सफल हुआ तो मैं, फ़ेल हुआ तो वो...ऐसा क्यों?

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जब कोई चीज़ सही हो जाती है तो हर कोई उसकी कामयाबी का सेहरा अपने सिर बांधने लगता है. लेकिन, ग़लतियां होने या नाकामी की सूरत में हर कोई ज़िम्मेदारी लेने से बचता है. ये इंसानी फ़ितरत है.

बहुत सी ऐसी कंपनियां होती हैं जहां कोई भी नाकामी की ज़िम्मेदारी लेना नहीं चाहता. चेक टैलेंट कंपनी श्वीज़ एजी के ओलिवर डोनोह्यू कहते हैं कि ये सीखना होगा कि हम ग़लतियों का क्या करते हैं.

हर टीम में ये दिक़्क़त होती है कि लोग नाकामी की ज़िम्मेदारी नहीं लेना चाहते. बर्लिन के ईएसएमटी बिज़नेस स्कूल के जेन हैगेन ने इस बारे में काफ़ी रिसर्च किया है. हैगेन ने कहा कि विमानों के कॉकपिट में अक्सर क्रू मेम्बर, गड़बड़ियों को विमान के कैप्टेन से छुपाते हैं. वो कहते हैं कि डांट खाने से बचने के लिए वो अक्सर गड़बड़ियां छुपाते हैं. नतीजा, आगे चलकर ये बड़े हादसे में तब्दील हो जाती है.

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कारोबार की दुनिया में टीम मैनेजर अक्सर अपने बॉस से परेशानियां छुपाते हैं. गड़बड़ियों को रिपोर्ट नहीं करते. उन्हें लगता है कि कोई परेशानी बताने पर उन्हें ही इसकी ज़िम्मेदारी लेनी होगी. हैगेन के मुताबिक़, अच्छे से अच्छे संस्थान में लोग ज़िम्मेदारी लेने से डरते हैं. ख़ास तौर से नाकामी की.

हैगेन के मुताबिक़, "नाकामी की ज़िम्मेदारी न लेकर हम, ग़लतियों से सबक़ लेने का मौक़ा गंवा बैठते हैं. वो कहते हैं कि किसी भी नाकामी के बाद, हमें ये देखना चाहिए कि किस वजह से ऐसा हुआ. ताकि वो ग़लती दोहराई न जाए."

जब कोई चीज़ कामयाब हो जाती है तो हम उसके बारे में खुलकर बात करते हैं. उससे क्या सीखा ये बताते हैं. लेकिन, नाकाम होने की सूरत में उस पर उस तरह से बात नहीं होती. हम अक्सर नाकामी से सीखने के मौक़े गंवा देते हैं.

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अमरीका की मीडिया कंपनी 3क्यू डिजिटल के डेविड रॉडनित्सकी टीम मैनेजर्स को एक सटीक सलाह देते हैं. वो कहते हैं, "टीम लीडर्स को ये बात सीखनी चाहिए कि नाकामी की ज़िम्मेदारी कैसे लें. आप अपनी कमियों को खुलकर मानिए. ग़लती की वजह तलाशने की कोशिश कीजिए. लोगों को ये भी बताइये कि आपने उस ग़लती से क्या सीखा. ये भी बताइए कि आगे चलकर आप ये ग़लती नहीं दोहराएंगे."

जानकार कहते हैं कि नाकामी को इस तरह से देखने पर, आप कई मुसीबतों से बच जाएंगे. ख़ास तौर से आपके मातहतों पर आपके इस क़दम का बहुत अच्छा असर पड़ेगा. आप उनका भरोसा जीतने में कामयाब होंगे.

अच्छे टीम मैनेजर्स को ये मालूम होना चाहिए कि सिर्फ़ कामयाबी का सेहरा बांधना ही सही नहीं. बल्कि कोई चीज़ कामयाब होने पर हमेशा इसका श्रेय दूसरों को देने की कोशिश की जानी चाहिए.

डेविड रॉडनित्सकी कहते हैं कि मैनेजर्स को एक बात हमेशा याद रखनी चाहिए - ग़लतियों की ज़िम्मेदारी ख़ुद लें. और, कामयाबी का सेहरा दूसरों के सर बांधें.

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न्यूयॉर्क की कंपनी बान्फी वाइन्स पिछले क़रीब सौ सालों से दुनिया भर में इटैलियन वाइन का निर्यात करती है. इसकी मालकिन क्रिस्टिना मारियानी मे ने इस मामले में अपना तजुर्बा बताया.

सात साल पहले क्रिस्टिना के पिता ने इटली में एक होटल खोला. पिता जॉन ने कहा, "हमें ये होटल ख़ुद चलाना चाहिए. वहीं क्रिस्टिना का कहना था कि होटल चलाने का काम इस मामले के किसी जानकार को सौंप देना चाहिए. दोनों में बहस इस क़दर बढ़ गई कि लगा कि अब सुलह नहीं होगी."

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फिर क्रिस्टिना ने दोनों बातों को ठीक से समझने की कोशिश की. अगले दो साल उन्होंने दोनों विकल्पों के बारे में जानकारी इकट्ठा की. आख़िर में क्रिस्टिना को समझ में आ गया कि उनके पिता की बात सही थी. क्रिस्टिना ने जाकर अपने पिता से ग़लती के लिए माफ़ी मांगी. हालांकि क्रिस्टिना कहती हैं कि मामला उनकी अना का था, फिर भी उन्होंने पिता से जाकर माफ़ी मांगी. इससे दोनों के रिश्ते बेहतर हुए.

पांच साल पहले क्रिस्टिना की कंपनी ने कैस्टेलो बान्फी इल बोर्गो के नाम से होटल खोला. इसे इटली के बेहतरीन होटलों में गिना जाता है. क्रिस्टिना कहती हैं कि ये कभी मुमकिन न होता, अगर उन्होंने अपनी ग़लती न मानी होती.

तो टीम मैनेजर्स के लिए ये बड़ी सलाह है कि वो किसी भी मिशन पर अकड़ के साथ न लगें. ग़लतियां हों तो मान लें, सुधार करें. तभी कामयाब होंगे.

(अंग्रेज़ी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें, जो बीबीसी कैपिटल पर उपलब्ध है.)

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