'बिना लड़ाई मुस्लिम देशों की तबाही की साज़िश'

  • 10 जुलाई 2016
इमेज कॉपीरइट AFP

सऊदी शहर जेद्दा और मदीना में पिछले दिनों हुए चरमपंथी हमले पाकिस्तानी उर्दू मीडिया में चर्चा का विषय बने हुए हैं.

रोज़नामा ‘एक्सप्रेस’ का संपादकीय है- सऊदी अरब में दहशतगर्दी, मुस्लिम देशों के ख़िलाफ़ साज़िश.

अख़बार लिखता है कि इन हमलों का क्या मक़सद था और किन संगठनों ने इन्हें अंजाम दिया ये तो जांच के बाद ही पता चलेगा, लेकिन सऊदी अरब में होने वाले हमले अफ़सोसनाक हैं, ख़ासकर मदीना मस्जिद के पास हुए धमाके से मुस्लिम जगत में चिंता की लहर दौड़ गई है.

अख़बार लिखता है कि कई हल्कों में क़यास लग रहे हैं कि ग़ैर मुस्लिम ताक़तें इस्लामिक स्टेट जैसे चरमपंथी संगठनों को एक ख़ास योजना के तहत बढ़ावा दे रही हैं ताकि मुस्लिम देशों को लड़ाई के बिना ही तबाह किया जा सके.

इमेज कॉपीरइट Getty

इराक़, सीरिया और यमन के हालात का हवाला देते हुए अख़बार ये आरोप लगाता है कि इसी साज़िश के तहत मुस्लिम देशों में दहशतगर्दी फैलाई जा रही है.

उधर ‘नवा-ए-वक़्त’ लिखता है कि इस वक़्त पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान, तुर्की, बांग्लादेश, ईरान और मुसलमानों के लिए पवित्र सऊदी अरब की धरती इस्लामिक स्टेट के ख़ास तौर से निशाने पर हैं.

अख़बार लिखता है कि अगर दहशतगर्द संगठनों ने रमज़ान के मुबारक महीने में मुसलमानों का ख़ून बहाया है तो उनकी कार्रवाइयों का इस्लाम से कोई नाता नहीं जोड़ा जा सकता है.

अख़बार कहता है कि ग़ैर मुस्लिम यूरोपीय देशों में दहशतगर्दी की घटनाओं में पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और अन्य मुसलमान देशों के लोग ही शामिल पाए जाते हैं, इसलिए पश्चिमी देशों को दहशतगर्दी को इस्लाम से जोड़ने का मौक़ा मिल जाता है.

इमेज कॉपीरइट Reuters
Image caption मध्य पूर्व जारी संकट के चलते लाखों लोग बेघर हुए हैं

वहीं दैनिक ‘दुनिया’ मुसलमान देशों को सलाह देता है कि वो अपनी आंतरिक और विदेश नीति पर नए सिरे से विचार करें.

अख़बार लिखता है कि यदि मुस्लिम देश असल मायनों में एकता और सहमति दिखाएंगे तो 'दुश्मन' अपने इरादों को पूरा नहीं कर पाएंगे.

दूसरी तरफ ‘जंग’ ने भारत प्रशासित कश्मीर में ईद के दिन अलगाववादी नेताओं को नज़रबंद करने पर पाकिस्तान की आपत्तियों को अपने संपादकीय में उठाया है.

अख़बार लिखता है कि ईद के मौक़े पर तो गंभीर अपराधों में सज़ा काट रहे क़ैदियों को भी अपने परिवारों से मिलने दिया जाता है लेकिन लेकिन अधिकारियों ने ईद के मौक़े पर कश्मीर नेताओं की आज़ादी छीन ली ताकि वो आम लोगों से न मिल सकें.

वहीं ‘जसारत’ ने अपने संपादकीय में इस बात का शुक्र मनाया है कि पाकिस्तान में ईद का दिन बिना किसी बड़ी खराबी के गुजर गया, हालांकि ईद के दूसरे और तीसरे दिन देश भर में ट्रैफिक ख़ूब जाम रहा.

इमेज कॉपीरइट Getty

अख़बार के मुताबकि ऐसा लगा कि पहले दिन घरों में ईद मनाने वाले अगले दिन बड़ी संख्या में बाहर आए और बारिश की वजह से टूटी फूटी सड़क और गड्ढ़ों ने हालात को और पेचीदा बना दिया.

उधर रोज़नामा ‘पाकिस्तान’ ने लिखा है कि पाकिस्तान चीन आर्थिक कोरिडोर को ख़ुशहाली का रास्ता बनाना होगा.

अख़बार ने संसदीय समिति के चेयरमैन सीनेटर मुशाहिद हुसैन के हवाले से लिखा है कि इस कॉरिडोर के पश्चिमी रूट को पूरा करना पाकिस्तान सरकार की सबसे बड़ी प्राथमिकता है और ये अगस्त 2008 तक पूरा हो जाएगा, जबकि पूर्वी रूट 2019 तक बनेगा.

अख़बार का आरोप है कि भारत ने चीनी नेतृत्व से मुलाक़ात कर, प्रयास किए कि इस योजना पर अमल न हो, लेकिन चीनी राष्ट्रपति ने भारत की तथाकथित आपत्तियों को ख़ारिज कर दिया.

अखबार लिखता है कि चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर से असल में ख़ुशहाली लाने के लिए पाकिस्तान में औद्योगिक और रिहायशी शहर बसाने होंगे.

इमेज कॉपीरइट Facebook

रुख़ भारत का करें तो ढाका हमले के बाद विवादों में घिरे मुस्लिम उपदेशक ज़ाकिर नाइक पर 'हमारा समाज' का संपादकीय है- ज़ाकिर नाइक की घेराबंदी.

अख़बार कहता है कि ये दावे किस आधार पर किए जा रहे हैं कि ढाका में जवाबी कार्रवाई में मारे गए चरमपंथी ज़ाकिर नाइक की सोच से प्रभावित थे?

ज़ाकिर नाइक को शांति का संदेश देने वाला व्यक्ति बताते हुए अख़बार कहता है कि उनका पीस टीवी बरसों से अंग्रेजी, उर्दू और बांग्ला में प्रसारित हो रहा है लेकिन कभी बांग्लादेश की सरकार ने उस पर पाबंदी नहीं लगाई.

अख़बार के मुताबिक़ बात तो यह है कि ज़ाकिर नाइक का टीवी कार्यक्रम काफ़ी समय से बहुत से लोगों की आंखों में खटक रहा था जिसके जरिए वो इस्लाम का प्रचार करते हैं, और अच्छे खासे पढ़े लिखे लोगों को इस्लाम में दाख़िल कराते हुए दिखते हैं.

इमेज कॉपीरइट AP

वहीं 'हिंदोस्तान एक्सप्रेस' ने मोदी मंत्रिमडल के विस्तार और फेरबदल पर संपादकीय लिखा है.

नए मंत्रियों में तीन के उत्तर प्रदेश से होने पर अख़बार की राय है कि उत्तर प्रदेश में होने वाले चुनावों को देखते हुए राज्य को प्राथमिकता दी गई है.

अख़बार लिखता है कि कयास ये भी हैं कि आरएसएस स्मृति ईरानी के कामकाज से ख़ुश नहीं है और उन्हें हटाने का दबाव सरकार पर है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए

संबंधित समाचार