ज़ुल्म और यातना के ख़िलाफ़ एक बुलंद आवाज़ ख़ामोश

  • 3 जुलाई 2016
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यहूदी नरसंहार में जीवित बचे और शांति का नोबेल पुरस्कार जीतने वाले एली विज़ेल का 87 वर्ष की आयु में निधन हो गया है.

रोमानिया में जन्मे विज़ेल ने अमरीका में आख़िरी सांस ली. वो 1960 के दशक से अमरीकी नागरिक थे और वहीं रहते थे.

जब उन्होंने एक किशोर के तौर पर नाज़ी यातना शिविर में बिताए गए दिनों के अनुभवों को लिखना शुरू किया तो उन्हें ख़ासी शोहरत मिली.

उन्होंने अपने पिता, मां और एक छोटी बहन को यातना शिविर में गंवाया था.

उन्होंने अपना पूरा जीवन इस बात को समर्पित किया कि नाज़ी दौर में जो अत्याचार हुए, उन्हें कभी भुलाया न जाए.

विश्व यहूदी कांग्रेस के अध्यक्ष ने उन्हें 'प्रकाश पुंज' कहा था.

1986 में उन्हें हिंसा, दमन और नस्लवाद के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करने में उनकी भूमिका के लिए शांति के नोबेल पुरस्कार से नवाज़ा गया था.

पुरस्कार लेते हुए उन्होंने कहा था, "जब भी और जहां भी इंसानों का दमन हो उन्हें यातनाएं दी जाए, हमें पक्ष लेना होगा."

"तटस्थ रहने से दमन करने वाले की मदद होती है, पीड़ित की नहीं. चुप्पी ज़ुल्म करने वाले को सहारा देती है, ज़ुल्म सहने वाले को नहीं."

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