तनाव से बचने के लिए 'फ़ॉरेस्ट बाथिंग'

  • 27 जून 2016
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आज की भाग-दौड़ भरी ज़िंदगी में तनाव हमारे रहन-सहन का अहम हिस्सा बन गया है. घर से लेकर दफ़्तर तक और रास्ते के जाम में फंसे होने तक, हम तनाव के शिकार होते हैं. इससे निपटने के तमाम तरीक़े बताए जाते हैं. अमरीका और जापान जैसे विकसित देशों में तनाव से निपटने का एक नया तरीक़ा इस्तेमाल किया जा रहा है.

इस थेरेपी का नाम है 'फॉरेस्ट बाथिंग' या 'जंगल स्नान'. नाम भले नया हो, इसके सिवा इसमें कुछ भी नया नहीं. इसमें लोगों को जंगल में, पेड़-पौधों के बीच वक़्त बिताने कहा जाता है. उन्हें बताया जाता है कि जंगल में आराम से टहलते हुए वक़्त गुज़ारें. पेड़-पौधों की ख़ुशबू सूंघें, पत्तियों की सरसराहट को सुनें, पेड़ों से गुज़रती हवा को महसूस करें. अब इसमें नया तो कुछ नहीं.

बरसों पहले स्कॉटलैंड के लेखक रॉबर्ट लुई स्टीवेंसन ने कहा था, ''जंगल अपनी ख़ूबसूरती की वजह से लोगों का दिल नहीं लुभाते. असल में वहाँ की हवा बेहतरीन होती है. पेड़ों से निकलती मादक ख़ुशबू, दिमाग़ पर गहरा असर डालती है. इससे थका हुआ इंसान बेहतर महसूस करने लगता है. जंगल उसकी आत्मा को छूकर ज़िंदगी का नया राग छेड़ देते हैं.''

स्टीवेंसन के ये बताने से पहले भी लोग ये जानते थे कि क़ुदरत के क़रीब वक़्त गुज़ारने से अच्छा महसूस होता है. मगर, जैसे-जैसे हमारी ज़िंदगी की रफ़्तार बदली, हम जंगलों से दूर होते गए. आज दुनिया की आधी आबादी शहरों में रहती है. इनमें से ज़्यादातर लोगों का हरियाली से साबक़ा नहीं पड़ता. उनके लिए क़रीब के पार्क में जाना भी कई बार मुमकिन नहीं होता.

अमरीका के नेचुरलिस्ट एमॉस क्लिफर्ड ने तो बाक़ायदा एसोसिएशन ऑफ़ नेचर ऐंड फॉरेस्ट थेरेपी ही बना डाली है. उन्होंने ही जंगलों में आराम से टहलने, पेड़-पौधों के बीच वक़्त बिताने को ''फॉरेस्ट बाथिंग'' थेरेपी का नाम दिया है. जिसमें लोगों को जंगलों में वक़्त गुज़ारने के लिए कहा जाता है.

एमॉस क्लिफर्ड के फॉरेस्ट बाथिंग टुअर्स में छह से पंद्रह लोगों की टीम तीन घंटे में जंगल में सिर्फ़ आधा मील चलती है. इसका मक़सद होता है, ज़िंदगी की रफ़्तार से पीछा छुड़ाना, कुछ वक़्त आराम से बिताना, ख़रामा-ख़रामा चलना, क़ुदरत से नज़दीकी महसूस करना.

इसकी ज़रूरत हमें इसलिए है कि हम अपने शहरी रहन-सहन के चलते क़ुदरत से दूर होते जा रहे हैं. अमरीका में हुए एक ताज़ा सर्वे के मुताबिक़, हर अमरीकी रोज़ाना औसतन दस घंटे टीवी, कंप्यूटर, टैबलेट या स्मार्टफ़ोन की स्क्रीन पर नज़र गड़ाए रहता है. चीन, फिलीपींस और इंडोनेशिया में तो ये आंकड़े और भी ख़राब हैं. इंसान ने कभी तकनीक का विकास किया था, अपनी मदद के लिए. वक़्त बचाने के लिए. मगर आज तकनीकी चीज़ें ही लोगों का ज़्यादातर वक़्त ले जाती हैं. हम आज तकनीक के मालिक नहीं, ग़ुलाम हो गए हैं.

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ऐसे ही हालात से निपटने के लिए फॉरेस्ट बाथिंग थेरेपी शुरू की गई है. इसमें लोग जंगलों में वक़्त बिताते हैं. आम तौर पर इस दौरान फ़ोन या दूसरी तकनीकी चीज़ों से दूर रहने को कहा जाता है. हालांकि इस पर कोई पाबंदी नहीं होती. जंगल में टहलने के दौरान लोगों से क़ुदरत से जुड़े कुछ सवाल पूछे जाते हैं. जैसे कि मिट्टी की महक कैसी है? किसी पेड़ की छाल कैसी दिखती है? क्या आप जंगल में पेड़ों के बीच से गुज़रती हवा को सुन सकते हैं...वग़ैरह..वग़ैरह.

एमॉस क्लिफर्ड कहते हैं कि आज हम हर पल मसरूफ़ रहना चाहते हैं. कोई न कोई काम निपटाना चाहते हैं. ऐसे में जंगल में आराम से टहलकर हम अपने नर्वस सिस्टम को दुरुस्त करते हैं. उसकी मरम्मत करते हैं.

आज इस बात के तमाम सबूत मिल चुके हैं कि क़ुदरत के क़रीब वक़्त गुज़ारने से हमारे शरीर पर बहुत अच्छा असर पड़ता है. अमरीका की स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में 2015 में हुआ रिसर्च बताता है कि जंगल में टहलने से हमारे दिमाग़ के एक ख़ास हिस्से को ख़ून की सप्लाई धीमी हो जाती है. ये दिमाग़ का वो हिस्सा होता है, जिसके चलते हम हमेशा किसी न किसी सोच में पजड़े होते हैं. दूसरे तजुर्बे बताते हैं कि पेड़-पौधों के बीच वक़्त गुज़ारने से हमारे डिप्रेशन में जाने का डर कम होता है. हमारा चित्त काम में बेहतर तरीक़े से लगता है.

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एपल के पूर्व सीईओ स्टीव जॉब्स अक्सर बाहर टहलते हुए मीटिंग करते थे. इन दिनों और भी बड़ी कंपनियों के अधिकारी, इस चीज़ की नक़ल कर रहे हैं.

तनाव कम करने के लिए जंगल में टहलने का ये चलन सबसे पहले जापान में शुरू हुआ. वहां 93 फ़ीसद आबादी शहरों में रहती है. रोज़मर्रा के तनाव झेलती है. इसीलिए 1982 में ही वहां के जंगल विभाग ने फ़ॉरेस्ट बाथिंग का अभियान शुरू किया था. आज जापान की सरकार, जंगल में घूमने के फ़ायदों पर रिसर्च के लिए लाखों डॉलर ख़र्च कर रही है.

जापान की सरकार ने वन विभाग की मदद से कई फॉरेस्ट बेस तैयार किए हैं. ये जगहें कंपनियों को किराए पर दी जाती हैं. ताकि वो अपने कर्मचारियों का तनाव कम करने के लिए वहां बैठकें कर सके. कुछ वक़्त गुज़ार सकें.

जापान की ही तरह दक्षिण कोरिया में भी लोगों का इलाज करने के लिए जंगलों में हीलिंग क्लिनिक खोले गए हैं. इसी तरह फिनलैंड में भी 2007 में जंगलों से लोगों की सेहत सुधारने का अभियान शुरू किया गया है. इसके तहत स्कूलों और दफ़्तरों के पास पेड़ लगाने का अभियान भी चलाया जा रहा है.

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वहीं अमरीकी नेचुरलिस्ट एमॉस क्लिफर्ड आज फ़ेसबुक और गूगल जैसी बड़ी कंपनियों के साथ जुड़ गए हैं. वो क़ुदरती इलाज की मुहिम चला रहे हैं. साथ ही कुछ स्कूलों में भी वो बच्चों को क़ुदरत से नज़दीकी बढ़ाने के नुस्खे सिखा रहे हैं.

अमरीका में पार्क आरएक्स नाम से एक अभियान चलाया जा रहा है. इसके तहत लोगों को क़ुदरत के क़रीब वक़्त गुज़ारने के तरीक़े बताए जा रहे हैं. इस अभियान के सलाहकरा रॉबर्ट ज़ार कहते हैं कि शहरों में पार्कों का बहुत कम इस्तेमाल होता है. लोग बीमार होने पर फ़ौरन दवा खाकर ख़ुद को तुरंत ठीक कर लेना चाहते हैं.

फॉरेस्ट बाथिंग थेरेपी, ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड और ब्रिटेन में भी अलग-अलग नामों से चलाई जा रही है. सबका मक़सद एक ही है, क़ुदरत से नज़दीकी बढ़ाना और तनाव को दूर भगाना. इस थेरेपी का दूसरे देशों में भी पांव पसारना तय है.

आख़िर हिंदुस्तान में भी तो लोग तनाव के शिकार हैं. उन्हें भी क़ुदरती इलाज की ज़रूरत है. तो इसके लिए करना कुछ नहीं है. बस, जंगल की तरफ़, हरियाली के बीच टहलने निकल जाना है.

(अंग्रेजी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें, जो बीबीसी कैपिटल पर उपलब्ध है.)

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