने फ़ोन को चेक करते हैं, और ऑनलाइन बिताए हुए कुल समय का क़रीब 30 फ़ीसदी हिस्सा आप सोशल मीडिया को देते हैं.

पर क्या सोशल मीडिया का अत्यधिक इस्तेमाल एक बुरी आदत से कहीं ज़्यादा है- क्या ये असल में हमारे मानसिक स्वास्थ्य को बिगाड़ रहा है?

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पिट्सबर्ग विश्वविद्यालय के एक नए अध्ययन से इस बात के पुख़्ता सबूत मिले हैं कि युवा जितनी ज़्यादा सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हैं उतनी ही ज़्यादा उनके हताशा के अंधेरे में घिरने की संभावना है.

19 से 32 साल की आयु के एक हज़ार सात सौ 87 अमरीकियों पर किए गए अध्ययन से पता चला कि हर एक व्यक्ति ने प्रतिदिन 61 मिनट सोशल मीडिया पर बिताए और विभिन्न सोशल मीडिया अकाउंट्स को हर हफ़्ते 30 बार खंगाले.

जिन लोगों ने ज़्यादा बार सोशल मीडिया को चेक किया वो 2.7 फीसदी अधिक बार हताशा के शिकार हुए जबकि जिन प्रतिभागियों ने सबसे अधिक समय ऑनलाइन बिताए वो 1.7 बार अधिक डिप्रेशन के ख़तरे में रहे.

मनोवैज्ञानिक ऐबिगेल सैन के मुताबिक़ सोशल मीडिया और हताशा का सह-संबंध नया नहीं है.

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एबिगेल कहती हैं, "जब हम डिप्रेशन के मरीज़ से बात करते हैं, तो पहली चीज़ जिसकी हम चर्चा करते हैं वो है सोशल मीडिया का इस्तेमाल कम करने की बात. ये एक अस्ली समस्या है, और पिछले 5-6 सालों में हालात बेहद ख़राब हो रहे हैं."

"आप इसमें इतने लीन हो जाते हैं कि ये आपको आपके असल रिश्तों से दूर कर सकता है. ये एक शानदार चीज़ हो सकती है, लेकिन ग़लत तरीक़े से इस्तेमाल करने पर ये अस्वस्थ कर सकता है."

हालांकि ये इतनी सीधी बात भी नहीं है.

पिट्सबर्ग अध्ययन इस बात पर ज़ोर देता है कि नतीजे ये भी दर्शा सकते हैं कि पहले से हताश लोग उस शून्य को भरने के लिए सोशल मीडिया का सहारा ले रहे हैं.

एबिगेल इस बात में भेद करने की ज़्यादा इच्छुक हैं कि सोशल मीडिया सीधे तौर पर मानसिक स्थिति पर असर डालने के बजाए पूर्व मौजूदा मुद्दों को और ख़राब कर सकती है.

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2015 में हुए एक और अध्ययन से निष्कर्स निकला कि हम सोशल मीडिया का कैसे इस्तेमाल करते हैं वो तय करता है कि इससे हम प्रभावित कैसे होते हैं.

ख़ासतौर पर फ़ेसबुक की बात करें तो इस बात के संकेत मिले हैं कि आप के उदास होने की संभावना अधिक हो जाती है जब आप किसी व्यक्ति से सीधे संपर्क साधने के बजाए अपनी असलियत छुपाकर करते हैं.

27 साल की वकील लुईस, निश्चित रूप से इस बात की गवाही दे सकती हैं कि कैसे रिश्ता टूटने के बाद ये एक विनाशकारी जुनून बन जाता है.

वो कहती हैं, "मेरे बॉयफ्रेंड से रिश्ता टूटा. जिस लड़की के लिए उसने मुझे धोखा दिया उसके साथ उसका रिश्ता शुरू हुआ. मेरे ऊपर जुनून सवार हो गया, मैं ऑनलाइन उनकी सारी हरकतों को फॉलो करने लगी."

"ख़ुद को इस तरह से निरंतर यातना देने से मेरे स्वास्थ्य पर असर पड़ने लगा. मैं काम के बीच ऐसा करती थी, रात के बीच में उठकर करती थी, सामाजिक कार्यक्रमों के बीच, मैं इसमें पूरी तरह डूब चुकी थी."

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लेकिन जानने के बावजूद भी कि वो ख़ुद को कितना नुक़सान पहुंचा रही थीं, लुईस इसे जारी रखने को बाध्य थीं, वो इसपर नियंत्रण नहीं कर पा रही थीं.

इस तरह की ऑनलाइन गतिविधियों के लिए बाध्य होने की इस प्रवृत्ति को पहचानते हुए अमरीकी ऑनलाइन थेरेपी कंपनी, टॉकस्पेस ने हाल ही में ऑनलाइन सोशल मीडिया डिपेंडेंसी कोर्स तैयार किया है.

टॉकस्पेस थेरेपिस्ट निकोल एमिसबरी ने इसे 12 हफ़्तों का ऑनलाइन पाठ्यकम्र बताया जहां मरीज़, समर्पित चिकित्सकों के साथ मिलकर ये सीखते हैं कि इस तकनीक का कैसे इस्तेमाल किया जाए बजाए इसके कि ये तकनीक आपका इस्तेमाल करने लगे.

इस दुख के पीछे के कुछ विज्ञान को समझाते हुए वो कहती हैं कि ये एक 'कंपल्शन लूप' है जहां 'लाइक' बटन उसे और बढ़ता है.

"मनुष्य का दिमाग़ इस तरह से बनाया गया है कि वो अच्छी ख़बर सुनने के बाद डोपेमाइन रिलीज़ करता है. इसलिए हमारे हर पोस्ट पर मिले लाइक से हमें थोड़ा सा डोपेमाइन मिलता है."

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वो कहती हैं, "ये बिल्कुल उसी तरह है जैसे ड्रग्स और दारू के लिए नशा काम करता है और ऐसे ही लोग इसके आदी हो जाते हैं. लेकिन जब लाइक रुक जाते हैं, डोपेमाइन में गिरावट हो जाती है और फिर सब टूट जाता है."

निकोल इस बात को स्वीकारती हैं कि इस इलाज के पीछे कुछ व्यंग है क्योंकि ये इलाज ऑनलाइन होता है, जो एक प्रकार का ख़ुद में सोशल मीडिया है.

फिर भी वो स्पष्ट हैं कि कोई भी मरीज़ एकांत में सोशल मीडिया से पीड़ित नहीं हैं. चाहे वो खान-पान की ग़लत आदतें हों या कोई अनसुलझा पारिवारिक समस्या, हमेशा ही इसके पीछे कोई गहरा कारण होता है.

साफ़ है कि सोशल मीडिया से हमारा रिश्ता उलझा हुआ है, आगे इसके और उलझने की संभावना है.

हताशा से इसका संबंध व्यक्ति विशेष होता है, जिसमें लगातार उपयोग कारण के बजाए केवल एक लक्षण हो सकता है.

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मूलरूप से सोशल मीडिया आधुनिक जीवन का एक आंतरिक हिस्सा है और ये बहुत सकारात्मक हो सकती है और ये मंच आपको अच्छे परिणाम भी दे सकता है.

एबिगेल कहती हैं कि हर चीज़ की तरह सोशल मीडिया का भी उपयोग संयम और संतुलन के साथ होना चाहिए और समस्याओं का जड़ से इलाज होना चाहिेए.

सोशल मीडिया भले ही हमें दुखी कर रहा हो, लेकिन ये तभी हो रहा है जब हम उसे ऐसा करने दे रहे हैं.

तो अगली बार अगर आप अपने मोबाइल को बाथरूम में ले जाएं, घरेलू डिनर के वक़्त फेसबुक चेक करें या अपने पूर्व प्रेमी को ढूंढें, ख़ुद से सवाल कीजिए की क्यों ?

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