इराक पर हमला 'अंतिम विकल्प' नहीं था:चिलकॉट रिपोर्ट

  • 6 जुलाई 2016
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अमरीका के नेतृत्व 2003 में हुए इराक हमले पर बहुप्रतीक्षित चिलकॉट रिपोर्ट ने टोनी ब्लेयर के प्रधानमंत्री काल में ब्रिटेन की भूमिका को सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है.

इस एक रिपोर्ट के अनुसार ब्रिटेन ने युद्ध में उतरने से पहले शांति स्थापित करने के तमाम उपायों को इस्तेमाल में नहीं लिया था.

चिलकॉट के अनुसार,'यह साफ है कि ब्रिटेन की इराकी नीति पूरी तरह से कमजोर और अपुष्ट गुप्त सूचनाओं के आधार पर तैयार की गई,इस नीति को किसी ने भी चुनौती नहीं दी जबकि इसका परीक्षण किया जाना आवश्यक था.यही नहीं इसके अलावा युद्ध के बाद बनाई गई तमाम योजनाएं भी पूरी तरह से अपर्याप्त और अनुचित थीं.'

टोनी ब्लेयर ने इराक हमले के दौरान लिए गए अपने फैसलों का बचाव किया है.

ब्लेयर के अनुसार,'प्रधानमंत्री के नाते इराक में युद्ध में जाने का फैसला उनके लिए एक बेहद कठिन फैसला था.'

ब्लेयर ने कहा कि वह अपने इस फैसले के लिए पूरी तरह से जिम्मेदार हैं और इसको लेकर वह कोई हील—हवाला नहीं देना चाहते हैं.

रिपोर्ट के अनुसार ब्रिटेन ने युद्ध में उतरने से पहले शांति स्थापित करने के तमाम उपायों का इस्तेमाल नहीं किया था.

ब्रिटेन के इस आधिकारिक जांच आयोग के अध्यक्ष सर जॉन चिलकॉट के मुताबिक इराक पर सैन्य हमला अंतिम उपाय नहीं था. इसके अलावा अन्य उपायों पर भी विचार किया जाना चाहिए था जो नहीं किया गया.

चिलकॉट का यह भी मानना है कि इराक में जन तबाही करने वाले हथियारों के ज़खीरे को लेकर जो भी फैसले लिए गए और इन्हें जिस तरह से पेश किया उसे किसी भी तरह से तर्कसंगत और न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता है.

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जॉन चिलकॉट ने यह विचार अपनी रिपोर्ट जारी करने के दौरान रखे. चिलकॉट की यह रिपोर्ट 12 खंडों में हैं.

यह रिपोर्ट सात वर्षों की जांच के बाद प्रकाशित की गई है.

चिलकॉट ने उम्मीद जतायी है कि,''अब से भविष्य में इतना बड़ा कोई भी सैन्य अभियान सटीक विश्लेषण और राजनीतिक विवेक को पूरी तरह से प्रयोेग में लाने के बाद ही संभव हो सकेगा. इस रिपोर्ट से उन सवालों के जवाब पाने में मदद मिलेगी जो 2003 से 2009 के दौरान मारे गए 179 सैनिकों के परिवारों के मन हैं''

चिलकॉट ने बीबीसी को बताया कि उनकी इस रिपोर्ट में व्यक्तियों और संस्थाओं, दोनों की ही आलोचना की गई है.

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इस रिपोर्ट के बाद इस बात की संभावना बढ़ी है कि युद्ध विरोधी लॉबी और युद्ध में मारे गए सैनिकों के परिजन अब ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री टॉनी ब्लेयर पर माफी मांगने का दबाव बढ़ाएंगे.

रिपोर्ट के प्रमुख बिंदु:

  • ब्रिटेन ने इराक युद्ध के दौरान शांति व निरस्त्रीकरण के तमाम उपायों को पूरी तरह से अपनाए बगैर ही हिस्सेदारी की,इस अभियान में सैन्य आक्रमण आखिरी चारा नहीं था.
  • इराक के पास जन तबाही मचाने वाले हथियारों को लेकर किए गए फैसले भी सही और न्यायोचित नहीं थे.
  • गुप्तचर एजेंसियों ने भी सद्दाम हुसैन के पास रासायिनक और जैविक हथियारों के ज़खीरे को बढ़ाने वाले दावे पर 'शक' जताया था पर उसके सबूत होने की तस्दीक नहीं की थी.
  • ब्रिटेन ने इराक पर अपनी नीति कमजोर और अपुष्ट गुप्त सूचनाओं के आधार पर तैयार की,इस नीति को किसी ने भी चुनौती नहीं दी जबकि इसका परीक्षण किया जाना आवश्यक था.
  • इराक में तीन थल सेना टुकड़ियों को तैनात करने से पहले तैयारी के लिए लिया गया समय काफी कम था. इस आक्रमण के जोखिमों का न तो ठीक से अंदाज़ा लगाया गया और न ही इनको लेकर पूरी तैयारी की सूचना मंत्रियों को दी गई,जिसके फलस्वरुप वहां पर हथियारों व उपकरणों की कमी हुई.
  • कई चेतावनियों के बावजूद आक्रमण के परिणामों को नज़र अंदाज़ किया गया.
  • सद्दाम हुसैन के बाद के इराक को लेकर बनाई गई योजनाएं पूरी से तरह से अपर्याप्त थी.
  • जिन परिस्थितियों में इराक पर हमले का कानूनी आधार दिया गया था उसे भी सही नहीं ठहराया जा सकता है.
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ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर ने कहा था कि अगर इराक़ में सामूहिक विनाश के हथियार नहीं भी मिलते तो भी वहाँ के पूर्व शासक सद्दाम हुसैन को हटाना सही क़दम होता.

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