भारत को घमंड है, पर मिलेगा कुछ नहीं: पाक मीडिया

  • 3 जुलाई 2016
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भारत और अमरीका के मज़बूत होते रिश्तों पर चीन के सरकारी मीडिया की टिप्पणी पाकिस्तानी उर्दू अख़बारों में चर्चा का बड़ा विषय है.

रोज़नामा 'इंसाफ़' ने चीन के अख़बार 'ग्लोबल टाइम्स' के इस संपादकीय का ज़िक्र किया है कि अमरीका पूरी दुनिया नहीं है.

पाकिस्तानी अख़बार लिखता है कि अमरीका और उसके सहयोगी पश्चिमी देशों का भारत के साथ असाधारण सहयोग दरअसल चीन को नीचा दिखाने की कोशिशों का हिस्सा है, लेकिन उन्हें ये नहीं भूलना चाहिए कि भारत की जीडीपी चीन के मुकाबले सिर्फ़ बीस फ़ीसदी है.

भारत के मिसाइल टेक्नोलजी कंट्रोल रिजीम (एमटीसीआर) में शामिल होने को फ़िज़ूल बताते हुए अख़बार लिखता है कि पाकिस्तान इस समूह का सदस्य बनने का इच्छुक भी नहीं है, क्योंकि इस तरह वो किसी भी तरह की पाबंदी से आज़ाद रहेगा.

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अख़बार कहता है कि भारत को अमरीका की शह पर एमटीसीआर में शामिल होने पर घमंड हो सकता है लेकिन उसे हासिल कुछ नहीं होगा.

'नवा-ए-वक़्त' लिखता है कि अमरीका ने भारत को एमटीसीआर का सदस्य बनने पर बधाई देते हुए संकेत दिया कि वो उसे एनएसजी में शामिल कराना चाहता है और वह सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता की भी कोशिशें जारी रखेगा.

अख़बार ने कश्मीर मुद्दे से लेकर संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान का बचाव करने, एनएसजी में शमिल होने की भारत की कोशिशों को नाकाम करने और पाक-चीन आर्थिक कॉरिडोर जैसे सभी मुद्दों पर चीन के समर्थन की तारीफ़ की है.

अख़बार लिखता है कि भारत और अमरीका के गठजोड़ पर दो टूक रुख़ अपनाने की जरूरत है और ये चीन पाकिस्तान के गठबंधन से ही मुमकिन होगा.

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वहीं 'एक्सप्रेस' ने अपने संपादकीय में भारत और पाकिस्तान के बीच बातचीत शुरू करने पर ज़ोर दिया है.

अख़बार लिखता है कि दोनों देशों में कई लॉबियां काम कर रही हैं जिसमें एक लॉबी का कहना है कि जंग से तबाही के अलावा कुछ हासिल नहीं होगा और दोनों देशों की सरकारों को दशकों से चली आ रही ग़रीबी, अज्ञानता और बीमारियों से लड़ना चाहिए. अख़बार लिखता है कि दूसरी तरफ़ ऐसी ताक़तवर लॉबियां भी मौजूद हैं जिनके हित दोनों देशों के दोस्ताना रिश्तों से मेल नहीं खाते हैं.

अख़बार लिखता है कि जब दोनों देशों को पता है कि क्षेत्र में सुरक्षा और शांति बातचीत और दोस्ताना रिश्तों से ही आ सकती है तो फिर इस तरफ़ तेज़ी से क़दम बढ़ाए जाएं, ताकि शांति की दुश्मन ताक़तों का एजेंडा नाकाम बनाया जा सके.

'जंग' ने ‘क्षेत्र में अमरीका की भूमिका’ शीर्षक से लिखा है कि कश्मीर मुद्दे को लेकर अमरीका अपनी ज़िम्मेदारी दशकों से पूरी नहीं कर रहा है.

अख़बार कहता है कि अमरीका तो भारत को और ताक़तवर बना कर क्षेत्र के शक्ति संतुलन को बिगाड़ने पर तुला है.

अख़बार की टिप्पणी है कि इससे ना सिर्फ़ कश्मीर विवाद का न्यायपूर्ण तरीके से हल और मुश्किल होगा बल्कि क्षेत्र में अस्थिरता का ख़तरा भी बढ़ेगा.

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वहीं 'जसारत' ने पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता के इस बयान पर संपादकीय लिखा है कि पाकिस्तानी फ़ौज लोकतंत्र की समर्थक है और भारत से बातचीत की विरोधी नहीं है.

अख़बार लिखता है कि सवाल ये है कि सेना की तरफ़ से बारबार इस बात का भरोसा दिलाने की ज़रूरत क्यों पड़ती है कि वो लोकतंत्र समर्थक है क्योंकि जब भी ऐसी सफ़ाई दी जाती है तो शक होता है कि कहीं न कहीं कोई गड़बड़ है.

भारत से बातचीत के मुद्दे पर अख़बार लिखता है कि दोतरफ़ा रिश्तों में सबसे बड़ी बाधा कोई और नहीं बल्कि भारत की सरकारें रही हैं.

अख़बार की राय में भारत की सरकारें कश्मीर का ज़िक्र आते ही आग बबूला हो जाती हैं और अब तो भारतीय जनता पार्टी के रूप में भारत में कट्टरपंथियों का राज है जो पाकिस्तान विरोधी है.

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रुख़ भारत का करें तो 'हिंदोस्तान एक्सप्रेस' का संपादकीय है- स्विस बैंक में हिंदुस्तानियों का पैसा घटा.

अख़बार ने ताज़ा आंकड़ों के हवाले से लिखा है कि स्विस बैकों में भारतीय की रकम 8,392 करोड़ रुपए रह गई है जो 1997 के बाद से हिंदुस्तानियों की सबसे कम रक़म है.

अख़बार की राय है कि इस कमी की एक वजह काले धन के ख़िलाफ़ केंद्र सरकार की कड़ी नीतियां हैं. साथ ही स्विस बैंकों में अब पहले की तरह गोपनीयता नहीं रही है.

अख़बार कहता है कि सवाल ये है कि जब स्विस बैंकों में पैसा घट रहा है तो ये जा कहां रहा है?

कुछ सूत्रों का हवाला देते हुए अख़बार कहता है कि हो सकता है ये पैसा मध्य पूर्व के देशों में जा रहा हो या फिर हवाला के ज़रिए भारत लाया जा रहा हो.

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वहीं इस्तांबुल के हवाई अड्डे पर हालिया हमले की भी अख़बारों ने चर्चा की है. 'हमारा समाज' लिखता है कि चरमपंथ का ख़ात्म होना ज़रूरी है.

अख़बार की राय है कि तुर्की इस्लामिक स्टेट के सीधे निशाने पर है और इसकी एक वजह सीरिया से लगने वाली वो सीमा है जहां से शरणार्थियों में शामिल होकर चरमपंथी भी तुर्की में घुस जाते हैं.

इसी मुद्दे पर 'अख़बार-ए-मशरिक़' की राय है कि इस्लामिक स्टेट को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय में सहयोग और एकजुटता की कमी है और इसीलिए उससे ठीक तरीके से नहीं निपटा जा रहा है.

अख़बार कहता है तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोआन को चाहिए कि वो कुर्दों पर तवज्जो देने की बजाय पूरा ध्यान इस्लामिक स्टेट से लोहा लेने में लगाएं.

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