यहाँ अबाया में ढंका होता है डिज़ाइनर फ़ैशन

  • 4 जुलाई 2016
अबाया के पीछे फैशन इमेज कॉपीरइट Nadine Rupp Getty Images

खाड़ी देशों में इस वक़्त अच्छे फ़ैशनेबल सामान की ख़रीददारी तेज़ी से बढ़ रही है.

महिलाएं महंगे कपड़ों, जूतों और मेक-अप पर अच्छी ख़ासी रकम ख़र्च कर रही हैं.

ख़ास तौर से सऊदी अरब, क़तर और संयुक्त अरब अमीरात में इस तरह की ख़रीददारी का चलन बढ़ा है. ये चौंकाने वाली बात भी है, क्योंकि ज़्यादातर खाड़ी देशों में हिजाब पहनने का चलन है.

जब भी महिलाएं घरों से बाहर निकलती हैं, वो हिजाब या पर्दा करके चलती हैं. जिसे वहां अबाया के नाम से जाना जाता है.

दुबई की रहने वाली जवाहेर अलियोहा को ही लीजिए. वो 21 बरस की हैं और मीडिया की पढ़ाई कर रही हैं.

हर महीने वो अपने कपड़े, जूतों और बैग पर एक हज़ार डॉलर या क़रीब 68 हज़ार रुपए ख़र्च करती हैं.

अलियोहा, कभी भी बिना मेकअप के घर से नहीं निकलती हैं, जबकि संयुक्त अरब अमीरात की बाक़ी औरतों की तरह वो भी घर से बाहर बिना हिजाब के नहीं निकलती हैं.

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हिजाब करने का मतलब है कि अलियोहा के फ़ैशनेबल कपड़े, कुछ गिने-चुने दोस्त ही देख सकते हैं.

या फिर वो अपने क़ीमती कपड़ों की नुमाइश ऐसी पार्टियों में कर सकती हैं, जहां सिर्फ़ महिलाएं हों.

अलियोहा कहती हैं कि वो कपड़े-जूतों पर इतने पैसे अच्छा महसूस करने के लिए ख़र्च करती हैं. वो कहती हैं, "हमें ये पता होता है कि हिजाब के अंदर हमने क्या पहन रखा है. वो एहसास बहुत अच्छा होता है".

अलियोहा ने जो अब तक कि सबसे क़ीमती ड्रेस ख़रीदी थी, वो इटली के डिज़ाइनर वैलेंटिनो की थी.

उसके लिए उन्होंने क़रीब डेढ़ लाख रुपए ख़र्च किए थे. वो महंगे ब्रांडेड स्टोर्स में ही ख़रीदारी करती हैं.

ऐसे ही शरजाह की छात्रा नूरा हसन हैं. वो ख़ुद को ऐलानिया यानि ख़रीदारी की लत की शिकार बताती हैं.

नूरा कहती हैं कि जब भी उनके पास पैसे होते हैं, वो शॉपिंग के लिए निकल जाती हैं. वो हर हफ़्ते कुछ न कुछ नया ख़रीदती हैं.

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एक महीने में वो भी क़रीब हज़ार डॉलर, अपने फ़ैशन पर ख़र्च कर डालती हैं.

नूरा को सबसे ज़्यादा शौक़ जूतियों का है. वो हिजाब पहनकर भी इनकी नुमाइश जो कर सकती हैं.

उनके पास क्रिश्चियन लुबुतां के जूतों की जोड़ियां भी हैं और मनालो ब्लानिक की चप्पलें भी.

साथ ही क्रिश्चियन डायोर के क्रिस्टल लगे स्नीकर भी नूरा के पास हैं.

हालांकि नूरा अपने कपड़ों को भी ख़ास तवज्जो देती हैं. वो कहती हैं कि ख़ूबसूरत रंगीन कपड़े पहनने से उन्हें ख़ुशी मिलती है.

एक सर्वे के मुताबिक़, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और क़तर की औरतें हर महीने औसतन 2400 डॉलर अपने फ़ैशन और तोहफ़ों पर ख़र्च करती हैं.

कंसल्टिंग फ़र्म एटी कियर्नी के शमाइल सिद्दीक़ी कहते हैं कि कम से कम फ़ैशन के मामले में अरब के लोग बाक़ी दुनिया से क़दमताल कर रहे हैं.

वो जब भी किसी सेलेब्रिटी को कुछ ख़ास पहने देखते हैं तो फ़ौरन से पेशतर उसे ख़रीदना चाहते हैं.

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भले ही महिलाएं हिजाब पहनती हैं, मगर उसके अंदर उन्हें फ़ैशनेबल कपड़े चाहिए. महंगे कपड़ों का शौक़ किसे नहीं होता?

वैसे लग्ज़री फ़ैशन ब्रांड के सामान की बिक्री का अरब देशों में सबसे बड़ा केंद्र संयुक्त अरब अमीरात है.

यहां पर महिलाओं के खुले में हिजाब पहनने की पाबंदी नहीं है. मगर ज़्यादातर महिलाएं हिजाब के बग़ैर घर से बाहर नहीं निकलतीं.

आज यूएई की युवा महिलाएं ऐसे अबाया पहनना पसंद करती हैं, जो सामने से खुला होता है.

अपने चमचमाते मॉल्स, ऊंची इमारतों की वजह से यूएई का दुबई शहर, अरब देशों के फ़ैशन ट्रेंड का केंद्र बन गया है.

अक्सर रूस, अमरीका और यूरोपीय देशों के रईस यहां से गुज़रते हैं.

तो तमाम बड़े लग्ज़री फ़ैशन ब्रांड के स्टोर यहां मिल जाएंगे. दुबई की औरतें भी इसका ख़ूब फ़ायदा उठाती हैं.

दुबई की रहने वाली ब्लागर ज़हरा लैला कहती हैं कि यहां मौसम बहुत गर्म है.

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तो लोग घूमने के लिए शॉपिंग मॉल्स ही जा सकते हैं. वहां जाएंगे तो ख़रीदारी ही करेंगे.

दुबई की फ़ैशन डिज़ाइनर फातिमा ऐमुल्ला कहती हैं कि यहां कि औरतें, फ़ैशन को लेकर बहुत सजग हैं.

मान लीजिए किसी रोज़ एलीवेटर में बुर्क़ा फंस गया तो? अंदर क्या पहना है वो दुनिया देखेगी ना! ऐसे हालात के लिए हमेशा तैयार रहना ज़रूरी है.

ज़हरा भी फातिमा की बात पर हामी भरती हैं. वो कहती हैं कि हिजाब अगर तेज़ हवा के चलते खुल जाए, तो अंदर क्या पहना है वो दुनिया के सामने आ जाएगा.

इसलिए यहां की महिलाएं हमेशा महंगे, फ़ैशनेबल कपड़े पहनती हैं. वो अपनी चाल-ढाल को लेकर भी काफ़ी अलर्ट रहती हैं.

फिर सिर्फ़ महिलाओं वाली पार्टियां भी तो होती हैं. वहां वो अपने महंगे, ब्रांडेड कपड़ों-जूतों और बैग की खुलकर नुमाइश कर सकती हैं.

क्योंकि वहां तो उन्हें हिजाब पहनने की ज़रूरत नहीं होती.

दुबई में अपना बुटीक चलाने वाली डिज़ाइर एफा अल दबाग़ा कहती हैं कि महिलाएं इस बात का बहुत ख़याल करती हैं कि उन्होंने क्या पहना हुआ है.

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भले ही वो हिजाब करें या न करें. इससे उन्हें अच्छा महसूस होता है.

एफ़ा कहती हैं कि बंद दरवाज़ों के भीतर, जहां लड़कियां सिर्फ़ अपने दोस्तों के बीच होती हैं, जहां उन्हें हिजाब पहनने की ज़रूरत नहीं होती, वहां वो स्किनी जींस और टैंक टॉप पहने हुए दिख जाएंगी.

इससे उन्हें अच्छा महसूस होता है. फ़ैशन, अक्सर दिखावे के बजाय अच्छा महसूस कराने के लिए किया जाता है.

21 बरस की दुबई की छात्रा अफनान काज़िम कहती हैं कि लड़कियां ख़ूबसूरत दिखना चाहती हैं.

ख़ास तौर से अपने दोस्तों के बीच और अपने जानने वालों के बीच. उन्हें ब्रांडेड चीज़ें बहुत पसंद आती हैं.

ब्रिटेन से आकर दुबई में बसने वाली विकी ने शादी के लिए इस्लाम क़ुबूल किया था.

उन्होंने छह साल पहले से हिजाब पहनना शुरू किया था. वो कहती हैं कि किसी अमीराती बीवी की तरह कपड़े पहनने का उनका तजुर्बा आंखें खोल देने वाला था.

वो घर में आम औरतों की तरह ही रहती हैं. मगर जब भी बाहर जाती हैं, या घर में कोई बाहर से आने वाला होता है, तो वो बिना मेकअप और अपने ख़ास कपड़ों के, ऐसे ही लोगों के सामने नहीं जाती हैं.

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विकी कहती हैं कि महिलाओं के ऊपर अच्छे कपड़े-जूते पहनने का दबाव होता है.

उनके बीच अंदरखाने, बेहतर दिखने का मुक़ाबला चलता रहता है. अक्सर वो साथियों को दिखाने के लिए फ़ैशन करती हैं.

सबसे तगड़ा मुक़ाबला शादियों के दौरान होता है. उस दौरान महिलाएं और लड़कियां अपने पहनावे पर सबसे ज़्यादा ध्यान देती हैं.

यहां शादी के वक़्त मर्द अलग और महिलाएं अलग होते हैं. इस दौरान महिलाएं हिजाब नहीं पहनती हैं.

तब आपको यहां के एक से एक फ़ैशनेबल लोग देखने को मिलेंगे.

चूंकि यहां परिवार बड़े होते हैं तो शादियों में बड़ी तादाद में लोग जुटते हैं. ऐसे में अपनी पसंद की नुमाइश का ये मौ़क़ा सबसे बेहतरीन होता है.

(अंग्रेज़ी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी कैपिटल पर उपलब्ध है.)

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