'अमरीका पूरी दुनिया नहीं, भारत बुनियादी तथ्य जाने'

  • 28 जून 2016
सोेल में 20-24 जून तक आयोजित एनएसकी की पूर्ण बैठक. इमेज कॉपीरइट EPA

परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एएनएसजी) की सोल में आयोजित बैठक में भारत की सदस्यता की अर्ज़ी, फ़िलहाल अर्ज़ी ही रह गई है.

भारत ने इसके लिए परोक्ष रूप से चीन को ज़िम्मेदार ठहराया था. भारत के आरोपों पर चीन के सरकारी अख़बार ' ग्लोबल टाइम्स' ने एक संपादकीय लिखा है.

अख़बार ने इस पूरे विषय पर भारत को कई तरह की नसीहतें दी हैं. ग्लोबल टाइम्स में जो छपा है, वो इस प्रकार है:

"परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) की बैठक पिछले हफ़्ते सोल में हुई. एनएसजी में गुरुवार शाम परमाणु अप्रसार समझौते (एनपीटी) पर दस्तखत न करने वाले देशों को एनएसजी की सदस्यता पर चर्चा के लिए एक विशेष सम्मेलन आयोजित किया गया. इसमें चीन समेत 10 देशों ने इस प्रयास का विरोध किया.

भारत ने एनपीटी पर दस्तखत नहीं किए हैं, लेकिन वह एनएसजी में शामिल होने के लिए सबसे उत्सुक आवेदक है. सोल सम्मेलन से पहले भारतीय मीडिया ने भारत की दावेदारी को लेकर ख़बरें दीं. कुछ ने यहां तक लिखा कि एनएसजी के 48 सदस्यों में चीन को छोड़ 47 देशों ने हरी झंडी दिखा दी है.

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साल 1975 में स्थापना के बाद से ही एनएसजी के सभी सदस्यों ने एनपीटी पर हस्ताक्षर किए हैं. यह इस संगठन का बुनियादी सिद्धांत बन गया है. अब भारत एनपीटी पर दस्तखत किए बिना एनएसजी में शामिल होकर पहला अपवाद बनना चाहता है. लेकिन यह चीन और अन्य सदस्य देशों की तर्कसंगत ज़िम्मेदारी है कि वो सिद्धांतों की रक्षा के लिए भारत के प्रस्ताव को पलट दें.

हालांकि, भारत में लोगों ने इसे लेकर कड़ी प्रतिक्रिया दी है. कुछ भारतीय मीडिया घरानों ने चीनी पक्ष को बदनाम करना शुरू कर दिया. वहीं कुछ भारतीयों ने चीन में बने सामान के बहिष्कार और ब्रिक्स से हटने तक की मांग कर डाली.

भारत की महत्वाकांक्षा को अमरीकी समर्थन ने सबसे अधिक प्रोत्साहित किया. भारत को समर्थन देने की अमरीका की भारत समर्थक नीति का मकसद दरअसल चीन को घेरना है.

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अमरीका पूरी दुनिया नहीं है. उसके समर्थन का मतलब यह नहीं है कि भारत ने पूरी दुनिया का समर्थन जीत लिया है. इस बुनियादी तथ्य की भारत ने अनदेखी की है.

कुछ भारतीयों की शिकायत का कोई मतलब नहीं है. चीन की कार्रवाई अंतरराष्ट्रीय नियमों के मुताबिक़ थी. लेकिन भारत की प्रतिक्रिया से लगा कि उसके राष्ट्रीय हित दुनियाभर में मान्य सिद्धांतों की अवहेलना कर देंगे.

हाल के सालों में देखा गया है कि पश्चिमी दुनिया ने भारत की बहुत अधिक प्रशंसा की है. लेकिन चीन को नाकाम बताया है. भारत को बिगाड़ दिया गया है. हालांकि दक्षिण एशिया की जीडीपी चीन के सकल घरेलू उत्पाद का केवल 20 फ़ीसद ही है.

लेकिन यह अब भी पश्चिम की निगाह में करामाती बच्चा है. वह अपने प्रतिद्वंदियों की तुलना में फ़ायदे में है और उसके पास क्षमता भी चीन से अधिक है. अतंरराष्ट्रीय स्तर पर मिल रही प्रशंसा ने अंतरराष्ट्रीय मामलों में भारत को दंभी बना दिया है.

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सोमवार को मिसाइल टेक्नोलॉजी कंट्रोल रिजीम (एमटीसीआर) ने भारत को अपना नया सदस्य बनाया. लेकिन चीन को शामिल करने से इनकार कर दिया. यह ख़बर चीनी लोगों में छोटी सी लहर भी नहीं पैदा कर पाई. चीनी लोग अंतरराष्ट्रीय संबंधों की ओर से मिलने वाले झटकों को सहने के लिए अधिक परिपक्व हो गए हैं.

कुछ भारतीय भी आत्मकेंद्रित और आत्मसंतुष्ट हैं. वहीं इसके विपरीत भारत सरकार सौम्यता से पेश आती है और संपर्क बनाए रखना चाहती है. अपनी झल्लाहट को ख़त्म करना भारत के लिए एक नया विकल्प होगा.

भारत के राष्ट्रवादियों को यह सीखना होगा कि ख़ुद व्यवहार कैसे करें. अब वो चाहते हैं कि उनका देश एक प्रमुख शक्ति बने तो उन्हें यह जानना होगा कि प्रमुख शक्तियां अपना खेल कैसे खेलती हैं."

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