‘भारत को झटका, पाकिस्तान की कामयाबी’

  • 26 जून 2016
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पाकिस्तानी उर्दू अख़बारों में जहां परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) के दरवाज़े फ़िलहाल भारत के लिए बंद होने और कराची में मशहूर क़व्वाल अमजद साबरी की हत्या छाई है, वहीं भारत में इफ्तार की बदलती सियासत की चर्चा है.

कराची से छपने वाला ‘जंग’ लिखता है कि चीन, तुर्की, ब्राज़ील, इसराइल, ऑस्ट्रिया, न्यूज़ीलैंड और आयरलैंड ने एनएसजी के लिए भारत की सदस्यता का इस आधार पर विरोध किया कि उसने परमाणु फैलाव को रोकने वाले समझौते एनपीटी पर दस्तख़्त नहीं किए हैं.

अख़बार लिखता है कि ये भारतीय अधिकारियों के लिए बड़ा झटका और सैद्धांतिक आधार पर की जाने वाली पाकिस्तान की कोशिशों की स्पष्ट कामयाबी है.

अख़बार लिखता है कि चीन और तुर्की जैसे मित्र देशों के अलावा पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक़ पाकिस्तान के प्रतिनिधि मंडल ने 55 देशों के सदस्यों से बात की और अपने रुख़ के बारे में बताया, जिसके सकारात्मक नतीजे सामने आए हैं.

लाहौर से छपने वाले ‘नवा-ए-वक़्त’ ने लिखा है कि पाकिस्तान और भारत, दोनों को एक ही साथ एनएसजी का सदस्य बनाया जाना चाहिए.

अख़बार लिखता है कि भेदभावपूर्ण तरीक़े से अगर भारत को एनएसजी में शामिल किया गया तो इससे दक्षिण एशिया में अस्थिरता बढ़ेगी.

अख़बार ने ताशकंद में पाकिस्तानी राष्ट्रपति ममनून हुसैन के साथ मुलाक़ात में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के इस बयान का भी ज़िक्र किया है कि चीन हर मंच पर पाकिस्तान का साथ देगा.

‘औसाफ़’ ने यूरोपीय संघ की सदस्यता के मुद्दे पर ब्रिटेन में हुए जनमत संग्रह पर संपादकीय लिखा है- ब्रिटेन यूरोपीय यूनियन की ‘ग़ुलामी’ से आज़ाद, प्रधानमंत्री डेविड कैमरन के इस्तीफ़े का एलान.

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अख़बार लिखता है कि ब्रिटेन यूरोपीय संघ से निकलने वाला पहला देश होगा, लेकिन उसे संघ में रहने के फ़ायदे और उससे निकलने के नुक़सानों का आकलन करना होगा.

अख़बार के मुताबिक़ जिस तरह कैमरन ने इस्तीफ़े का एलान किया है, वो लोकतंत्र की ख़ूबसूरती है, काश पाकिस्तान के राजनेता भी इस सुनहरी परंपरा को आगे बढाएं और जनता की इच्छा का सम्मान करने की कोई मिसाल क़ायम करें.

‘दुनिया’ लिखता है कि प्रतिबंधित तहरीके तालिबान पाकिस्तान ने कराची में क़व्वाल अमजद साबरी की हत्या की ज़िम्मेदारी क़बूल की है और अगर ये दावा दुरुस्त है तो इसका मतलब है कि ये लोग अब भी इतनी ताक़त रखते हैं कि किसी को भी अपनी गोली को निशाना बन सकें.

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अख़बार लिखता है कि चरमपंथियों के ख़िलाफ़ सेना के ऑपरेशन ‘जर्ब-ए-अज़्ब’ के दूसरे चरण में उन लोगों पर हाथ डालने के काम में तेज़ी लाने की ज़रूरत है जो शहरों में इन लोगों की मदद कर रहे हैं.

अख़बार लिखता है कि अमजद साबरी के क़त्ल से दो दिन पहले ही सिंध हाई कोर्ट के चीफ़ जस्टिस सज्जाद अली शाह के बेटे औवेस अली शाह को एक व्यस्त इलाक़े से अग़वा कर लिया गया.

‘एक्सप्रेस’ ने कराची में क़ानून व्यवस्था के ख़राब हालात का ज़िक्र करते हुए लिखा है कि बहुत हो गया, अब सत्ता में बैठे लोगों को ग़फ़लत की नींद से जगना ही होगा.

अख़बार की राय है कि सिर्फ़ पाकिस्तानी अर्धसैनिक बल रेंजर्स की आलोचना करके कुछ हासिल नहीं होगा, बल्कि ‘शहर-ए-क़ायद’ में अमन के लिए सभी पक्षों और क़ानून लागू करने वाली एजेंसियों को एकजुट होकर काम करना होगा.

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अख़बार अजमद साबरी के जनाज़े में उमड़े जनसैलाब पर लिखता है कि ये कराची के इतिहास में शायद सबसे बड़ा जनाज़ा था जिसमें देश भर से उनके चाहने वाले और महिलाएं भी बड़ी संख्या में शामिल थीं.

रुख़ भारत का करें तो 'हिंदोस्तान एक्सप्रेस' का संपादकीय है- इफ़्तार की बदलती सियासत.

अख़बार कहता है कि बरसों बाद ये पहला मौक़ा है जब कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने ख़ुद को इफ़्तार से दूर करने का फ़ैसला किया है.

अख़बार कहता है कि 2014 के चुनावों में हार के बाद बनी एंटनी कमेटी ने सॉफ़्ट हिंदुत्व की तरफ़ लौटने का मशविरा दिया था और कहा था कि ये पैग़ाम जा रहा है कि कांग्रेस हिंदू हितों को नज़रअंदाज़ कर रही है और इसीलिए कांग्रेस ने इफ़्तार से दूर रहने का फ़ैसला किया है.

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दूसरी तरफ अख़बार लिखता है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इफ़्तार की दावत से 'मिशन 2019' का रास्ता देख रहे हैं जबकि आरएसएस भी अपने एक संगठन के ज़रिए बड़े पैमाने पर इफ़्तार देकर मुसलमानों की तरफ़ दोस्ती का हाथ बढ़ा रहा है.

'हमारा समाज' ने एक के बाद एक विवादास्पद बयान देने वाले भाजपा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी पर संपादकीय लिखा है.

अख़बार कहता है कि पहले गांधी परिवार, फिर आरबीआई रघुराम राजन, अरविंद केजरीवाल, दिल्ली के लेफ्टिनेंट गवर्नर नजीब जंग और अब केंद्र सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम पर स्वामी की निगाहें बड़े शक को जन्म देती हैं.

अख़बार कहता है कि भाजपा स्वामी के ख़िलाफ़ कोई क़दम क्यों नहीं उठाती है जबकि उन्होंने साफ़ कहा है कि उनके पास 27 लोगों की सूची है जिनके ख़िलाफ़ वो अपनी मुहिम जारी रखेंगे.

अख़बार कहता है कि क्या बीजेपी में हर कोई इतना आज़ाद है कि जिसके मुंह में जो आए बोल जाता है और पार्टी नेतृत्व हक्का बक्का रह जाता है.

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अख़बार के मुताबिक़ अगर ऐसा नहीं है तो फिर स्वामी के बयानों को पार्टी की मर्ज़ी के मुताबिक़ ही माना जाएगा.

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