30 लाख साल में पहली बार सबसे अधिक CO2

  • 19 जून 2016
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कार्बन डाईऑक्साइड यानी ग्रीनहाउस गैस की मात्रा एक ऐतिहासिक सीमा को पार कर सकती है. हवाई द्वीप के मशहूर मॉना लोआ ज्वालामुखी पर इसके अध्ययन से पता चला है कि साल 2016 में पूरे साल इसकी मात्रा 400 पीपीएम से उपर रही है.

ब्रिटेन के मौसम विभाग के मुताबिक़ CO2 का स्तर हाल के महीनों में अल-नीनो की वजह से बढ़ रहा है. अल-नीनो उष्णटिबंधीय इलाक़ों को गर्म और शुष्क बनाता है.

अल-नीनो की वजह से न केवल जंगलों की वायुमंडल से CO2 को सोखने की क्षमता पर असर पड़ा है, बल्कि इससे पूरी दुनिया में आग लगने की घटना सामने आ रही है जो हवा में अतिरिक्त CO2 छोड़ता है.

इसका मतलब यह है कि मॉना लोआ में मौजूद उपकरण जो कि CO2 की सीमा के बने रहने की जाँच करते हैं, साल 2016 के किसी भी महीने में इसकी संभावना कम है कि वो CO2 की मात्रा 400 पीपीएम से कम दर्ज करे.

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यूँ तो यह मात्रा जलवायु तंत्र के लिहाज़ से कोई ख़ास महत्व नहीं रखती है और यह केवल एक संख्या है. लेकिन इससे पहले CO2 की मात्रा लगातार 400 पीपीएम के उपर आज से 30 लाख से 50 लाख साल पहले हुआ करती थी. यानी वह समय जब धरती पर इंसानों का अस्तित्व ही नहीं था.

मौसम विभाग के प्रोफ़ेसर रिचर्ड बेट्स ने बीबीसी से कहा, "इस संख्या में कोई जादुई बात नहीं है. हम अचानक किसी घटना के होने की आशा नहीं करते हैं. यह एक ऐसी स्थिति है, जो हमें याद दिलाता है कि हमने जलवायु तंत्र को किस तरह से प्रभावित किया है".

इस ज्वालामुखी के उपर CO2 के बढ़ने की घटना आमतौर पर सर्दियों में देखी जाती है और फिर यह नीचे गिर जाता है. पिछले साल तीन महीनों को छोड़कर, ज़्यादातर महीने में CO2 की मात्रा 400 के उपर थी.

आमतौर पर कोई भी विशेषज्ञ यही उम्मीद करता है कि CO2 की मात्रा हर साल क़रीब 2 पीपीएम बढ़ती है, लेकिन विशेषज्ञों की टीम ने संभावना जताई है कि यह बढ़ोत्तरी 2016 में क़रीब 3.15 पीपीएम दर्ज हो सकती है.

वैज्ञानिकों ने पूर्वी प्रशांत महासागर के समुद्र तल के तापमान की भविष्यवाणी के लिए जलवायु के मौसम से जुड़े चलन का इस्तेमाल किया है. इस इलाक़े में अल-नीनो का असर आमतौर पर देखा जाता है.

प्रोफ़ेसर बेट्स ने कहा, "यह देखना काफ़ी महत्वपूर्ण है कि इस साल CO2 की मात्रा में बढ़ोत्तरी 1997-98 के मुक़ाबले ज़्यादा है, क्योंकि अब इंसान 25 फ़ीसदी ज़्यादा CO2 का उत्सर्जन करते हैं."

भविष्य में भी कम से कम एक पीढ़ी तक मॉना लोआ पर कार्बन डायऑक्साइड की मात्रा कम होने की संभावना कम ही है. भले ही पेरिस में हुए जलवायु सम्मेलन के समझौतों को पूरी तरह से लागू कर दिया जाए, क्योंकि धरती इस तरह के बदलाव बहुत धीरे-धीरे दिखाती है.

वहीं इस अध्ययन से अलग साउथैंटन यूनिवर्सियी के प्रोफ़ेसर गैविन फ़ोस्टर का कहना है, "ला-नीना असर जो कि अल-नीनो के उलट होता है, उसका भी थोड़ा असर देखा जाता है. यह पूर्वी प्रशांत महासागर के पानी को ठंढा करता है. यह CO2 की मात्रा को कम करेगा, लेकिन संभवतः इसका असर उतना नहीं होगा जो CO2 की मात्रा को उस ऐतिहासिक सीमा से कम कर दे".

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