'हम बड़ी धूम से बस शोक मना लेते हैं'

  • 27 जून 2016
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बीसवीं सदी की क़व्वाली में साबरी ब्रदर्स का वहीं मक़ाम है जो एल्विस प्रेसली का रॉक एंड रॉल या रेगे में बॉब मारले का है.

ग़ुलाम फ़रीद साबरी और मक़बूल साबरी विभाजन से पहले कुरुक्षेत्र के क़स्बे-खलिहानों में पैदा हुए.

विभाजन के बाद साबरी ब्रदर्स कराची आ गए और फिर मुड़कर नहीं देखा. जब साबरी ब्रदर्स ने सत्तर के दशक में पहली बार किसी पश्चिमी देश के न्यूयॉर्क कार्नेगी हॉल में क़व्वाली पेश की.

और फिर लंदन के रॉयल अल्बर्ट हॉल में 'भर दो झोली मेरी या मोहम्मद' के बाद 'ताज दारे हरम हो निगाहे करम' सुनाना शुरू किया तो भारतीय और पाकिस्तानी भीड़ तो क़व्वाली से वाक़िफ़ थी, लेकिन गोरों की भीड़ ऐसी दिवानी हुई कि मस्ती के आलम में एक-दो ने तो दीवार से सिर मारकर ख़ुद को लहुलूहान कर लिया.

यूरोप और अमरीका की यात्राओं का फ़ायदा यह हुआ कि साबरी ब्रदर्स ने पश्चिमी ड्रम, अफ्रीकी ओंगा बोंगा और गिटार का क़व्वाली के ऑर्केस्ट्रा में इस्तेमाल शुरू कर दिया.

इससे पहले क़व्वाली में ऐसे फिरंगी और विदेशी साज़ों का इस्तेमाल पाप के बराबर था.

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और फिर कई साल बाद नुसरत फ़तेह अली ख़ान ने पीटर गैब्रियल के साथ मिलकर क़व्वाली ऑर्केस्ट्रा को कहां से कहां पहुंचा दिया.

अलबत्ता साबरी ब्रदर्स मॉडर्न पश्चिमी साज़ों को इस्तेमाल करने के बावजूद क़व्वाली के उस रिवायती जॉनर से बाहर नहीं निकले जिसकी बुनियाद हज़रत अमीर ख़ुसरो ने सात सौ साल पहले रख दी थी.

1992 में बड़े भाई ग़ुलाम फ़रीद साबरी का इंतक़ाल हुआ और 2011 में छोटे भाई मक़बूल साबरी चल बसे. अगली पीढ़ी में क़व्वाली का बोझ ग़ुलाम फरीद साबरी के बेटे अमजद साबरी ने उठाया. बीते बुधवार को किसी ने अमजद साहब का कराची में दिनदहाड़े क़त्ल कर दिया.

यहां तक तो आप सबों को मालूम होगा ही लेकिन यह बात आप में से अक्सर लोगों तक ना पुहंची हो कि अमजद साबरी के दोनों बेटे ऑन और मुजाहिद साबरी जो अभी मुश्किल से बारह तेरह साल के ही हैं, उन्होंने बाप के दुख को शक्ति बना लिया.

और क़त्ल के दो दिन बाद से बड़े हौसले के साथ लोकल टीवी चैनल्स पर नात और क़व्वाली का झंडा उठा लिया.

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45 साल के अमजद साबरी को अपना फ़न निखारने का बहुत ज़्यादा मौक़ा नहीं मिल पाया. उन्होंने उन्हीं क़व्वालियों को परफॉर्म किया जिनके ज़रिए उनके वालिद और चाचा मशहूर हुए.

मगर अमजद के जनाज़े में हज़ारों औरतों और मर्दों का आना, हर टीवी चैनल पर उन्हें मुसलसल श्रद्धांजली मिलना, हो सकता है किसी बड़े कलाकार की मौत के संदर्भ में किसी आम भारतीय नागरिक के लिए उतना महत्वपूर्ण न हो.

मगर आज के पाकिस्तानी समाज में जहां अपना ग़ुस्सा बाहर निकालने और प्रतिरोध ज़ाहिर करने के रास्ते बहुत कम बचे हैं, अमजद साबरी की हत्या पर इतनी खुली प्रतिक्रिया बताती है कि बहुत हो चुका, अब हमारे नाम पर और अत्याचार और ख़ून नहीं देखा जाता.

मूड का अंदाज़ा इससे हो सकता है कि अमजद साबरी के जनाज़े में शामिल एक मंत्री उस वक़्त पतली गली से निकल लिए जब एक आदमी ने उनके मुंह पर यह शेर जड़ दिया.

"हमसे क़ातिल का ठिकाना नहीं ढूंढा जाता

हम बड़ी धूम से बस शोक मना लेते हैं"

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