आपकी चाल-ढाल आपके बारे में कुछ कहती है!

  • 25 जून 2016
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अक्सर लोग, चेहरा देखकर दूसरों का किरदार पहचान लेने के दावे करते हैं. कुछ लोग ऐेसे भी होते हैं जो चाल-ढाल देखकर इंसान को पहचान लेने का दावा करते हैं.

क्या वाक़ई में ऐसा होता है? क्या इंसान की चाल-ढाल से उसका किरदार पता चलता है?

इस सवाल के जवाब में आप शायद हां कहेंगे. जैसे कि कोई अकड़कर चलता हुआ दिखता है तो आपको लगता होगा कि इस शख़्स को ख़ुद के बारे में बहुत गुरूर होगा.

या फिर धीरे-धीरे संभलकर चलते हुए शख़्स को देखकर ये लगता होगा कि फलां इंसान तो आलसी होगा.

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मनोवैज्ञानिक काफ़ी दिनों से ये समझने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या वाक़ई लोगों की चाल उनके व्यक्तित्व का आईना होती है.

दिलचस्प बात ये है कि तमाम तजुर्बे ये कहते हैं कि किसी भी इंसान की चाल देखकर बहुत से लोग उसके बारे में एक जैसी राय ही क़ायम कर लेते हैं.

मगर किसी शख़्स के बारे में आपका ख़्याल कितना सही होता है? किसी की चाल से हम उसके बारे में क्या-क्या जान सकते हैं? क्या आपको पता है कि इन सब सवालों के सबसे सटीक जवाब कौन दे सकता है?

एक दिमाग़ी रूप से बीमार शख़्स जो जुर्म की दुनिया में कूद जाता है, उसे इंसान की चाल देखकर उसके बारे में अंदाज़ा हो जाता है. ऐसे लोग चाल से ही अपना शिकार तलाशते हैं.

चाल को लेकर पहला तजुर्बा किया था जर्मनी के मनोवैज्ञानिक वर्नर वोल्फ़ ने. वोल्फ़ की रिसर्च 1935 में छपी था.

उन्होंने कई लोगों के चलने का ख़ुफ़िया तौर पर वीडियो बनाया था. फिर यही वीडियो उन लोगों को दिखाया गया, मगर उनके चेहरे छुपाकर.

फिर उनसे उनकी ही चाल के बारे में राय पूछी गई. दिलचस्प बात ये है कि लोगों को अपनी ही चाल-ढाल का अंदाज़ा नहीं हुआ और ज़्यादातर लोगों की राय एक दूसरे से मिलती पाई गई.

ये बात अस्सी साल से भी ज़्यादा पुरानी हो गई. तब तकनीक इतनी तरक़्क़ी पर नहीं थी. आज के रिसर्च, वर्नर वोल्फ़ के तजुर्बे से कहीं बेहतर हैं.

अस्सी के दशक में अमरीका में मनोवैज्ञानिकों ने लोगों की चाल पर एक तजुर्बा किया था.

इसके नतीजे में पता ये चला कि आम तौर पर इंसानों की चाल दो तरह की होती है. एक तो जवां, तेज़-तर्रार चाल होती है. जिसमें लोग तेज़ी से क़दमताल करते हैं.

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उनके हाथ भी ज़्यादा तेज़ी से हिलते हैं, जब वो चलते हैं. वहीं दूसरी चाल धीमी, आराम वाली होती है. जिसमें लोग आगे की तरफ़ झुककर चलते हैं. हालांकि इसका उम्र से कोई वास्ता नहीं होता.

जिन लोगों ने ये तजुर्बा किया था, उनका मानना था कि तेज़ चाल वाले ज़्यादा ख़ुश रहते हैं. वो ज़्यादा ताक़तवर भी होते हैं.

हालांकि इस रिसर्च में ये बात नहीं पता चली कि जो लोगों की राय थी वो सही थी या ग़लत.

इस सवाल के जवाब हमें ब्रिटेन और स्विटज़रलैंड में हुए रिसर्च से मिल सकते हैं.

दोनों ही रिसर्च में फिर वहीं बात सामने आई कि लोगों की चाल-ढाल आम तौर पर दो तरह की होती है.

पहले तरह की चाल लंबे डग भरने वाली होती है. इससे भरोसा झलकता है. लोगों की बिंदास तबीयत का पता चलता है.

वहीं दूसरी चाल धीमी, आराम से चलने वाली होती है. ये किसी इंसान के स्थिर मिज़ाज की झलक देती है.

मगर, सच बात तो ये है कि इन रिसर्च में चाल-ढाल की बुनियाद पर लोगों के बारे में राय ग़लत पायी गई.

यहां तक कि लोगों ने ख़ुद की चाल देखकर भी जो बात बतायी, वो सही नहीं निकली.

इन तजुर्बों से साफ़ है कि जैसे हम किसी का चेहरा, उसका पहनावा देखकर उसके बारे में राय बना लेते हैं, ठीक वैसे ही उसकी चाल से भी हम उसके किरदार के बारे में तसव्वुर कर लेते हैं.

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मगर यहां आपको बता दें कि चेहरा देखकर हम किसी इंसान के बारे में जो भी सोचते हैं, वो अक्सर सही होता है.

लेकिन, चाल-ढाल देखकर हम किसी के बारे में जो राय क़ायम करते हैं, वो अक्सर ग़लत होती है.

इस बारे में हुए कुछ और तजुर्बे कहते हैं कि छोटे क़दम उठाने वाले, धीरे चलने वाले लोग कमज़ोर तबीयत के होते हैं.

उन्हें आसानी से नुक़सान पहुंचाया जा सकता है. जापान में हुए एक रिसर्च से ये बात खुलकर सामने आई थी.

ऐसी चाल चलने वाली लड़कियों के बारे में मर्दों ने कहा था कि वो अकेले में पाकर उन्हें ज़रूर छेड़ते.

अपराधियों को अक्सर लोगों की चाल से उनके बारे में सटीक अंदाज़ा हो जाता है. इसी जापानी रिसर्च से ये बात सामने आई थी.

कुछ दिमाग़ी रूप से बीमार क़ैदियों को लोगों की चाल की बिनाह पर उनके बारे में तसव्वुर करने को कहा गया था.

अक्सर इन क़ैदियों की लोगों के बारे में राय सही निकली.

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अब इन तमाम तजुर्बों से ये सवाल उठता है कि क्या आप अपनी चाल-ढाल बदलकर अपने बारे में लोगों की राय बदल सकते हैं?

ये बात तो सही है कि आप अपनी चाल से दूसरों को एक संदेश देते हैं, अपने किरदार के बारे में.

लंबे डग भरने वालों के बारे में लोग सोचते हैं कि वो मज़बूत इरादों वाले होंगे.

अक्सर ख़राब इलाक़ों से गुज़रते वक़्त औरतें लंबे डग भरते हुए निकलती हैं. ऐसा वो ख़ुद के बचाव के लिए करती हैं.

साथ ही वो उन्हें देख रहे लोगों को एक संदेश भी देती हैं कि वो डरी नहीं हैं.

वैसे, मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि किसी के लिए अपनी चाल-ढाल बदलना बहुत मुश्किल है. किसी को कोई ख़ास तरीक़ा नहीं सिखाया जा सकता.

बेहतर होगा कि आप अपनी चाल-ढाल बदलकर किसी पर छाप छोड़ने का इरादा छोड़ दें.

(अंग्रेज़ी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ्यूचर पर उपलब्ध है.)

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