क्या जानवर भी ख़ुदकुशी करते हैं?

  • 11 जुलाई 2016
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सन 1845 में लंदन के अख़बार, 'इलस्ट्रेटेड लंदन न्यूज़' में अजीबो-ग़रीब ख़बर छपी. ख़बर ये थी कि काले रंग के एक बेहद ख़ूबसूरत कुत्ते ने पानी में कूदकर जान दे दी. जब वो पानी में कूदा तो उसने तैरने के लिए पैर मारने की कोशिश तक नहीं की, जबकि आम तौर पर कुत्ते ऐसा नहीं करते. जब उस कुत्ते को पानी से निकालकर बाहर लाया गया तो वो दोबारा पानी में कूद गया और अपनी जान देकर ही माना.

उस दौर के अख़बारों के मुताबिक़, किसी जानवर के ख़ुदकुशी करने की ये पहली घटना नहीं थी. इसके कुछ दिनों बाद ही दो ऐसी और ख़बरें छपीं. जिनमें से एक में बतख ने ख़ुद को डुबोकर मार डाला था. वहीं दूसरी ख़बर के मुताबिक़, एक बिल्ली ने पेड़ से लटककर जान दे दी. ऐसा बिल्ली ने अपने बच्चों की मौत के बाद किया था.

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आख़िर इन ख़बरों में कितनी सच्चाई है?

हमें ये तो मालूम है कि जानवर भी दिमाग़ी बीमारी के शिकार होते हैं. हमें ये भी पता है कि इंसानों की तरह कई जानवर भी तनाव और डिप्रेशन के शिकार हो जाते हैं. इंसान अक्सर इन्हीं वजहों से ख़ुदकुशी करता है. इंसानों जैसी कई आदतें दूसरे जानवरों में पाई गई हैं, लेकिन क्या आत्महत्या उनमें से एक है?

क्या वाक़ई जानवर, जान-बूझकर अपनी जान देते हैं?

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इंसान इस सवाल का जवाब बरसों से तलाश रहा है. आज से दो हज़ार साल पहले यूनानी दार्शनिक अरस्तू ने एक घोड़े के ख़ुदकुशी करने की घटना का ज़िक्र किया था. उनके मुताबिक़, जब घोड़े को लगा कि उसने अपनी मां के साथ सेक्स कर लिया है तो मारे शर्म के उसने ख़ुद को समंदर में डुबोकर मार डाला.

ईसा की दूसरी सदी में ग्रीक विचारक क्लॉडियस ऐलियन ने तो जानवरों की ख़ुदकुशी की वारदात पर पूरी क़िताब ही लिख डाली थी. उन्होंने इसमें जानवरों की आत्महत्या की 21 वारदातों की मिसालें दी थीं. इनमें एक डॉल्फ़िन की ख़ुदकुशी की घटना का भी ज़िक्र था. जिसने जान-बूझकर ख़ुद को पकड़वाया था. इसके अलावा कुछ शिकारी कुत्तों के खाना छोड़कर जान देने की घटनाओं के बारे में भी क्लॉडियस ने लिखा. कुत्तों ने अपने मालिक के मर जाने के बाद ऐसा किया था. एक ऐसी ही वारदात में एक बाज के अपने मालिक की चिता में जल जाने की घटना का भी ज़िक्र क्लॉडियस ने किया है.

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उन्नीसवीं सदी में इंग्लैंड में जानवरों की ख़ुदकुशी को लेकर लोगों में काफ़ी दिलचस्पी थी. विलियम लॉडर लिंडसे नाम के एक मनोवैज्ञानिक ने लिखा कि जानवर तकलीफ़ की हालात से बचने के लिए जान दे देते हैं.

उस दौर में जानवरों की बेहतरी के लिए काम करने वाले संगठनों ने भी इस मुद्दे पर काफ़ी ज़ोर दिया था. रॉयल सोसाइटी फॉर प्रिवेंशन ऑफ क्रुएल्टी टू एनिमल्स नाम के संगठन ने तो जानवरों की तकलीफ़ को इंसानों जैसा बताने की भी कोशिश की.

ब्रिटेन की मैनचेस्टर यूनिवर्सिटी के डंकन विलसन ने 2014 में इस बारे में अपनी रिसर्च छपवाई थी. वो कहते हैं कि उन्नीसवीं सदी के जानवर प्रेमी ये साबित करने में लगे थे कि जानवरों में भी एहसास होते हैं. तभी वो तकलीफ़ या ग़ुस्से में आकर जान दे देते हैं.

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वो 1875 की एक घटना की मिसाल देते हैं. जिसमें एक बारहसिंघे की ख़ुदकुशी का ज़िक्र है, जिसे कुछ कुत्ते खदेड़ रहे थे. जब बारहसिंघे को लगा कि वो कुत्तों के जबड़ों की पहुंच में आने वाला है तो उसने खाई में छलांग लगाकर जान दे दी.

हालांकि बीसवीं सदी में साइंस की तरक़्क़ी के बाद जानवरों के जान देने की घटनाओं को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने का दौर ख़त्म हो चुका है. तब ख़ुदकुशी को बहादुरी की निशानी माना जाता था. आज आत्महत्या को सामाजिक बुराई कहा जाता है.

हालांकि जानवरों की ख़ुदकुशी का सवाल जस का तस है.

इस बारे में इटली की कैग्लियारी यूनिवर्सिटी के एंतोनियो प्रेती ने काफ़ी रिसर्च की है. वो कहते हैं कि जानवर के ख़ुदकुशी करने का ख़याल ही ग़लत है. उन्होंने पिछले चालीस सालों में इस बारे में छपे क़रीब एक हज़ार रिसर्च को खंगाला. प्रेती अब इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि जानवर जान बूझकर जान नहीं देते.

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वो कहते हैं कि ग्रीक क़िस्से कहानियों में जानवरों की ख़ुदकुशी का जो ज़िक्र मिलता है, वो महज़ गल्प कथा है.

ध्रुवों पर पाए जाने वाले चूहों जैसे जानवर, लेमिंग्स, एक साथ झुंड के झुंड जाकर खाई में गिर जाते हैं. पहले कहा जाता था कि वो ख़ुदकुशी करते हैं. मगर अब वैज्ञानिकों का कहना है कि वो असल में ग़लती से गिर जाते हैं. जनसंख्या का इतना दबाव होता है कि लेमिंग्स हज़ारों की तादाद में एक साथ ही एक जगह से दूसरी जगह जाते हैं. इसी सफर के दौरान उनमें से बहुतों की मौत हो जाती है.

कई बार मालिकों की मौत के बाद पालतू जानवरों की मौत को ख़ुदकुशी माना जाता है. मगर एंतोनियो प्रेती के मुताबिक़, मालिकों की मौत के बाद पालतू जानवरं की रोज़मर्रा की ज़िंदगी में खलल पड़ता है. वो जान-बूझकर मरने का फ़ैसला नहीं करते. असल में वो अपने मालिक के इतने आदी हो चुके होते हैं कि दूसरों के हाथ से खाना नहीं खाते. इस वजह से उनकी मौत हो जाती है.

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इस तर्क से एक बात तो साफ़ है. बहुत तनाव में आने का जानवरों पर बहुत बुरा असर पड़ता है.

इस साल मई में स्पेन के टेनेराइफ में एक सी वर्ल्ड वाटर पार्क में अजीबो-ग़रीब घटना हुई. यहां पालतू रखी गई एक किलर व्हेल अपने टैंक से बाहर आकर क़रीब दस मिनट तक पड़ी रही. देखने वालों ने इसे व्हेल के ख़ुदकुशी करने की कोशिश के तौर पर देखा.

हालांकि जानकार कहते हैं कि व्हेल अपने माहौल से परेशान थी. कहां समंदर, जिसका कोई ओर-छोर नहीं होता. और कहां वो वाटर पार्क के टैंक की पाबंदियों में तैरने को पाती थी. इसी से उसे तनाव हो गया था. उसके पानी से बाहर आने की यही वजह थी.

अमरीका के विलियम एंड मैरी कॉलेज की बारबरा किंग कहती हैं कि पहले तो हमें ये समझना होगा कि जानवरों में एहसास किस हद तक होते हैं. क्या वो इतना महसूस कर पाते हैं कि जान देने का फ़ैसला कर सकें?

बारबरा कहती हैं कि ज़्यादातर जानवरों के जान देने की वजह उनकी ज़िंदगी में इंसान की दखलंदाज़ी होती है. उन्हें ज़बरदस्ती बंधे हुए माहौल में रखा जाता है. उनका शिकार भी किया जाता है.

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चीन में बाड़े में रखे गए एक भालू ने अपने बच्चे को मारकर ख़ुद भी जान दे दी थी. असल में उसके बच्चे को एक बेहद तकलीफ़देह इंजेक्शन देकर उसके शरीर से पित्त निकाला गया था. बच्चे की तकलीफ़ मां से नहीं देखी गई. और उसे ज़्यादा दर्द से बचाने के लिए मां ने अपने बच्चे को मार डाला. और ख़ुद भी जान दे दी. जानकार कहते हैं कि मादा भालू को ये लगा कि वो मां-बेटे ज़िंदा रहे तो उन्हें आगे भी ऐसी तकलीफ़ झेलनी पड़ेगी.

एंतोनियो प्रेती, भालू के बर्ताव को तनाव का नतीजा बताते हैं. वो कहते हैं कि बांध कर रखे जाने पर जानवर क़ैद से भागने की कोशिश करते हैं. नहीं भाग पाते तो जान दे देते हैं.

व्हेलों के बारे में भी कहा जाता है कि वो जान देने के लिए ही जान-बूझकर पानी के बाहर आती हैं. जानकार कहते हैं कि कोई व्हेल बीमार पड़ने पर पानी से बाहर आ जाती है. अब चूंकि व्हेल सामाजिक जानवर है. तो उसका साथ देने के लिए कई और भी किनारे आ जाती हैं. हालांकि इसे ख़ुदकुशी कहना ग़लत होगा.

कई बार कुछ परजीवी कीटाणुओं की वजह से भी जानवरों का दिमाग़ ख़राब हो जाता है. और उनकी मौत हो जाती है. जैसे कि चूहों के दिमाग़ पर असर डालने वाला एक विषाणु. इसके असर से चूहों के भीतर से बिल्लियों का डर ख़त्म हो जाता है. ऐसे बीमार चूहों को जब बिल्लियां खाती हैं. तो, उन्हें भी ये बीमारी हो जाती है.

ऐसे ही कुकुरमुत्ते की एक नस्ल, कुछ चींटियों के दिमाग़ पर बुरा असर डालकर उन्हें मौत की तरफ़ धकेल देती है.

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वहीं कुछ मकड़ियां, अपने आप को खाने के लिए बच्चों के हवाले कर देती हैं. इसे ख़ुदकुशी के बजाय बच्चों की फ़िक्र में जान देना कहना ज़्यादा सही होगा.

ख़ुदकुशी वो होती है जिसमें कोई इरादतन अपनी जान देता है. अब बहुत से जानवर अपनी जान देते हैं. मगर, क्या वो इरादतन ऐसा करते हैं? जैसे कि मादा मकड़ी, जो ख़ुद को मिटाकर अपने बच्चों को ज़िंदा रखना चाहती है. वहीं चीन में जिस मादा भालू ने अपने बच्चे को मारकर जान दी. वो शायद तनाव में रही होगी. लेकिन, उसका इरादा जान देने का नहीं रहा होगा.

अमरीकी एक्सपर्ट बारबरा किंग कहती हैं कि अभी हम जानवरों के दिमाग़ को ठीक से समझ नहीं पाए हैं. इसलिए इस सवाल का जवाब देना मुश्किल है कि क्या कुछ जानवर ख़ुदकुशी करते हैं.

ख़ुदकुशी की तैयारी करना, इस दुनिया में हमारे हालात को समझना और उसके भविष्य के बारे में अंदाज़ा लगाना है.

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इंसान ऐसा आसानी से कर पाते हैं. हम कई बार ऐसी बातों की फिक्र में भी लग जाते हैं जो हमारे नियंत्रण से बाहर होती हैं. लेकिन फिर भी उनकी चिंता हमें परेशान किए रहती है. ज़्यादातर लोग इस फिक्र से समय के साथ बाहर आ जाते हैं. लेकिन डिप्रेशन के शिकार लोग ऐसा नहीं कर पाते. उन्हें भविष्य डरावना लगता है. जैसे कि हमारी मौत तय है. बहुत से लोग इस ख़याल को पीछे छोड़कर बिंदास ज़िंदगी जीते हैं. मगर कुछ लोग इसकी फ़िक्र ज़िंदगी भर करते रह जाते हैं.

कुछ जानवर भी इंसानों की तरह मौत का मातम मनाते हैं. वो अपने साथी की मौत पर सोग मनाते हैं. मुर्दा शरीर को देखकर डरते हैं. मगर ये नहीं कहा जा सकता है कि इन जानवरों को मौत से डर लगता है. उनमें इतनी समझ नहीं होती.

यानी, जानवर बुरे हालात से घबराते हैं. यही वजह है कि ज़ेब्रा, शेर के क़रीब नहीं जाते. उन्हें इसके ख़तरे का एहसास होता है. इससे डर लगता है. वरना मछलियां भी घड़ियालों के पास तैरतीं. चूहे, सांपों से आंखें मिलाकर बात करते.

ख़तरों से डरने का भाव ही जानवरों को ज़िंदा रखता है. जानकार कहते हैं कि इंसान ही ऐसा जीव है जिसे अपनी मौत का बख़ूबी एहसास है.

ख़ुदकुशी, अपनी मौत का वक़्त क़रीब लाना, उसे तय करना है. फिलहाल जानवरों में ये एहसास नहीं पाया जाता.

(अंग्रेजी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें, जो बीबीसी अर्थ पर उपलब्ध है.)

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